ब्लू लाइन: दिल्ली का मर्ज़ या दवा

‘किलर लाइन’ के नाम से कुख्यात ब्लू लाइन बसों का दिल्ली की सड़कों से हटाया जाना एक संवेदनशील मुद्दा है जिस पर अलग अलग किस्म की राय व्यक्त की जा रही हैं. जहां कई यह मानते हैं कि सैंकड़ों जानें ले चुकी इन बसों का दिल्ली की सड़कों से चले जाना ही अच्छा है, एक ऐसा वर्ग ये भी समझता है कि तेज़ रफ़्तार और समय से चलने वाली ब्लू लाइन बसें दिल्ली की लाइफ लाइन थीं और उन का चला जाना एक नुकसान है.

पर यहाँ हमें सार्वजनिक नीति के दोषों के बारे में भी सोचना चाहिए जिन की वजह से शहर में पब्लिक यातायात इतना त्रुटिपूर्ण है.

दिल्ली सरकार के एक हालिया आदेश के अनुसार करीब 2400 ब्लू लाइन बसें दिल्ली की सड़कों से 14 दिसंबर तक हटा दी जायेंगी. इन में से 1600 बसें कामनवेल्थ खेलों के पहले ही शहर से हटा दी गयी थीं और बाकी बची 800 बसें भी अगले महीने तक गायब हो जाएँगी. करीब 1000 नयी लो फ्लोर बसें जो कामनवेल्थ खेलों के दौरान खिलाडियों और अन्य वी आई पी लोगों को लाने ले जाने में इस्तेमाल हुई थी, DTC की फ्लीट में शामिल कर कर दी गयी हैं. आने वाले दिनों में DTC और बसों को शामिल करने वाला है.

सामान्य जनता को और अधिक यातायात के साधन मुहैय्या कराने के लिए इन ब्लू लाइन बसों को दिल्ली की सड़कों पर कई साल पहले शामिल किया गया था. गौरतलब है कि DTC की बस सेवा लगातार घाटे मे चलती आ रही है जिस का सीधा भार आम करदाता को झेलना पड़ता है.

प्राइवेट हाथों द्वारा चलायी जाने वाली ये बसें समय के साथ एक आम दिल्ली वाले के लिए DTC का अच्छा विकल्प बन गयीं. पर जहां ये दिल्ली की पहचान बनी, वहीँ विगत कई सालों में ये लापरवाह ड्राइविंग की वजह से बदनाम भी हुईं. सैंकड़ों लोगों की जान लेने वाली इन बसों पर लोगों का बहुत क्रोध फूटा. लेकिन ब्लू लाइन बस ड्राइवर इस पूरे प्रकरण में एक प्यादा मात्र थे जो की अपने मालिकों को ज्यादा से ज्यादा मुनाफा दिलवाना चाहते थे.

दरअसल, ब्लू लाइन बसों के मालिक ठेकेदारों से अपनी बसें चलवाते हैं जो उल्टे अपना ज्यादा से ज्यादा मुनाफा बनाने के लिए ड्राइवरों को तेज़ चला कर जितना हो सके सफ़र तय करने को कहते हैं. ठेकेदारों को बस मालिकों को महीने के अंत में एक निश्चित रकम देनी ही होती है और अपना भी फायदा निकालना होता है. इस चक्कर में ब्लू लाइन बसें एक दूसरे के साथ ही प्रतिस्पर्धा करती दिखाई पड़ती हैं. धीमे चला के और अपनी लेन में रह कर सिर्फ उसका नुकसान ही है. हर एक को आगे बढने का जूनून रहता है और ज़्यादातर बस मालिक बसों में लगे गति नियंत्रक यन्त्र को भी निकाल फेंकते हैं. माना जाता है इस में परिवहन विभाग के लोगों की भी मिलीभगत रहती है.

यहॉ एक और बात सामने आती है कि ब्लू लाइन बस मालिको और चालको को ज़िम्मेदर तरीके से बस चलाने के लिये सरकार द्वारा किसी भी तरह का इन्सेन्टिव नहीं दिया गया. यदि कस्टमर की खुशी और सड़क सुरक्षा के लिये कोई आर्थिक प्रोत्साहन दिया गया होता, तो आज शायद तस्वीर कोइ और ही होती. चूंकि ब्लू लाइन ड्राइवर के सामने सिर्फ व्यक्तिगत मुनाफा होता था, उस के लिये सामन्य जन और उन की दिक्कत गौण हो चली थी.

हमारी न्याय प्रणाली भी यहाँ कम दोषी नही. शायद ही आज तक किसी गलती करने वाले ड्राईवर को सज़ा मिली हो जिस से ये सन्देश पहुंच सके कि एक आम आदमी का जीवन कितना महत्त्वपूर्ण है.

हालांकि जो बस ड्राईवर इस पूरे प्रकरण में सबसे ज्यादा आलोचना का शिकार होता है, उसके हाथ एक मामूली मासिक आय ही आती है. किलो मीटर के हिसाब से कुछ और छोटे भत्ते भी इन को मिलते हैं. ब्लू लाइन बसों के दिल्ली से साफ़ हो जाने के बाद इन्ही के परिवारों को सब से ज्यादा दिक्कत का सामना करना पड़ेगा.

सरकार अब दिल्ली में क्लस्टर बस सेवा भी लाने की सोच रही है जिसके तहत बड़े कारपोरेट संस्थानों को कुछ निश्चित रास्तों पर बस चलाने की ज़िम्मेदारी दी जाएगी. ऐसी प्रणाली पहले से पैरिस और लन्दन जैसे शहरों में है. पर आलोचकों का कहना है की गरीब लोगों के पैरों पर लात मार के किसी सांठगांठ के तहत सरकार कुछ निजी कारपोरेट संस्थानों का फायदा करना चाहती है.

अगर ब्लूलाइन बसों को हटा कर दिल्ली सरकार समय पर नई व्यवस्था लाती है और डीटीसी के बेड़े में पर्याप्त संख्या में बसें शामिल करती है, तो निश्चित रूप से यह शहर वासियों के लिए काफी सुकून भरा होगा पर अगर DTC फिर घाटे मे चलती जाती है, तो ये कर दाता के लिये अन्यायपूर्ण होगा. और अगर सरकार वैकल्पिक व्यवस्था कर पाने में ही नाकाम होती है, तो दिल्ली वासियों की मुसीबतें और बढ़ जाएंगी और सार्वजनिक परिवहन के संसाधनों जैसे कि मेट्रो पर अधिक भार पड़ेगा.

सरकार को चाहिये कि वो अगर निजी कम्पनियो को बसे चलाने का काम फिर से देती है, तो मिनिमम फ्लीट का एक नियम बना दे जिस के तहत बस लाइसेंस सिर्फ उन को दिया जायेगा जो कम से कम 10 से 15 बसें चलाएंगे. कम बस चलाने में मालिक सिर्फ अपने छोटे मोटे मुनाफे पर ध्यान देगा. और बड़ी कंपनियों की जगह सरकार को छोटे लोगों या कोआपरेटिव को भी ये ज़िम्मेदारी देनी चाहिए. ब्रांडिंग भी एक अच्छा तरीका है जिस के तहत हम ये जान सकेंगे कि कौन सी बस दूसरी से बेहतर है. उदाहरण के तौर पर दिल्ली में चलने वाली रेडियो कैब सेवा ने ब्रांडिंग और अच्छी कस्टमर सेवा से काफी नाम कमाया है.

- स्निग्धा द्विवेदी