गरीब के नाम पर होनेवाला खर्चा सबसे गरीब तक पहुंचता नहीं – शेट्टीगार

भारतीय जनता पार्टी के नेता जगदीश शेट्टीगार जानेमाने अर्थशास्त्री भी है। पिछले दिनों सतीश पेडणेकर ने उनसे बजट और वर्तमान आर्थिक स्थिति पर बातचीत की। प्रस्तुत है यहां उसके कुछ अंश -

पहले बजट का उद्देश्य आर्थिक नीति की दिशा तय करना था लेकिन कहा जाता है कि अब वह बैलेंस आफ बुक ही रह गया है। आपका इस बारे में क्या कहना है?

पहले भी बजट का मकसद होता था  आर्थिक नीति की दिशा तय करना आज भी वही है। लेकिन हालात कई बार ऐसे  हो जाते  है कि वह दिशा स्पष्ट नहीं हो पाती। उदाहरणार्थ अभी स्थिति बहुत नाजुक है। उसे देखते हुए नहीं लगता कि दिशा कोई तय की गई  है। पिछले कुछ सालों से सरकार की खर्चा बहुत बढ़ा है उसके कारण घाटा भी बढ़ा है।सरकार ने जो राजकोषीय घाटा बिल पास किया है उसके मुताबिक तो राजस्व घाटे पर काबू पाना ही है लेकिन वह ऐसा कर नहीं पाएंगी।

काबू करने के दो ही रास्ते हैं कि कुछ टैक्स बढ़ाएं जैसे आयात शुल्क या उत्पादन शुल्क बढ़ाया जाए।लेकिन उसे बढ़ाया तो जो महंगाई कुछ काबू में आ रही है वह बढ़ सकती है। इसके अलावा जो पापुलिस्ट कदम उठाए गए हैं जैसे मनेरगा या किसानों की कर्ज माफी आदि में कटौती करना पड़ेगी। लेकिन सरकार यह कर नहीं पाएगी। आज जो आर्थिक स्थिति है उसे ठीक करने के लिए यह बजट आखिरी मौका है क्योंकि अगले साल चुनाव से पहले का बजट होगा जिसमें ज्यादातर पापुलिस्ट कदम ही उठाए जाते हैं क्योंकि सरकार में रहनेवाली पार्टी को चुनाव की तैयारी करना पड़ती है। उस पर अभी राजनीतिक स्थिरता नहीं है इसलिए 2014 से पहले भी चुनाव हो सकते हैं। इस राजनीतिक अस्थिरता के कारण वित्तमंत्री से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह कठोर कदम उठाएं। इसलिए लगता नहीं कि सरकार अर्थव्यवस्था को दिशा देने का काम ठीक से कर पाएगी।

कहा यह जा रहा है कि राजस्व घाटा बहुत ज्यादा होने के कारण वित्तमंत्री के पास बहुत विकल्प नहीं है।

जबसे वित्तीय घाटा बिल पास हुआ है तब से ही सरकार को घाटा कम करने की कोशिश  जानी चाहिए थी लेकिन वह की नहीं गई इसलिए घाटा बढ़ता गया। हालांकि इसके लिए वे मनेरगा और किसानों को ऋण माफी को जिम्मेदार ठहराते हैं। लेकिन कई और बाते है जिनमें कटौती की जा सकती है। जैसे हर साल कहते हैं कि खाद की सब्सिड़ी को 30000करोड़ रूपये तक लाएंगे लेकिन हर साल सब्सिड़ी आखिर में 90000 करोड़ तक पहुंच जाती है। इसका मतलब है कि उस पर कोई कंट्रोल नहीं है। सबसे बड़ी गड़बड़ी यह हो रही है खाद सबसिडी में कि वहां कोई प्रयास नहीं हो रहा सुधार लाने का।वहां लाबी काम करती हैं । वह कोई सुधार लाने नहीं देतीं। जरूरी यह है कि जो सब्सिड़ी दी जा रही है वह सीधे किसान तक जाए न कि खाद कंपनियों को ।इस तरह  वहां थोड़ी बचत हो सकती है।यदि सरकार खर्चा कम करना चाहती है उसका तरीका यह है कि सब्सिडी पर कंट्रोल करे। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव पास आ रहे हैं यह करना मुशकिल  हैं। दूसरा उपाय हो सकता है टैक्स बढ़ाओ।प्रत्यक्ष कर बढाने का मतलब है लोगों को नाराज करना।जो अप्रत्यक्ष कर है जैसे उत्पादन शुल्क है या आयात शुल्क है उसे बढ़ाने का मतलब है कीमतें बढ़ाना। उसका बोझ आखिरकार आमआदमी को ही भुगतना पड़ेगा। दोनों ही तरीकों के अपने-अपने खतरे हैं।मुझे तरस आता है कि वित्तमंत्री की आज की स्थिति बहुत गंभीर है। ऐसे में पार्टी ने खाद्य सुरक्षा बिल भी भेज दिया है। लोगों को खाद्य सुरक्षा देना अच्छा है लेकिन उसे लागू करने के लिए सरकार पर  एक लाख करोड़ से ऊपर बोझ पड़ेगा। 

