कॉलेजों को है लोकतंत्र की ज़रूरत

आगामी वर्ष 2014 में होने वाले आम चुनावों में लगभग 10 करोड़ नए मतदाता होंगे। भारत के मतदाताओं की यह संख्‍या मैक्सिको की पूरी आबादी के लगभग है।भारतीय जनसंख्‍या में शामिल होने वाले अधिकांश नए मतदाताओं की पैदाइश बाबरी मस्जिद दंगों, प्रथम मंडल आरक्षण ड्रामा और वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों जैसी घटनाओं के बाद की है। मील का पत्‍‍थर साबित हुई इन तीन प्रमुख घटनाओं ने पिछले दो दशकों में देश की राजनीति को परिभाषित किया है।

नेशनल कांउसिल ऑफ एप्‍लाइड इकोनॉमिक रिसर्च और नेशनल बुक ट्रस्‍ट द्वारा संचालित किए गए एक ताज़ा राष्‍ट्रीय यूथ रीडरशिप सर्वे ने इस संबंध में कुछ रोचक उत्‍तर प्रदान किए है। सर्वे में शामिल हुए कुल 76 फीसदी युवाओं (सभी शिक्षित थे) ने खुद को धार्मिक माना है। उनके लिए जैव-विवि‍धता और प्रदूषण गंभीर मुद्दे हैं।महात्‍मा गांधी रोज़गार गारंटी कानून और सर्व शिक्षा अभियान जैसे प्रारंभिक शिक्षा कार्यक्रम की तुलना में सूचना का अधिकार कानून में उनकी जागरूकता बेहद कम है।

देश की आधी जनसंख्‍या की उम्र 20 से 25 वर्ष से नीचे की हैं, लेकिन हमारे सबसे प्रमुख राजनैतिक नेताओं में से कई की उम्र अधिकांश निजी कंपनियों की रिटायरमेंट उम्र से ऊपर पहुंच गई हैं।

लिबरल यूथ फोरम ने सिविटास कंसल्टेंसी के सहयोग से भारत में कैंपस डेमोक्रेसी और गवर्नेंस में छात्रों की भागीदारी पर एक शोध अध्‍ययन किया। इस अध्ययन में कैंपस लोकतंत्र के विभिन्‍न पहलुओं पर छात्र नेताओं, छात्र संगठनों, शिक्षकों, प्रबंधन और अन्य स्‍टेक होल्‍डरों की राय का विश्‍लेषण किया गया। अध्ययन में कुल 77 शिक्षण संस्थानों (सरकारी और निजी) को शामिल किया गया।

अध्‍ययन में अधिकांश संस्‍थानों (विशेषकर सरकारी कॉलेजों) में छात्र परिषदों के गठन के लिए सांवि‍धिक प्रावधान है, जो चुनाव अथवा नामांकन के माध्‍यम से होता है। हकीकत में, हमने पाया कि स्‍वैच्छिक नामांकन प्रणालियां अक्‍सर कॉलेज के अधिकारियों द्वारा कार्यान्वित की जाती है। ऐसा कैंपस चुनाव के आसपास राजनीतिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए किया जाता है।

तकरीबन आधे कॉलेजों ने नामांकन प्रणाली को वरीयता दी और चुनाव का विरोध किया। सर्वे के दूसरे परिणाम ठीक इसके विपरीत हैं: 69 फीसदी छात्रों और 52 फीसदी शिक्षकों ने सर्वे के दौरान बताया कि वे चुनावों और लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित हुए प्रतिनिधियों को वरीयता देते हैं।

यहां युवाओं से संबंधित मुद्दों को उठाने के लिए युवा नेताओं को एक मंच प्रदान करने की तत्‍काल आवश्यकता है। इसलिए स्‍थापना विरोधी आंदोलनकारी बनाने के बजाय कैंपस लोकतंत्र उन्हें साझेदार के रूप में सशक्‍तता प्रदान करता है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में युवाओं की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से, राष्ट्र अपने भविष्य के राजनेताओं को एक स्‍थि‍ति पर ढाल सकता हैं, जिससे वे निंदक और भ्रष्‍ट के बजाय ऊर्जावान और आदर्शवादी हो सकें।

हमारी राजनीतिक प्रणाली में और अधिक युवा आवाजों की ज़रूरत है। वर्तमान में, संसद के 543 निर्वाचित सदस्यों में 30 सांसद हैं जिनकी उम्र 35 वर्षसे नीचे हैं जबकि 30 सांसदों की उम्र 36 से 39 वर्ष के बीच हैं।

छात्रों के लिए राजनीतिक नेतृत्व की ओर पहला कदम उठाना मुमकिन नहीं है। किसी भी परिपक्व लोकतंत्र में स्वच्छ और प्रभावी कैंपस चुनाव ऊर्जावान नेताओं और जन समर्थित नेताओं को उत्‍पन्‍न करते हैं। भारत में, हमने देखा है कि हड़ताल  विश्वविद्यालय प्रदर्शनकारियों का अक्‍सर पहला अखाड़ा होता है और राजनीतिक समूहों के बीच कॉलेज कैंपस में हिंसा, इसका ज्‍वलंत उदाहरण है।

कैंपस चुनाव के दौरान छात्र नेताओं को राजनीतिक दलों की ओर से सीधे धन मुहैया कराया जाता है, जिसके चुनाव खर्च के बारे में कोई पार‍दर्शिता नहीं होती।

छात्र चुनावों में वि‍त्तीय पारदर्शिता के लोकतंत्रीकरण, छात्र चुनाव को अपराधमुक्‍त बनाने के मुद्दों के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा लिंगदोह आयोग को नियुक्त किया गया। हमारे शोध के निष्कर्ष सुझाते हैं कि समिति की सिफारिशों को पर्याप्त रूप से केवल हैदराबाद और दिल्ली जैसे प्रमुख विश्वविद्यालयों में ही लागू किया जा सका है।

इसके अलावा, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश जैसे कई राज्यों के छात्र चुनाव पर एक सिरे से प्रतिबंध लगाने के बाद कैंपस लोकतंत्र के लिए संभावनाएं काफी कम दिखाई देती हैं।

जबकि छात्र अपनी शिकायतों के लिए एक समुचित शिकायत संगठन चाहते हैं, क्‍योंकि वर्तमान समय में उन्‍हें नहीं लगता कि उनके हितों की रक्षा की जा रही है। आरटीआई कानून के बढ़ते उपयोग ने कुछ संस्थाओं को मूल्यांकन और प्रवेश प्रक्रियाओं में अधिक पारदर्शी और उत्‍तरदायी बना दिया है। लेकिन ऐसी सफलता की कहानी कुछ जगह ही सिमट कर रह गई है।

भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली में वास्तविक लोकतांत्रिक प्रक्रिया कीज़रूरत है। हमें छात्र संगठनों में भागीदारी और परिसर में लोकतंत्र की जीवंतता बहाल करने के लिए आदर्शवादी युवाओं को प्रोत्साहित करना होगा, जिससे वे बुलेट नहीं, बैलेट को अपनाएं। नई पीढ़ी पढ़ी लिखी है, सभी क्षेत्रों से शिक्षित, प्रेरित और युवा नेताओं की एक नई पीढ़ी ‘प’ शब्द के प्रचलित अर्थ बदल सकती है।

- यवनिका खन्ना और हर्ष गुप्ता