स्कूलों को बंद होने से बचाने को प्रधानमंत्री से लगाएंगे गुहार

निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से लागू किया गया शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) ही विद्यार्थियों की शिक्षा के राह का रोड़ा बन रहा है। आरोप है कि आरटीई के कुछ दोषपूर्ण उपनियमों के कारण देशभर के करीब एक लाख से अधिक छोटे स्कूल बंदी के कगार पर जा पहुंचे हैं। ऐसे स्कूलों की संख्या करीब 300 है, जो जमीन की अनिवार्यता के चलते 31 मार्च के बाद बंद हो जाएंगे। ऐसे में परेशान स्कूलप्रबंधक 24 फरवरी को जंतर-मंतर पर एकत्र होंगे। इस दौरान वे प्रधानमंत्री से स्कूलों की मान्यता के मामले में गुजरात मॉडल को देशभर मे लागू करने की मांग करेंगे।

छोटे स्कूलों का अखिल भारतीय संगठन नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स एलांयस (नीसा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष कुलभूषण शर्मा ने बताया कि सबको शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से लागू कानून के नियम ही अब स्कूलों के लिए मुश्किल बन रहे हैं। उन्होंने कहा कि देशभर में ऐसे स्कूलों की संख्या करीब एक लाख है। यदि ये स्कूल बंद होते हैं तो इसका प्रभाव करीब 3 करोड़ विद्यार्थियों पर पड़ेगा। सबसे ज्यादा परेशान नए कानून के अन्तर्गत मान्यता के लिए राज्य सरकारों की ओर से लागू की जा रही जमीन की अनिवार्यता है। अलग-अलग राज्य में लागू इस विषय में अलग-अलग नियम को लेकर परेशान स्कूल प्रबंधक 24 फरवरी को जंतर-मंतर पर एकत्र होंगे। शर्मा ने कहा कि निशुल्क शिक्षा, मिड डे मील, फ्री वर्दी, किताबें आदि प्रदान करने के बावजूद छात्रों के अभाव में सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं, लेकिन सरकार यह समझने को तैयार नहीं कि अभिभावक बच्चों का भविष्य संवारने के लिए मुफ्त नहीं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहते हैं।

सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के एसोसिएट डायरेक्टर अमित चंद्र का कहना है कि आरटीई कानून को लेकर यदि गुजरात मॉडल को अपनाया जाता है तो इस कानून से जुड़ी समस्याओं का हल निकल सकता है। वहां स्कूलों की मान्यता बरकरार रखने व नए स्कूलों को मान्यता प्रदान करने के लिए जमीन व अन्य आवश्यक संसाधनों से अधिक महत्व विद्यार्थियों के लर्निग आउटपुट को दिया था। यानी पढ़ा कितना समझ में आया उसके आधार पर स्कूलों को मान्यता का निर्धारण किया गया। जंतर-मंतर पर एकत्र होकर स्कूल प्रबंधक प्रधानमंत्री से यही मांग करेंगे कि गुजरात के स्कूलों में अपनाया गया मॉडल देश भर में लागू किया जाए।

 

- साभारः दैनिक जागरण