आपको क्या लगता है कि खाद्य सुरक्षा बिल बहुत फायदेमंद  नहीं है?

मैं खाद्य सुरक्षा बिल के खिलाफ नहीं हूं । सवाल यह है कि गरीब आदमी को मदद देना है या सब्सिडी देना है उसे कैसे लागू करें। देना तो चाहिए । राजग सरकार ने भी गरीबों को 35 किलो चावल देने की योजना बनाई थी। इन्होंने उसे कानून बना दिया।  बिल आने के बाद यह लोगों का मौलिक अधिकार बनता है। तब तो सरकार को करना ही है नहीं कर पाएगी तो सरकार कटघरे में खड़ी होगी। सवाल यह है कि सरकार के पास पैसा कहां से आएगा।

इसलिए मेरा कहना है यदि लागू करना है तो सही तरीके से लागू करो। आम आदमी को जिसको जरूरत है उसके दे दीजिए। हम कई बरसों से राशन की स्कीम चला रहे हैं लेकिन जो सबसे गरीब से गरीब आदमी है उसको इसका लाभ मिल रहा है क्या ? गरीब आदमी है वह दिन में मजदूरी करता है और शाम को पैसा लेकर आता है। पहली बात यह है कि जब वह शाम को आता है तब राशन की दुकानें बंद होती हैं।वह अपना सामान खुले बाजार से ज्यादा पैसे देकर खरीदता है। उसको राशन की दुकान का लाभ नहीं मिलता। दूसरी बात यह है कि पंद्रह दिन का कोटा एक दिन में लेना पड़ता है। केवल केरल में  सप्ताहिक कोटा है।जो रोजाना कमानेवाले लोग है उनके पास अपना एक हफ्ते का कोटा लेने के लिए पैसा कहां से आएगा।आप  स्कीम चला रहे हैं गरीब आदमी के नाम पर लेकिन जो गरीब  से गरीब आदमी है उसे उसका लाभ नहीं मिल रहा है।वह बेचारा खुले बाजार में खरीदता है। होता यह है कि राशन कार्ड तो बहुत सारे लोगों के बनते हैं । लोग अपना राशन कार्ड इसलिए भी बनवाते हैं क्योंकि वही अबतक पहचान पत्र होता था। लेकिन मध्यम वर्ग के लोग राशन की दुकान से राशन नहीं खरीदते लेकिन सरकारी कोटे से उनके नाम का राशन तो आता है राशनवाला अपनी खुली मार्केट की दुकान पर उसे बेचता है। इसलिए हम गरीब आदमी के नाम पर जो खर्चा कर रहे हैं वह गरीब से गरीब आदमी तक पहुंचता नहीं है। इसलिए एक सोच चल रहा है फूड स्टांप देने का । जिस परिवार को हमें जितना भी देना है उसके फूड स्टांप उसे दे दें ।फिर वह खुले बाजार में जाकर उसे एनकैश कराए। या उसे उतना पैसा दे दो। बिना सुधार किए आप देंगे तो वह सही आदमी तक पहुंचेगा नहीं। मैं खाद्य सुरक्षा का विरोधी नहीं हूं पर उससे पहले इस बारे में सोचने का हिमायती हूं कि वह जरूरतमंद आदमी तक कैसे पहुंचे।

कहा जा रहा है कि इस बजट  में सर्विस टैक्स बढेगा या सर्विस टैक्स का दायरा बढ़ेगा इस बारे में आपका क्या कहना है। 

हमारा सकल घरेलू उत्पाद का 50 प्रतिशत से ज्यादा सर्विसेज से आता है। लेकिन ज्यादातर सर्विसेज टैक्स के दायरे में नहीं है.इसलिए सरकार पर दबाव है घाटा कम करने और राजस्व बढाने के लिए उन पर टैक्स बढ़ाया जाए। हम अभी महाशक्ति बनने की तरफ बढ़ रहे हैं लेकिन आर्थिक महाशक्ति कहे जानेवाले देशों में टैक्स का बड़ा हिस्सा सर्विस सेक्टर से आता है। इसलिए ज्यादा सर्विसेज को इस दायरे में लाना चाहिए।

इस बजट में क्या बिग आयडिया होना चाहिए?

