दो अलग अलग सपनों की लड़ाई है यह

वैसे तो आम आदमी पार्टी के योगेंद्र यादव के राजनीतिक विचार मेरी राजनीतिक सोच से इतने अलग हैं कि अक्सर मैं उनकी बातों से सहमत नहीं होती हूं। मगर पिछले सप्ताह उन्होंने जब एक टीवी चैनल पर कहा कि इस चुनाव में 'दो अलग-अलग सपनों की लड़ाई है', तो मुझे सहमति जतानी पड़ी, क्योंकि उन्होंने ठीक कहा। सक्रिय राजनीति में आने से पहले योगेंद्र जी कभी राहुल गांधी को राजनीति पढ़ाया करते थे, सो उनकी सोच वही है, जो इस चुनाव अभियान में हमने राहुल गांधी की जुबानी बार-बार सुनी है। यानी हम गरीबों के लिए राजनीति करते हैं और वह (नरेंद्र मोदी) कुछ अमीरों को और अमीर बनाने के लिए। मेरा मानना है कि यही सोच है, जिसने एक ऐसे देश को गरीब बनाए रखा है, जिसमें शक्ति है दुनिया का सबसे अमीर देश होने की।
 
कुदरत ने भारत को हर किस्म का धन दिया है। लेकिन अगर आज भी सत्तर फीसदी भारतीय इतने बेहाल हैं कि बीस रुपये से ज्यादा नहीं खर्च कर सकते एक दिन में, तो इसका कारण है गलत आर्थिक नीतियां। ऐसी आर्थिक नीतियां, जिन्होंने दशकों से अर्थव्यवस्था की तमाम चाभियां दे रखी हैं राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों के हाथों में। लाइसेंस राज की समाप्ति के बावजूद आज भी मामूली सरकारी अधिकारी बड़े उद्योगपति की नाक में दम कर सकते हैं। यहीं से शुरू होता है, भ्रष्टाचार और काले धन का चक्रव्यूह।
 
यह सौभाग्य है कि हमारी आबादी सबसे जवान आबादी मानी जाती है-पचास प्रतिशत भारतीय पच्चीस वर्ष से कम उम्र के हैं- पर इन नौजवानों के लिए नौकरियां कहां से आएंगी, यदि उद्योगपतियों को हम निशाना बनाते रहेंगे? देश में संपन्नता कैसे आएगी, यदि कारोबारियों पर धन लूटने का आरोप लगता रहेगा, जैसे इस चुनाव अभियान में योगेंद्र जी के रहनुमा अरविंद केजरीवाल ने लगाए हैं?
 
सो जब योगेंद्र जी कहते हैं कि दो सपनों के बीच लड़ाई है इस चुनाव में, तो वह सही कह रहे हैं। दूसरा सपना वह है, जो नरेंद्र मोदी ने गुजरात में साकार करके दिखाया है। गुजरात में आज देहातों में चौबीस घंटे बिजली मिलती है। वह इसलिए कि मोदी ने नए सिरे से बिजली उपलब्ध करवाने की नीतियां बनाई हैं। गुजरात में अगर आधुनिक सड़कें बनाने के लिए निवेशक सामने आए हैं, तो इसलिए कि निजी निवेशकों के आने के कारण नौजवानों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं।
 
आम आदमी पार्टी इस देश की सबसे नई राजनीतिक पार्टी है, लेकिन अफसोस कि उसकी आर्थिक सोच पुरानी, घिसी-पिटी और तकरीबन वही है, जो कांग्रेस की हुआ करती थी इंदिरा गांधी के समय। इंदिरा जी को समाजवाद में इतना विश्वास था कि उन्होंने आपातकाल के दौरान संविधान में संशोधन कर यह शब्द जोड़ दिया था भारत की पहचान में। यह वह जमाना था, जब सोवियत संघ की खोखली अर्थव्यवस्था की जानकारी नहीं थी हमें, जब जानते नहीं थे हम कि माओ त्से तुंग की आर्थिक नीतियों के कारण करोड़ों चीनी भूखे मर गए थे। सो आज ऐसी आर्थिक नीतियों में विश्वास रखना, जो दोबारा अर्थव्यवस्था की सारी चाभियां पकड़ा देंगी सरकारी अधिकारियों के हाथों में, पागलपन नहीं, तो क्या है? लेकिन यही है आप के सपनों की दुनिया। दूसरी तरफ है संपन्न, समृद्ध भारत का सपना, जो हकीकत तभी बन सकेगा, जब आम आदमी को आर्थिक आजादी मिलेगी, जब सरकारी अधिकारियों की भूमिका धन पैदा करने की नहीं, बल्कि धन पैदा करवाने वालों को सहायता देने की होगी।
 
योगेंद्र यादव ठीक कहते हैं। इस चुनाव में लड़ाई दो विचारधाराओं की है। ऐसा चुनाव पहली बार हो रहा है अपने देश में, क्योंकि राजनीतिक पार्टियों ने हिम्मत नहीं की है समाजवाद से अलग कोई सपना देखने की। इस बार यदि मतदाता विकास की बातें कर रहे हैं, तो इसलिए कि नया सपना वे देखना चाहते हैं।
 
 
- तवलीन सिंह
साभारः अमर उजाला

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