घाटे में पहुंचा बीएसएनएल

सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) का घाटा 2010-11 में तीन गुना बढ़कर 6,000 करोड़ रुपये पर पहुंच गया. कंपनी ने कहा है कि 3जी और ब्रॉडबैंड वायरलेस एक्सेस (बीडब्ल्यूए) स्पेक्ट्रम के भुगतान तथा कर्मचारियों को वेतन मद में भारी राशि की अदायगी से उसका घाटा बढ़ गया.

कंपनी को 2009-10 में 1,823 करोड रुपये का शुद्ध घाटा हुआ था. कंपनी के अनांकेक्षित नतीजों के अनुसार 2010-11 में उसका घाटा 5,997 करोड रुपये रहा है. बीते वित्त वर्ष में कंपनी की कुल आमदनी भी करीब 10 प्रतिशत घटकर 28,876 करोड रुपये रह गई, जो इससे पिछले वित्त वर्ष में 32,072 करोड रुपये थी. बीएसएनएल सूत्रो के अनुसार घाटा बढने की मुख्य वजह सरकार को 3जी और बीडब्ल्यूए लाइसेंस के लिए किया गया भुगतान है. कंपनी ने इन दोनों के लिए 18,500 करोड रूपये चुकाए हैं। इससे बीते साल में कंपनी को 4,000 करोड रूपये की अन्य आमदनी का नुकसान हुआ.

कंपनी की 47 प्रतिशत से अधिक आमदनी कर्मचारियों को किए गए भुगतान में चली गई. घाटे से उबरने के लिए विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के अनुरूप अपने श्रमबल को घटाने के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (वीआरएस) ला सकती है. कंपनी ने 99,700 कर्मचारियों का आंतरिक लक्ष्य बनाया है. प्रस्तावित वीआरएस से बीएसएनएल पर 2,700 करोड रूपये का बोझ पड सकता है. सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम पुनर्गठन बोर्ड ने दूरसंचार कंपनियों, आईटीआई और एमटीएनएल के बीएसएनएल में विलय की भी सिफारिश की है. केंद्र सरकार इस कंपनी को दी जाने वाली 2,000 करोड रूपए की सालाना सब्सिडी रोकने की भी बात कही है. दिल्ली और मुंबई को छोड़कर बीएसएनएल समूचे देश में सेवाएं देती है। 31 जुलाई तक इसके मोबाइल ग्राहकों की संख्या 9.51 करोड़ थी.

कुछ समय पहले सुना था कि सार्वजनिक क्षेत्र की दूरसंचार कंपनी बीएसएनएल को घाटे से उबारने के लिए दूरसंचार विभाग खास रणनीति तैयार कर रहा है. इसके तहत दूरसंचार क्षेत्र से जुड़े अन्य सार्वजनिक उद्यमों, मसलन- आईटीआई लिमिटेड और सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ टेलीमेट्रिक्स (सीडॉट) के साथ बेहतर तालमेल के साथ संसाधनों के अधिकतम इस्तेमाल की संभावना तलाशी जा रही है. विभाग ऐसी योजना बना रहा है, जिससे इन कंपनियों के संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो सके और यह निजी क्षेत्र से मुकाबला करने में भी सक्षम हो.

एयर इंडिया के बाद बीएसएनएल का भी हाल देख कर भारत के सार्वजनिक उपक्रम क्षेत्र की खस्ता हालत का खुलासा हो जाता है. आर्थिक सुधारों के बीस साल बाद और निजीकरण के स्वाभाविक सुपरिणामों को देख कर भी संप्रग सरकार अगले फेज़ के सुधारों को लेकर निष्क्रिय देखी पड़ती है. बीएसएनएल और एमटीएनएल के विलय से अगर एयर इंडिया जैसी हालत हो गई तो फिर दो कंपनियों के कर्मचारी वेतन भत्ते और वरिष्ठता आदि मुद्दों को लेकर जंग छिड़ी रहेगी. वर्षों से घाटे में चल रही कई अन्य सार्वजनिक इकाईयों को बोझ की तरह ढोने के बजाय उनके विनिवेश और निजीकरण से यदि हम उत्पादकता और रोज़गार सृजन कर सकते हैं तो यह सभी के लिए अच्छा सौदा साबित होगा.

-- स्निग्धा द्विवेदी