स्निग्धा द्विवेदी's blog

सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, केंद्र सरकार ने मल्टी ब्रांड रिटेल कारोबार में 51 फीसदी और सिंगल ब्रांड रिटेल में सौ फीसदी [एफडीआई] प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। एफडीआई का इस्तेमाल उन्हीं शहरों में होगा जिसकी जनसंख्या 10 लाख से अधिक हो। वहीं इन कारोबारियों को 30 फीसदी माल छोटे उद्योगों से खरीदना अनिवार्य होगा।

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तिहाड़ जेल के अनेक कैदियों को आकर्षक पैकेज पर नौकरी देने का कुछ कंपनियों का फैसला वाकई सुखद है। इसके लिए जेल प्रशासन भी धन्यवाद का पात्र है। उसने यह संकेत देने की कोशिश की है कि जीवन में उम्मीद कभी खत्म नहीं होती। अपराध के अंधेरे रास्ते पर जाने-अनजाने पहुंच गए व्यक्ति को भी सुधरने और जीवन की मुख्यधारा में लौटने का एक अवसर जरूर मिलता है। अगर वह दृढ़ निश्चय कर ले तो उसकी जिंदगी नई करवट ले सकती है।

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उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने कहा है कि 21 नवम्बर से शुरू हो रहे आगामी सत्र के दौरान राज्य को चार भागों में बांटने का प्रस्ताव पारित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि कैबिनेट ने राज्य के विभाजन सम्बंधी प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। उत्तर प्रदेश को अवध प्रदेश, पश्चिम प्रदेश, पूर्वाचल और बुंदेलखण्ड में विभाजित करने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा जाएगा क्योंकि राज्य के पुनर्गठन का अधिकार केंद्र के ही पास है।

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पाकिस्तान ने भारत को सर्वाधिक वरीयता प्राप्त देश का दरजा देने का निश्चय भले ही बहुत विलंब से किया है, फिर भी उसके इस फैसले का दोनों देशों के रिश्ते पर दूरगामी प्रभाव पड़ना तय है। आपसी विश्वास बहाली की दिशा में इसलामाबाद की ओर से उठाया गया यह एक बड़ा कदम है। पाकिस्तान की सरकार ने यह निर्णय लेते हुए भारत-चीन के व्यापार का जिस तरह हवाला दिया है, उससे साफ है कि देर से ही सही, इसलामाबाद को यह एहसास हुआ है कि राजनीतिक मोरचे पर असहमतियां होने के कारण आपसी व्यापार को ठप रखना बुद्धिमानी नहीं है।

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सरकार यदि उच्च शिक्षा क्षेत्र को नयी दिशा देने के लिए जल्द कोई कारगर कदम नहीं उठाती है तो किसी भी क्षेत्र में महाशक्ति बनने का सपना शायद कभी हकीकत में तब्दील नहीं हो पायेगा.
भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था इन दिनों सुखिर्यो में है, पर नकारात्मक कारणों से. विश्व के 200 श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की सालाना सूची में भारत की एक भी यूनिवर्सिटी को जगह नहीं मिल पायी है. टाइम्स हाइयर एजुकेशन मैगजीन के इस सर्वे में शिखर पर हार्वर्ड, स्टैनफ़ोर्ड और ऑक्सफ़ोर्ड जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों को रखा गया है.

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अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद चुनाव सुधारों के बारे में चर्चा और गहमागहमी बढ़ गई है और अब सरकार ने कहा है कि वह एक सर्वदलीय बैठक बुलाकर जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने के अधिकार और चुनाव में सभी प्रत्याशियों को नकारने के विकल्प पर विचार करेगी। सभी प्रत्याशियों को नकारने के विकल्प को लागू करना तो अपेक्षाकृत आसान है। इस बात को लेकर काफी पहले से यह मांग उठ रही है कि अगर किसी मतदाता को कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं है, तो उसे यह बात अपने वोट के जरिये कहने का अधिकार होना चाहिए, ताकि राजनैतिक दलों को यह पता चल सके कि भ्रष्ट और अपराधी चरित्र वाले उम्मीदवारों के खिलाफ कितने लोग हैं।

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पिछले 17 सितंबर से ऑक्युपाय वॉल स्ट्रीट यानी वॉल स्ट्रीट पर कब्जा करो के नारे के साथ शुरू हुआ आंदोलन अब सहित विश्व के कई शहरों में फैल गया है. हजारों लोगों कॉर्पोरेट लालच और वित्तीय संकट में वॉल स्ट्रीट की भूमिका के खिलाफ रैली और प्रदर्शन में जुटे हुए हैं.

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खाद्य सुरक्षा के मुद्दे पर नीति-निर्माता अगर चाहें तो ताजा विश्व भूख सूचकांक रिपोर्ट को अपना संदर्भ बिंदु बना सकते हैं। 81 देशों की इस सूची में भारत 67वें नंबर पर आया है। यानी इस अध्ययन में शामिल सिर्फ 14 देशों में खाद्य सुरक्षा की स्थिति भारत से बदतर है। यहां तक कि पाकिस्तान, नेपाल, रुआंडा और सूडान जैसे देश भी इस सूची में भारत से ऊपर आए हैं। यह सूचकांक अमेरिका स्थित संस्था इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट तैयार करती है।

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जब अमेरिका और यूरोप मंदी से त्रस्त हैं और शेष दुनिया पर भी इसका कमोबेश असर दिखता है, तब रेशनल एक्सपेक्टेशंस थ्योरी के दो प्रणेताओं, क्रिस्टोफर ए सिम्स और थॉमस जे सार्जेंट को अर्थशास्त्र में नोबल पुरस्कार देने की घोषणा का अर्थ है। हालांकि इन दोनों ने अलग-अलग काम किया है, लेकिन बीती सदी के साठ और सत्तर के दशक में किया गया इनका अध्ययन न सिर्फ एक दूसरे का पूरक है, बल्कि कई दशक पहले किए गए उनके अध्ययन की प्रासंगिकता आज कई गुनी बढ़ गई है।

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केंद्रीय वित्त मंत्रालय द्वारा आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने का एक बड़ा अनुरोध ठुकराए जाने के बाद नंदन नीलेकणी के निर्देशन में काम कर रहा भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) लगातार सवालों के घेरे में आ गया है। एक सवाल यह उठाया जा रहा है कि यूआईडीएआई उन कई वित्तीय निगरानी और नियंत्रणों से बाहर है जो किसी भी सरकार के कामों में लागू होते हैं। हो सकता है ऐसा इसलिए हो क्योंकि इसकी समूची व्यवस्था को सावधानीपूर्वक कुछ इस तरह तैयार किया गया है  कि वह न्यूनतम परेशानियों और कष्टकारी प्रक्रियाओं के साथ काम कर सके।

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