स्निग्धा द्विवेदी's blog

दुनिया की कोई भी विचारधारा हो, यदि वह समग्र चिंतन पर आधारित है और उसमें मनुष्य व जीव-जंतुओं सहित सभी प्राणियों का कल्याण निहित है; तो उसको गलत कैसे ठहराया जा सकता है। इस पृथ्वी पर साम्यवाद एक ऐसी विचारधारा है जिसके संदर्भ में गभीर चिंतन-मंथन करने से ऐसा प्रतीत होता है कि इसके प्रेरणा पुरुषों ने यह नया वैचारिक रास्ता खोजते समय समग्र चिंतन नहीं किया। मात्र कुछ समस्याओं के आधार पर और वह भी पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर, इस रास्ते को खोजा। यही कारण है कि साम्यवाद एक कृत्रिम विचारधारा के सदृश प्रतीत होती है। यदि दुनिया में इस विचारधारा का प्रभाव और उसके अनुयायियों की संख्या तेजी से घट रही है तो फिर अनुचित क्या है ?

भारतीय-शैली के साम्यवाद के बारे में ही जानने वाले पश्चिम बंगाल में वर्षों की ऊहापोह के बाद आखिरकार बदलाव का समय आ गया लगता है। यह राज्य महत्वपूर्ण आर्थिक विकास के मुद्दों के मामले में सभी बड़े राज्यों में लगभग सबसे नीचे के स्तर पर है, जैसे कि वहां ग़रीबी सीमा रेखा के नीचे रहने वालों का प्रतिशत सबसे ज्यादा है।

लोकप्रियता की लहर पर सवार होकर कोलकाता के रायटर्स बिल्डिंग पर कब्ज़ा करने की उम्मीद रखने वाली ममता बैनर्जी की जीत पश्चिम बंगाल की कमज़ोर होती अर्थव्यवस्था के लिए क्या मायने रखती है?

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विकिलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे ने हाल में खुलासा किया है कि स्विस बैंक में सबसे ज्यादा खाते भारतीयों के हैं। उन्होंने इस बात का भी संकेत दिया कि सूची में शामिल भारतीयों के नाम सार्वजनिक किए जाएंगे। उन्होंने  कहा कि इन निजी स्विस बैंकिंग संस्थानों में आपको खाता खोलने के लिए कम से कम 10 लाख डॉलर की जरूरत होती है, जो काफी ज्यादा राशि है और यह किसी आम भारतीय के पास नहीं होती। उन्होंने कहा कि विदेशी बैंकों में काला धन छिपाकर रखने का मुद्दा स्थानीय स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार से भी बदतर है, क्योंकि इसमें धन को देश से बाहर भेज दिया जाता है। असांजे ने कहा कि हर बार वे रुपए को बेचते हैं, जिसके नतीजतन देश की मुद्रा का मूल्य कम होता है।

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भारत मे भ्रष्टाचार रोकने के लिये जनलोकपाल विधेयक लाने की मांग कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे दिल्ली के जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे हुये हैं और उन के द्वारा शुरु किये गये अन्दोलन मे मालूम पूरे देश भर का जन मानस जुड़ गया है. जैसे लोगों को अपनी दबी हुई कुंठा और व्यथा अभिव्यक्त करने के लिए एक मंच, एक आवाज़ मिल गयी हो.

देश भर के कार्यकर्ता इसे आजादी की दूसरी लड़ाई करार कर रहे हैं और इस काम में उनका साथ मेधा पाटकर, किरण बेदी, बाबा रामदेव, श्री श्री रविशंकर, अरविंद केजरीवाल, एडवोकेट प्रशांत भूषण, संतोष हेगड़े, स्वामी अग्निवेश जैसे समाजसेवी भी शामिल हैं।

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एक आंकडे के मुताबिक़ करीब सात करोड़ भारतीयों ने क्रिकेट वर्ल्ड कप फ़ाइनल मैच देखा. श्री लंका के विरुद्ध ये मैच जीत कर भारत ने 28 साल बाद ये कप एक बार फिर अपने नाम कर लिया. ये कप जीत कर धोनी और उसकी टीम ने  भारतीयों को गर्व, प्रसन्नता और एक एकजुटता के सूत्र में पिरो दिया.  आंकड़ो के अनुसार प्रत्येक दर्शक ने 6 घंटे या 187 मिनट ये मैच देखने में लगाए. 64% केबल और सैटलाइट वाले घरों में ये मैच देखा गया. ये भारतीय टेलिविज़न के इतिहास में एक रिकॉर्ड था.

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आज के समय में सरकार की वो भूमिका नहीं रह गयी है जिसकी आज़ादी के समय परिकल्पना की गयी थी. आज जिस तरह निजी सेक्टर और दूसरे नागरिक संगठन समाज की ज़रूरतों को पूरा करने में लगे हुए हैं, उसे देखते हुए सरकार को अपनी भूमिका सिर्फ आवश्यक जिम्मेदारियों के निर्वहन तक ही सीमित कर देनी चाहिए. बड़ी सरकारी मशीनरी और हानि में चलने वाली सार्वजनिक इकाइयों से राष्ट्रीय कोष को लगातार नुकसान होता है. ऋण में रहना तो किसी भी तरह से हमारी सरकार के लिए हितकारी नहीं है. इसीलिए आवश्यक है की हम राज्य सरकारों और उनके द्वारा चालित इकाइयों को छोटा करें और उनका प्रदर्शन सुधारे.

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सुप्रीम कोर्ट ने हाल मे सरकार से पूछा कि वह विदेशी बैंकों में ब्लैक मनी जमा करने वाले भारतीय नागरिकों के नाम उजागर करने में आखिर अनिच्छुक क्यों है? विदेशी बैंकों में जमा काले धन के जरिए हथियार सौदों और मादक पदार्थों की तस्करी होने की आशंका को लेकर चिंता जताते हुए, कोर्ट ने ये भी पूछा कि सरकार ने विदेशों में खाता रखने वाले व्यक्तियों और कंपनियों के खिलाफ क्या कदम उठाए हैं।

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बुन्देलखण्ड के चार जनपद बांदा, चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर में बीते ढाई दशकों से प्राकृतिक संपदाओं की बेइतहां लूट जारी है। लूट के दुष्परिणामों का असर किसानों, मजदूरों और अन्य श्रमजीवियों पर पड़ रहा है। घटता जलस्तर, भू-प्रदूषण, कम होती वर्षा, विस्थापित होते हुए किसान-मजदूर और साल दर साल बदहाल होती खेती इसके बड़ी सामान्य उदाहरण हैं।

देश में कमर तोड़ महंगाई ने सब का जीना मुश्किल कर दिया है. खाने की चीजों के दाम में लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है और पेट्रोल की बढ़ती कीमतों ने मिल कर आम आदमी का बजट बिगाड़ दिया है. भारत में मुद्रास्फीति यानी महंगाई की दर दिसंबर के अंत में 18.32 फीसदी दर्ज की गई है जो कि  वर्ष 2010 में सबसे अधिक थी.

वाशिंगटन पोस्ट के स्तंभकार मैट मिलर ने वैश्विक पूंजीवाद के बारे में कुछ समय पहले एक टिप्पणी दी जिस में उन्होने कहा कि "वैश्विक पूंजीवाद के चलते चीन, भारत सहित अन्य विकासशील देशों में करोडो लोग गरीबी से बाहर निकल कर अपना स्तर सुधार तो रहे हैं पर आंशिक रूप से ये परिवर्तन अमीर देशो के कई हज़ार वर्करों की नौकरियां जाने की वजह से संभव हो पाया है".

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