सरकार और वित्तमंत्री के सामने एक चुनौती है  वह है सरकार के प्रति विश्वास की कमी की। इस चुनौती से निपटना जरूरी है। एक अनुमान के मुताबिक  बड़े –बड़े उद्योगो के पास 50हजार करोड़ की पूंजी है लेकिन वे अभी उसको निवेश नहीं कर रहे। हिचक रहे हैं । एक बड़े उद्योगपति ने मुझे यह भी कहा कि हम देश के बाहर अवसर  तलाश रहे हैं । तो यह सीधा सीधा सवाल है क्यों ।क्योंकि उन्हें गवर्नेंस में अस्थिरता दिखाई दे रही है। एक दो बैंकरो ने गवर्नेंस की कमी के बारे में शिकायत भी की है। इन सभी में दोबारा  विश्वास पैदा करना जरूरी है ताकि वे हमारे देश में निवेश करें। अगर वे विदेशों में निवेश करते हैं तो उससे हमें क्या लाभ होगा। यदि हमारे उद्योगपति बाहर निवेश करते है तो हमें क्या लाभ होगा । यहां रोजगार कैसे पैदा होंगे। हमारा विकास कैसे होगा। जरूरी यह है कि हमें हमारे पूंजीपतियों के निवेश के साथ-साथ विदेशी निवेश भी मिले लेकिन इसके लिए जरूरी है कि उनमें हमारी प्रणाली के प्रति विश्वास पैदा हो।

हमारे देश में सबसे पिछड़ा हुआ है कृषि क्षेत्र ।उसके विकास के लिए बजट में क्या कदम उठाए जाने चाहिए?

पिछले बीस पच्चीस साल से कृषि में सार्वजनिक निवेश कम हुआ है। वहां सार्वजनिक निवेश बढ़ाना जरूरी है । लेकिन तब सवाल आता है संसाधन कहां से आएं तो कुछ खर्चे में बचत करके संसाधन बढ़ा सकते हैं। सबसे ज्यादा बचत खाद की सब्सिडी में हो सकती है। हर साल सरकार तीस हजार करोड़ की सब्सिडी की घोषणा करती है लेकिन वह 90 हजार करोड़ से ऊपर हो जाती है।लेकिन फर्टीलाइजर लाबी इस सुधार को होने नहीं देती ।1991 से यह सुधार करने की कोशिश की जा रही है ।मनमोहन सिंह,जसवंत सिंह,यशवंत सिन्हा ने फर्टीलाइजर सुधार की कोशिश की लेकिन वे सफल नहीं हो पाए। यह सुधार हो तो बहुत बचत हो सकती है। इसके अलावा ऋषि क्षेत्र में निजी निवेश को भी बढावा दिए ञाने की जरूरत है इसके लिए कृषि क्षेत्र में सुधार होना भी जरूरी है। जबतक कृषि क्षेत्र में सुधार नहीं होगा तबतक वहां निवेश नहीं बढ़ सकता ।

ईंधन या तेल की कीमतों को लेकर यह भी कहा जा रहा कि डीजल के भावों को डीकंट्रोल किया जाना चाहिए, डीजल कारों पर कर बढ़ाए जाने चाहिए और कोरोसिन के दामों में भी वृद्धि की जानी चाहिए।

कुछ सुधार करके जिसको जरूरत है उसे कुछ दिया जाना चाहिए लेकिन सीधे-सीधे सब्सिडी देना ठीक नहीं है।क्योंकि 30प्रतिशत से ज्यादा की तो काला बाजारी हो रही है।यह जो कहा जाता है कि  केरोसिन गरीब आदमी का ईंधन है यह सही नहीं है बहुत से लोग उसका इस्तेमाल कर रहे होंगे लेकिन ज्यादातर उसका गलत इस्तेमाल हो रहा है।लेकिन जिनको जरूरत है उनको कुछ सुधार करके दिया जा सकता है जैसे फूड कूपन की बात चल रही है उसी तरह इसके कूपन देने के बारे में सोचा जा सकता है।

