हावी है नौकरशाही

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से नौकरशाही को प्रोत्साहित करने की कोशिश की है, उससे हर कोई खुश नहीं है। इससे नाराज होने वालों का मानना है कि प्रशासनिक अधिकारी तो पहले ही मंत्रियों की बात नहीं सुनते, अब अगर नौकरशाह सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करेंगे, तो पूरी मंत्रिमंडलीय प्रणाली ध्वस्त हो जाएगी। प्रधानमंत्री जिन सांसदों पर भरोसा करके उन्हें मंत्रिमंडलीय टीम का हिस्सा बनाते हैं, उनका सशक्तीकरण भी जरूरी है। इसके विपरीत ब्यूरोक्रेसी अगर सीधा प्रधानमंत्री से बात करेगी, तो मंत्रियों का कोई महत्व नहीं रह जाएगा।

नौकरशाही का लोकतांत्रिक ढांचे पर कितना दबदबा है, इसके लिए एक उदाहरण काफी है। यूपीए शासनकाल में ब्यूरोक्रेसी को जवाबदेह बनाने के लिए सूचना का अधिकार कानून बनाया गया। कांग्रेस ने अपने चुनाव अभियान में इसे अपनी बड़ी उपलब्धि की तरह पेश किया। लेकिन यह कानून भी नौकरशाही के जाल में फंस गया है। समूचे देश में ऊपर से लेकर नीचे तक सूचना का अधिकार तंत्र पर ब्यूरोक्रेसी का कब्जा हो चुका है। देश के मुख्य सूचना आयुक्त से लेकर ज्यादातर राज्यों के सभी मुख्य सूचना आयुक्त रिटायर्ड आईएएस हैं। हालांकि ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, लेकिन हो यही रहा है।

यही पंचायती राज कानून के मामले में हुआ था। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में पंचायती राज प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में कानून बना था। विभिन्न राज्यों ने ऐसे दर्जनों कार्यों की पहचान करके बाकायदा अधिसूचना जारी की, जिन्हें पंचायतों को सौंपा गया था। लेकिन अधिकतर राज्यों में पंचायतों को जमीन पर कोई अधिकार नहीं मिला, चुने हुए जिला पंचायत अध्यक्ष, पंचायत अध्यक्ष अब भी छोटी-छोटी मांगों के लिए नौकरशाहों के सामने गिड़गिड़ाते हैं। नौकरशाहों ने संसद के बनाए कानून को जमीन पर उतरने ही नहीं दिया।

पिछले 35-40 वर्षों में राजनीतिक ढांचा कमजोर हुआ है और नौकरशाही मजबूत हुई है। पहले मंत्री अपने दौरों में प्रायः अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को अहमियत देते थे, इससे अधिकारियों को संदेश जाता था कि जनता का प्रतिनिधि सीधे जनता से जुड़ा हुआ है। पहले किसी कार्यक्रम के निमंत्रण पर मंत्री उस जिले की अपनी पार्टी की इकाई से पूछते थे कि निमंत्रण स्वीकार किया जाए या नहीं। अब मंत्री अपने दौरे के निमंत्रण पर सिर्फ जिलाधीश से पूछते हैं, सिर्फ अधिकारियों के साथ बैठक करते हैं.

अगर सचमुच कामकाज की संस्कृति बदलनी है, तो देश की राजनीति के साथ ही नौकरशाही के रवैये को भी बदलना होगा। बदलते देश का एक बड़ा सच यह भी है कि देश के ज्यादातर प्रशासनिक अधिकारी तबतक अपना ई-मेल खोलकर नहीं देखते, जबतक कि उन्हें फोन पर ई-मेल भेजे जाने की सूचना न दी जाए। ई-मेल या पत्रों का तुरंत जवाब देने वाली संस्कृति तो बहुत दूर है।

 

- अजय सेतिया (वरिष्ठ पत्रकार)

साभारः हिंदुस्तान