अविनाश चंद्रा's blog

इन साहब की चिंता यह है कि इनका बेटा अन्य विषयों में तो फिसड्डी है लेकिन मैथ्स यानि गणित में तेज तर्राह है। क्या  इन साहब की चिंता जायज है...? क्या कहेंगे आप? 
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अफवाह न फैले इसलिए सरकार ने एसएमएस की संख्या सीमित कर दी है तो क्या हमें सरकार को टैक्स देना बंद कर देना चाहिए क्योंकि इससे जनहित की बजाए भ्रष्टाचार फैल रहा है।
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पूंजीवाद, बाजारवाद और पूर्ण प्रतियोगिता की अवधारणा ही एक ऐसा सिद्धांत है जिसे अपनाकर कोई भी देश एक साथ सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक समस्याओं सहित सभी समस्याओं से न केवल निजात पा सकता है बल्कि तरक्की और विकास के मार्ग पर भी अग्रसर हो सकता है। देश की तंगहाल आर्थिक स्थिति से निराश जनता और बाजार ने नब्बे की दशक में ऐसे अप्रत्याशित विकास को प्राप्त कर इसकी अनुभूति भी कर चुकी है। लेकिन वर्तमान समय में इरादतन अथवा गैर इरादतन ढंग से बाजार से प्रतियोगिता की स्थिति बनाने की बजाए इसे और हतोत्साहित किया जा रहा है जिसका परिणाम महंगाई, मुद्रा स्फिति आदि जैसी समस्याओं के रूप में हमारे साम

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भारत के बारे में विदेशियों के बीच एक बात पर अवश्य राय कायम होते देखा जा सकता है। और यह राय यहां कानूनों की अधिकता और उसके न्यूनतम अनुपालन को लेकर है। यह नकारात्मक राय इन दिनों एक और कानून की अनदेखी के कारण और प्रबल हो रहा है। इस बार ऐसा आरटीई यानी शिक्षा का अधिकार कानून के अनुपालन में हो रही लापरवाही और हीला हवाली के कारण हो रहा है। दरअसल,निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए वर्ष 2009 में निर्मित शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) को हर हाल में कड़ाई से लागू किए जाने को लेकर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद ऐसा लगा कि देश में शिक्षा क्रांति का प्रादुर्भा

निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चत कराने के लिए अदालती आदेश के बाद प्राइवेट स्कूलों की 25 फीसदी सीटों को गरीब बच्चों के लिए उपलब्ध कराने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारें इन दिनों एड़ी चोटी का जोर लगाए बैठी हैं। शिक्षा का अधिकार कानून 2009 का हवाला देते हुए सभी स्कूलों को ऐसा करना अनिवार्य कर दिया गया है। यह बात और है कि शिक्षा के स्तर को बनाए रखने के नाम पर प्राइवेट स्कूलों के साथ सरकारी बर्ताव स्कूल भवन का क्षेत्रफल, खेल के मैदान की अनिवार्यता, क्लास रूमों व टीचरों की संख्या, उनकी योग्यता, वेतनमान आदि के इर्द-गिर्द ही सीमट कर रह गया है। प्रशासन द्वारा प्राइवेट स्कूलों प

अक्सर यह बात सुनने में आती है कि भारतीय छात्र वैश्विक स्तर पर अपनी मेहनत व विषय विशेषज्ञता का लोहा मनवा रहे हैं। अक्सर अंतराष्ट्रीय स्तर के शोध व अध्ययनों में भारतीय व चीनी बच्चों के दुनियां के अन्य बच्चों से अधिक सक्षम बताया जाता है। गाहे-बगाहे दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश माने जाने वाले राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति भी अपने बच्चों को भारतीय व चीनी छात्रों से सबक लेने और समान रूप से प्रतिस्पर्धी बनने की अपील करते रहते हैं। ऐसे रिपोर्टों का हवाला देते हुए हमारी सरकारें भी अपना पीठ थपथपाती दिखती हैं। लेकिन व्यवहारिक स्तर पर क्या हमें अपने आसपास ऐसा देखने को मिलता है। आखिर

पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार के खिलाफ सड़क से संसद तक संघर्ष करने के दौरान अदम्य साहस व जुझारूपन प्रदर्शित करने के कारण बंगाल की शेरनी जैसे उपनाम से प्रसिद्ध ममता बनर्जी ने अपने राजनैतिक कैरियर में बहुत सारे मील के पत्थर स्थापित किए हैं। अपने समय में सबसे युवा सांसद होने का खिताब प्राप्त करने वाली ममता के बागी तेवर तो खुर्राट सोमनाथ चटर्जी को चुनाव में धूल चटाने के बाद से ही नजर आने लगे थे। केंद्रीय रेलमंत्री के पद पर भी दो कार्यकाल पूरा करने वाली ममता के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल की जनता को बेहतर भविष्य की आस बंधी और उन्होंने मां-माटी-मानुष के नारे को हाथो-हाथ लिया। जनत

निःसंदेह, तकनीकी ज्ञान अत्यंत आवश्यक है, लेकिन क्या रोटी से ज्यादा? क्या मोंटेक सिंह आहलूवालिया का यह कहना कि 26 रूपए प्रतिदिन कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं... सही है????
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वेलेंटाइन डे और डेमोक्रेसी में बड़ी समानता है। समानता क्या, दोनों को एक ही समझिए। दोनों में एकाध छोटी-मोटी भिन्नताएं हों तो हों, वरना हमें तो जुड़वा वाला मामला ही लगता है। एक को उठा दो और दूसरे को बैठा दो। वेलेंटाइन की बात करते-करते, डेमोक्रेसी में टहल जाओ या डेमोक्रेसी की फिक्र करते-करते, वैलेंटाइन की याद में खो जाओ। 

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यह कहानी तब की है जब मुंबई में दलाल स्ट्रीट नाम की कोई जगह नहीं हुआ करती थी। उस समय यहां एक रिज क्षेत्र हुआ करता था, जिसमें तमाम कटीले पेड़ों व झुरमुटों के साथ ही साथ रसीले फलदार पेड़ व रंगीन फूलों के पौधे भी बहुतायत हुआ करते थे। रिज क्षेत्र में अन्य छोटे मोटे जानवरों व पशु पक्षियों के साथ चींटियों व टिड्डों की भी काफी संख्या पायी जाती थी। चींटी जहां सर्दी व बारिश के मौसम में होने वाली परेशानी व खाने की कमी को ध्यान में रखते हुए गर्मी के मौसम में चिलचिलाती धूप की परवाह न करते हुए घर की मरम्मत व खाना जुटाने में लगी रहती। जबकि टिड्डा अपनी मस्तमौला प्रव्रति के अनुरूप खाओ पीओ

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