बजट 2011: घाटे और विकास के बीच खींचतान

बजट के प्रस्तुत होते ही सेंसेक्स ने 600 अंकों की छलांग लगाई, लेकिन जैसे ही निवेशकों को ये समझ आया कि बजट की कुछ बातें वित्तीय घाटे को ध्यान में रखने की बजाय आंकड़ों में सुधार और आशावाद पर अधिक आधारित है, तो सेंसेक्स को नीचे गिरते भी ज्यादा वक्त नहीं लगा।

वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के बजट में कर प्रबंधन की कुशलता की कमी दिखाई पड़ती है, फिर भी इसमें वित्तीय स्थिति में उल्लेखनीय सुधार दिखाई पड़ती है और रसोई गैस, खाद और मिट्टी के तेल के लिए नकद सब्सिडी की एक नई नीति सामने रखता है।

वित्त मंत्री ने वित्तीय क्षेत्र के सात अहम विधेयकों पर फिर से विचार शुरू करने का संकल्प कर आर्थिक सुधारों की संभावनाएं बढ़ाई हैं। इनमें बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश को बढ़ाकर 49 फीसदी करने और बैंकों में विदेशी निवेशकों के मतदान अधिकार को समाप्त करने संबंधी विधेयक भी शामिल है।

मुखर्जी ने कहा कि उन्होंने अपने बजट भाषण में इन पर ज्यादा जोर नहीं दिया, क्योंकि उनकी पार्टी को संसद के दोनों सदनों में बहुमत हासिल नहीं है, लेकिन उन्हें आशा है कि इन मुद्दों पर उन्हें दूसरी सभी पार्टियों का सहयोग मिलेगा। खुदरा कारोबार के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के बारे में उन्होंने कोई वादा नहीं किया।

यूआईडीएआई प्रमुख नंदन नीलेकाणी की अगुआई में एक कमेटी मौजूदा वस्तु आधारित सब्सिडी प्रणाली को नकद सब्सिडी में परिवर्तित करने और उसे लागू करने संबंधी सुझाव देगी। नकद सब्सिडी में स्मार्ट कार्ड का इस्तेमाल किया जाएगा। आगामी अक्टूबर माह से यूआईडीएआई हर दिन 10 लाख आधार नंबर (यूनीक आईडेंटिटी) वितरित करना शुरू कर देगी और इस तरह से 2012 में किसी वक्त नकद सब्सिडी व्यवस्था को लागू कर पाना मुमकिन हो जाएगा। ये सुधार सब्सिडी में चल रही धांधली और भ्रष्टाचार को खत्म करने में काफी हद तक कारगर रहेगा।

देश के शेयर बाजार में अहम भूमिका निभाने वाले विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) भारत की वित्तीय स्थिति को लेकर काफी समय से चिंतित रहे हैं। बजट में वित्तीय घाटे के 5.1 फीसदी पर रहने का दावा किया गया है, जबकि पहले इसके 5.5 फीसदी पर रहने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। इसी तरह अगले साल वित्तीय घाटा 4.6 फीसदी पर रहने का अनुमान लगाया गया है, जिसके लिए पहले 4.8 फीसदी का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।

मिसाल के तौर पर, वित्त मंत्री ने ये आकलन रखा कि तेल सब्सिडी के इस साल के 38,386 करोड़ रुपये के मुकाबले अगले साल 23,640 करोड़ रहने का अनुमान है। हालांकि बजट में इस बात का जिक्र नहीं किया गया है कि विश्व बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के दौर में ये कैसे मुमकिन हो पाएगा। मुखर्जी शायद सोचते होंगे कि बढ़ी हुई कीमतें ग्राहकों की जेब से वसूली जाएगी, लेकिन मंत्रीमंडल में उनके दूसरे साथी शायद इसके सख्त खिलाफ हों।

अगले साल खाद्यान्न क्षेत्र में सब्सिडी बिना किसी बदलाव के 60,000 करोड़ के करीब ही रहेगी। इसकी वजह ये है कि खाद्य सुरक्षा कानून को साल 2012-13 तक के लिए टाल दिया गया है। इस कानून की वजह से सरकारी खजाने में लगने वाली सेंध को पूरी तरह रोका नहीं गया, बल्कि उसे टाला भर गया है। बजट में वित्तीय सुधार के संकेत एक मात्र टैक्स में बढ़ोतरी से ही मिलते हैं, जो कि मुख्यतः जीडीपी आंकड़ों में सुधार पर अधिक आधारित हैं।

हालांकि जीडीपी की तुलना में कर्ज का अनुपात केवल 44.2 फीसदी रहा है, जबकि 13वें वित्त आयोग ने कर्ज का अनुपात जीडीपी का 52.5 फीसदी रहने का अंदेशा जताया था। ये ध्यान देने योग्य है कि विश्व के कई देशों में यह अनुपात काफी ज्यादा है। स्पैक्ट्रम आवंटन की बोली यदि नहीं लगी होती, तो इस साल वित्तीय घाटा जीडीपी का 6.3 फीसदी होता। घाटे को अगले साल 4.6 फीसदी तक कम करने के लिए व्यय में भारी कटौती के प्रयास करने होंगे।

बजट प्रावधानों के मुताबिक हमारा कुल व्यय इस साल 12.17 लाख करोड़ रुपये है, जो अगले साल बढ़कर 12.57 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा। खर्च को इस सीमा में सीमित करना राजनीतिक तौर पर बड़ा कठिन होगा। भारतीय म्यूच्युल फंड्स में विदेशी खुदरा निवेशकों को निवेश की इजाजत देने, इंफ्रास्ट्रक्चर डेट में निवेश 25 अरब डॉलर तक बढ़ाने और कॉरपोरेट डेट में विदेशी संस्थागत निवेश की सीमा को 40 अरब डॉलर तक बढ़ाने से निवेशक उत्साहित होंगे। लेकिन डेट के क्षेत्र में विदेशी पूंजी को खुली छूट देने के अपने खतरे भी हैं।

इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा देने वाली नीतियां विदेशी संस्थागत निवेश से कहीं बेहतर विकल्प है। सरकार राज्य संचालित उपक्रमों को कर मुक्त इंफ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड्स और प्रस्तावित कर मुक्त डेट फंड के जरिए 30,000 करोड़ रुपये तक की उगाही की इजाजत देगी। इसके साथ ही डायरेक्ट टैक्स कोड और पूरे देश में वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली को लागू करने का विचार भी स्वागतयोग्त कदम हैं। हालांकि बजट में उल्लिखित कई तरह के अप्रत्यक्ष कर भविष्य के सुधार की नहीं, बल्कि 1980 के दशक की याद अधिक दिलाते हैं।

- स्वामीनाथन अय्यर

स्वामीनाथन अय्यर