यह सही है विश्व बाजार में पैट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़ रहे हैं । लेकिन उस पर पचास प्रतिशत तो टैक्स लग रहा है। विदेशों में टैक्स प्रतिशत के हिसाब से नहीं लगता वह फिक्स ड्यूटी है। एक लिटर में इतना पैसा लेकिन यह नहीं है कि दस प्रतिशत या बीस प्रतिशत । हमारे यहां जैसे –जैसे पैट्रोल की कीमते बढ़ रहा है उसके साथ सरकार का टैक्स भी बढ़ रहा है। एक टैक्स रिफार्म कमेटी की सिफारिश भी है कि पैट्रोलियम पदार्थो पर फिक्स डयूटी लगाई जाए ताकि आम लोगों पर उसका ज्यादा  बोझ न पड़े।अभी तो पैट्रोल के दाम बढ़ रहा है और सरकार का राजस्व भी बढ़ रहा है कि इस तरह लोगों को एक साथ दो बोझ उठाना पड़ रहे है। वहां सुधार करने का जरूरत है।

पिछले कुछ समय से जनता को एक गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है वह है महंगाई। क्या बजट के जरिये महंगाई को कम करने के लिए कुछ कदम उठाए जा सकते हैं?

जहां तक महंगाई का सवाल है एक्साइज ड्यूटी या आयात कर कम करके महंगाई को कुछ कम किया जा सकता है। लेकिन लगता नहीं कि सरकार इसे कम कर पाने की स्थिति में होगी।

प्रत्यक्ष करों को लेकर बहस चल रही है क्या प्रत्यक्ष करों की सीमा के बढ़ाया जाना चहिए?

हो सकता है आयकर की सीमा बढ़ा दी जाए । इस बारे में बात भी चल रही है।

कुछ लोग कहते हैं कि भारत में अरबपति बढ़ रहे हैं लेकिन उससे होनेवाली आय या वैल्थ टैक्स कम है उसे बढ़ाया जाना चाहिए। और बहुत बड़ा तबका है जो टैक्स देता ही नहीं है खास कर ग्रामीण क्षेत्र का उसे भी टैक्स के दायरे में लाने की कोशिश की जानी चाहिए।

भारत में अरबपति और अमीर बढ़ते जा रहे हैं उसका लाभ कैसे उठाना है।इस बोरे में अलग-अलग विचार हो सकते हैं ।एक उनकी संपति है उसपर सरकार टैक्स लगाकर पैसा खींच ले । एक जमाना था 1973 में जब इंदिरा गांधी की सरकार धी जब सबसे ज्यादा आयकर था । एक सीमा पार करने के बाद 97 प्रतिशत टैक्स लगता था । क्या हम फिर उस स्थिति में जाना चाहेंगे।अभी तो उसको घटा-घटाकर तीस प्रतिशत तक ले आए हैं। एक सोच है कि मुकेश अंबानी जो भारत के सबसे अमीर आदमी है उस पर टैक्स लगाकर उसका लाभ लेना चाहिए लेकिन  टैक्स नहीं ले रहे हैं तो क्या उसकी संपत्ति बढ़ रही है तो क्या वह उसका उपभोग कर रहा है।वो या उसका परिवार कितना उपभोग कर रहा है।अपने लाभ के लिए उपभोग करने की एक सीमा होती है। एक तो वह अपने पास पैसा  रखता है तो उसका दोगुना करता तीन गुना करता है। यदि बैंक में ऱखता है तो उसका लाभ दूसरे उद्योगपति उठाते हैं वे उसे बैंक से कर्ज के रूप में उठाते हैं।तो उद्योगपति को जो पैसा मिलता है उसे वे निवेश करते हैं।जब वे निवेश करते हैं तो उसका लाभ समाज को ही मिलता है। अब यह सोचना है कि क्या सरकार के पास पैसा देने से उसका इस्तेमाल सही ढंग से होगा या निजी हाथों में देने से इस्तेमाल अच्छी तरह से होगा।पिछले बीस साल से का हमारा अनुभव है कि निजी क्षेत्र के हाथों में देने से उसका अच्छा इस्तेमाल होता है। हम पैसा सरकार को दे भी दें लेकिन क्या उसमें पैसा बेहतर इस्तेमाल करने की क्षमता है। सरकार यदि कर सके तो अच्छी बात है लेकिन यह संभव ही नहीं है क्योंकि वहां भ्रष्टाचार है लोग धीमी गति से काम करते हैं। अभी तक का हमारा अनुभव यह है कि निजी क्षेत्र के पास पैसा रहे तो वह कुशलतापूर्वक काम करता है। कुछ काम तो सरकार को करना ही है लेकिन वहीं तक ही सीमित रहे तो अच्छा है।