रिश्वत देकर अयोग्य लोग शिक्षक बन गए..

रिश्वत देकर अयोग्य लोग शिक्षक बन गए, जब तक राज्य सरकारें इस समस्या का हल नहीं करतीं, तब तक कोई नीति बच्चों का भविष्य नहीं संवार सकती

1947 में इंग्लैंड ने भारत छोड़ दिया, लेकिन वे अपने पीछे अंग्रेजी भाषा और भारतीयों के लिए सिरदर्द भी छोड़ गए। तब से हम अंग्रेजी के अपनी जिंदगी में स्थान को लेकर लड़ रहे हैं। विशेषकर, इस बात पर कि अपने बच्चों को किस भाषा में पढ़ाएं। 

इस बहस की ताजा वजह राष्ट्रीय शिक्षा नीति है, जिसने वे जवाब दिए हैं जिसने लगभग सभी को संतुष्ट किया, सिवाय उनके जो बस नाराज ही होना जानते हैं। लेकिन, असली बाधा शिक्षक हैं। इसकी जड़ दो तथ्यों पर आधारित धर्म संकट है। पहला, बच्चा अपने शुरुआती सालों में अपनी मातृभाषा में बेहतर सीखता है।

दूसरा, अगर बच्चा दस साल की उम्र तक अंग्रेजी में धाराप्रवाह नहीं है तो उसे इसका परिणाम जिंदगीभर उठाना पड़ेगा, विशेषकर नौकरी हासिल करने में। इन दोनों ही तथ्यों को साबित करने के लिए व्यापक रिसर्च है। भाषा समर्थक और शिक्षाविद् पहले तथ्य का समर्थन करते हैं, लेकिन अभिभावको का जोर दूसरे पर होता है।

इसका जवाब एकदम आसान हैः बच्चों को पहली से पांचवी तक उसकी मातृभाषा में पढ़ाएं, लेकिन साथ ही अंग्रेजी की तगड़ी खुराक भी दें, ताकि वह 10 साल का होने तक इसमें धारा प्रवाह हो जाए। क्योंकि एक बच्चा प्राकृतिक तौर पर द्विभाषी होता है, इसलिए यह संभव है।

निर्देश दो भाषाओं में दें। कला को मातृभाषा और विज्ञान को अंग्रेजी में पढ़ाएं। असली दिक्कत यह है कि एक औसत भारतीय शिक्षक तो पढ़ा ही नहीं पाता, केवल अंग्रेजी में नहीं, बल्कि किसी भी भाषा में नहीं। 2012 में बेसिक शिक्षक पात्रता परीक्षा में जांचे गए 7,30,000 शिक्षकों में से 91 फीसदी फेल हो गए थे। यह नीति नहीं बल्कि शासन की विफलता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति मे राज्यों, स्कूलों और अभिभावकों को पूरी स्वतंत्रता दी गई है। मातृभाषा में सीखने कीक जबरदस्त संस्तुति के बावजूद, इसमें अंग्रेजी माध्यम स्कूलों पर प्रतिबंध से साफ इनकार किया गया है। इसे बनाने वालों ने प्राइमरी स्कूलों में अंग्रेजी को प्रतिबंधित करने से बंगाल, गुजरात, उत्तर प्रदेश और कई अन्य राज्यों में हुए नुकसान को ध्यान में रखा है। सूचना क्रांति को अपनाने में विफल इन राज्यों ने अब यू-टर्न ले लिया है।

भाजपा और आरएसएस ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति को स्वीकार करके एक तरह से हार मानी है। इसका एक सबसे पुराना और प्रिय प्रोजेक्ट अंग्रेजी से छुटकारा पाना और हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना था। पिछले साल ही अमित शाह ने हिंदी का शिगूफा भी छोड़ा था। आज हिंदी को थोपना वोट गंवाना है। न केवल दक्षिण में बल्कि सभी गैर-हिंदी भाषी राज्यों में।

भाजपा-आरएसएस को समझ आ गया है कि हिंदी तो बॉलीवुड, एफएम रेडियो और क्रिकेट की वजह से खुद ही तेजी से फैल रही है। इसलिए इसे थोपने और चुनाव हारने की जरूरत नहीं है। हिंदी अपनी गति से ही राष्ट्रीय बन जाएगी।

1990 में भारतीय मानसिकता में बदलाव शुरु हुआ, जब एक औपनिवेशिक भाषा का दाग छोड़कर अंग्रेजी एक भारतीय भाषा बन गई। आर्थिक सुधारों के बाद महत्वाकांक्षियों का एक मध्यम वर्ग उभरा। अपनी क्षमताओं पर भरोसा करने वाले वर्ग ने अंग्रेजी को वैश्विक अर्थव्यवस्था तक पहुंचने का जरिया समझते हुए सम्मान दिया।

सूचना क्रांति के बाद तो अभिभावकों ने अपने बच्चों को अंग्रेजी सिखाने के लिए सरकारी से निजी स्कूलों में डालना शुरू कर दिया। इससे कम खर्च वाले निजी स्कूल भी खुल गए। आज देश में 12 करोड़ बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं, जो कुल बच्चों का 47.5% है। इनमें 70 फीसदी अभिभावक 1000 रूपए से भी कम फीस देते हैं। अंग्रेजी का अब लोकतांत्रीकरण हो गया है और यह सिर्फ अभिजात्यों की भाषा नहीं रह गई है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने हमें याद दिलाया है कि द्विभाषी होने की वजह से हमें इस बार बेहतर करना चाहिए। पहले की नीति ने बड़ा सामाजिक विभाजन किया है। खान मार्केट के नेतृत्व वाले संपन्न लोग अंग्रेजी स्कूलों में जाते थे और सदर बाजार के आम लोग हिंदी स्कूलों में। व्यापार, सरकार या राजनीति में इन आम लोगों की राय का कोई महत्व नहीं था।

वापस से धर्म संकट परः अंग्रेजी का विकास मातृभाषा की कीमत पर नहीं होना चाहिए। भाषा सिर्फ संवाद के लिए नहीं है। यह नए विचारों और नई भावनाओं का स्त्रोत भी है। भाषा के बिना मैं सोच और महसूस नहीं कर सकता। मेरी सलाह को माना जाएगा तो कोई भी अंग्रेजी मीडियम स्कूल नहीं रहेगा।

सिर्फ द्विभाषी स्कूल ही रहेंगे। आज तकनीक मदद कर सकती है। तमाम ऐप की मदद से अंग्रेजी में दक्षता हासिल की जा सकती है। यही नहीं शिक्षकों का वेतन अब सम्मानित स्तर पर है, इसलिए द्विभाषी शिक्षकों को तैनात किया जा सकता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति शिक्षण को अहम मानती है, इसीलिए उसने चार साल की बीएड डिग्री की सिफारिश की है। लेकिन भारत की समस्या गवर्नेंस की है। रिश्वत देकर अयोग्य लोग शिक्षक बन गए हैं। जबतक राज्य सरकारें इस समस्या का हल नहीं करतीं, तबतक कोई भी अच्छी नीति भारतीय बच्चे का भविष्य संवारने में मदद नहीं कर सकती।
 

- गुरचरण दास (लेखक इंडिया अनबाउंड के लेखक और जाने माने स्तंभकार हैं। लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के निजी विचार हैं।)

साभारः दैनिक भास्कर 

गुरचरण दास