उच्चतम न्यायालय का विभाजन समय की जरूरत!

सितम्बर, 2019 में एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के दौरान भारत के उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति वैंकेया नायडू ने अदालतों में बड़ी तादात में लंबित मामलों के निपटारे के लिए न्यायिक व्यवस्था में बड़े सुधार की बात कहीं। अपने उद्धबोधन में उन्होंने उच्चतम न्यायालय को चार न्यायपीठों (Cassation Court) में विभाजित करने का सुझाव दिया। उपराष्ट्रपति के इस सुझाव से निश्चित ही न्यायप्रणाली में सुधार आयेगा।

भारत के विभिन्न भागों में इन न्यायपीठों के गठन की कल्पना भारत में कई वर्षों से की जा रही हैं। इसकी वज़ह उच्चतम न्यायलय का व्यापक क्षेत्राधिकार है। उच्चतम न्यायालय के पास 'मूल अधिकारों के संरक्षण' के लिए संविधान के अनुच्छेद 32 के अधीन मूल अधिकारिता है। यह सिविल और आपराधिक अपील का सर्वोच्य न्यायालय हैं। इसके पास संविधान के अनुच्छेद 143 के अधीन सलाहकारी अधिकारिता भी है। यहीं व्यापकता उच्चतम न्यायालय की कार्यप्रणाली को बोझिल बनाती है।

उच्चतम न्यायलय में बकाया मामलों के असहनीय बोझ के चलते संवैधानिक न्याय नहीं मिल पाता जिसके निर्णयन का अपना एक स्थान हैं। अतः इसके निर्णयन के लिए एक पृथक संविधान न्यायालय होना चाहिये। विश्व के करीबन 55 देशो में, जिनमें कोलंबिया, मिस्र, फ्रांस, जर्मनी, ईरान, इटली, म्यांमार, फिजी, रूस, तथा साउथ अफ्रीका के साथ कई यूरोपीय देशों में संवैधानिक विषयों के न्याय निर्णयन के लिए 'संविधान न्यायालय' और गैर-संवैधानिक विषयों के न्याय निर्णयन के लिए 'अंतिम-अपील न्यायालय' (कोर डे कैसैनन) है, जो न्यायायिक प्रणाली को सुव्यवस्थित बनातें हैं।

उच्चतम न्यायालय के पृथकरण के लिए 1984 में दसवें विधि आयोग की 95 वीं रिपोर्ट जिसका शीर्षक "उच्चतम न्यायालय के भीतर संवैधानिक विभाजन- प्रस्तावक प्रस्ताव" में यह सिफारिश की गई थी कि भारत का उच्चतम न्यायलय दो खंडो, अर्थात संवैधानिक खण्ड और विधिक खण्ड से मिलकर बना होना चाहिए। जिससे संविधानिक मामले संवैधानिक खण्ड को सौंपे जायेंगे वही अन्य विधिक मामले विधिक खंड को सौंपे जायेंगे। यही बात ग्यारहवे विधि आयोग ने अपनी 125 वीं रिपोर्ट में दोहराई है। सन् 2009 में अट्ठारहवे विधि आयोग की 229 वीं रिपोर्ट में भारत के चार भागों में अंतिम अपील न्यायपीठों (cassation benches) की स्थापना की सिफारिश की गई थी|

आज भारत में न्यायाधीशों की संख्या और जनसँख्या का अनुपात प्रति दस लाख केवल 10.5 न्यायाधीश हैं। जबकि अमेरिका में यह संख्या 107, कनाडा में 75, यू.के. में 51 तथा ऑस्ट्रेलिया में 46 न्यायाधीश प्रति दस लाख है। हमारे यहां यह मामला कई सालों से विचाराधीन हैं, जिससे आम आदमी को शीघ्र न्याय नहीं मिल पाता हैं।

इससे देश के सुदूर इलाकों से न्याय की गुहार के लिए उच्चतम न्यायालय में अपने मामले में पैरवी करने के लिए नई दिल्ली आने वाले वादकारियों की व्यथाओं की कल्पना की जा सकती है। अऩ्य खर्चों के अतिरिक्त उसकी यात्रा पर भी भारी खर्च हो जाता हैं। न्यायालय में स्थगन (adjournment) प्रतिषेधक होने पर यह खर्च कई गुना बढ़ जाता हैं। 

यदि इन खंडो की स्थापना देश के चारों भागों में की जाती हैं तो वादकारो को अधिक दूरी तय न करते हुए अपने यहां स्थापित खण्ड में न्याय प्राप्त करने की सहूलियतत मिल सकती है। तथा देश में न्याय से वंचित एक गरीब व्यक्ति के लिए भी अपना पक्ष रखने तथा उच्चतम न्यायालय पहुंचने में आसानी होगी|

विधिक न्यायपीठों के गठन की कल्पना हमारे संविधान निर्माताओं ने भी जताई थी, जो संविधान के अनुच्छेद 130 उल्लिखित है। अनुच्छेद के अनुसार भारत के मुख्य न्यायमूर्ति व राष्ट्रपति के अनुमोदन से उच्चतम न्यायालय दिल्ली सहित भारत के किसी भी क्षेत्र में स्थापित कर सकते है। भारत की भौगोलिक स्थितियों के अनुसार इन खंडो के गठन के बाद विधि शासन या कानून का शासन (रूल ऑफ़ लॉ) के सिद्धांत को भी परिलिक्षित किया जा सकेगा|

- अवतार सिंह पंवार
लेखक गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, इंदौर के फाइनल ईयर के छात्र है। ये लेखक के निजी विचार हैं और आजादी.मी का उपरोक्त विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं है।