अविनाश चंद्रा's blog

राज्य नामक अमूर्त प्राणी, भारत पर राज्य कर रहा है। हमने अपने देश में कुछ खाद्य पदार्थों के ब्रांड्स के विज्ञापन देखे हैं, जिन्हें बनाने और पैक करने की सारी प्रक्रिया बिना हाथ लगाए पूरी की जाती है। यह विवरण भारत की शासन व्यवस्था पर भी लागू होता है, जो कि हरसंभव मानवीय (जनता) से संपर्क से दूरी बनाए रहती है। राज्यपाल हमारी भाषा समझने को जरूरी नहीं मानते हैं। वे हमसे व्यक्तिगत संपर्क स्थापित करने को भी जरूरी नहीं मानते हैं। वे हमसे सिर्फ अफसरों के रूप में मिलते हैं।

रबीन्द्र नाथ टैगोर (1861-1941)

Category: 

ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म वर्ष 1827 में 11 अप्रैल को सतारा, महाराष्ट्र में हुआ था। वे जाति से माली थे और उनके परिवार का मुख्य व्यवसाय फूलों का था। जब उनकी उम्र मात्र 9 माह थी तभी उनकी मां चल बसी। बालक ज्योतिराव ने भी काफी समय तक अपने पिता के साथ फूलों के गजरे बनाने और बेचने का काम किया। जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने खेती भी की। उनके पिता उन्हें स्कूल नहीं भेजते थे। उन्हें लगता था कि पढ़ लिख जाने के बाद ज्योतिराव को काम करने में शर्म आएगी। लेकिन ज्योतिराव की पढ़ाई में रूचि और तेज दिमाग को देखते हुए बाद में उनका दाखिला स्कॉटिश मिशन्स हाई स्कूल में करा दिया गया। 12 वर्

Category: 

प्रमुख भारतीय उदारवादी चिंतक हृदयनाथ कुंजरु का जन्म 1 अक्टूबर 1887 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित अयोध्या नाथ कुंजरु और माता का नाम जनकेश्वरी था। वह लंबे समय तक राजनीति में सक्रिय रहे और चार दशकों तक संसद और विभिन्न परिषदों को अपनी सेवाएं दी। वर्ष 1946 से 1950 तक वह उस कांस्टिटुएंट असेम्बली ऑप इंडिया के सदस्य भी रहे जिसने भारत का संविधान तैयार किया था। वह देश दुनिया की घटनाओं पर पैनी नजर और रूचि रखते थे। उन्होंने इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स और इंडियन स्कूल्स ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज

Category: 

‘वो’ प्रेम का आपातकाल था। यह प्रेम का स्वर्णकाल है। ‘वो’ यानि वह दौर, जब हम अपने कस्बे में इश्क की संभावनाएं उसी शिद्दत से खंगाल रहे थे, जैसे हेमंत बिरजे और चंकी पांडे जैसे कलाकर बॉलीवुड में सफलता खंगाल रहे थे। बाप-दादा के कालखंड में प्रेम की खंड-खंड संभावनाओं को हमने देखा ही नहीं, तो उस पर नो कमेंट।

Category: 

बाजार, नागरिक समाज का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। बाजार का उद्भव का कारण ही यह है कि मनुष्य व्यक्तिगत रूप से किए जाने वाले कार्य की तुलना में अन्य लोगों के सहयोग से ज्यादा हासिल कर सकता है और इसका अनुभव भी किया जा सकता है। यदि हम ऐसे प्राणी होते जिसके लिए व्यक्तिगत रूप से किए जाने वाले कार्यों की तुलना में सहकारिता के तहत किया जाने वाला कार्य ज्यादा उत्पादक नहीं होता, या फिर हम सहकारिता के लाभों को समझ पाने में असमर्थ होते तो हम अवश्य ही अलग थलग व एकाकी रहते। लेकिन इससे भी बुरा यह है जैसा कि लुडविंग वॉन माइसेस व्याख्या करते हैं, ‘प्रत्येक व्यक्ति

बाजार की प्रक्रिया के समर्थिक प्रायः प्रतिस्पर्धा के लाभों पर जोर देते हैं। प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया लोगों को सतत परीक्षण, अविष्कार व परिवर्तनशील परिस्थितियों की प्रतिक्रिया में उसके साथ सामंजस्य स्थापित करने की अनुमति प्रदान करते हैं। यह अपने उपभोक्ताओं की सेवा के लिए व्यवसायों को लगातार मुस्तैद खड़े रखने के लिए मजबूर करता है। यह आसानी से देखा जा सकता है कि प्रतिस्पर्धी प्रणाली, केंद्रीयकृत व्यवस्था अथवा एकाधिकार युक्त प्रणाली की तुलना में विश्लेषणात्मक और अनुभवजन्य दोनों ही प्रकार से, अधिक बेहतर परिणाम प्रदान करती है। यही कारण है कि मुक्त बाजार प्रणाली की वकालत करने व

Category: 

एक डोर में सबको जो है बाँधती, वह हिंदी है।
हर भाषा को सगी बहन जो मानती, वह हिंदी है।

भरी-पूरी हों सभी बोलियां, यही कामना हिंदी है।
गहरी हो पहचान आपसी, यही साधना हिंदी है।

तत्सम, तद्भव, देश विदेशी, सब रंगों को अपनाती,
यही भावना हिंदी है।

- राजाजी के नाम से लोकप्रिय सी.राजगोपालाचारी की यह जीवनी प्रोफाइल्स इन करेज नाम की पुस्तक से ली गई है। राजाजी के इस जीवन परिचय में लेखक जी.नारायणस्वामी ने उनके संघर्ष, बेबाक व्यक्तित्व और फैसले लेने के निर्भीक अंदाज का बखूबी वर्णन किया है।

व्यक्तित्व एवं कृतित्व

[जन्म 10 दिसंबर, 1878  – निधन 25 दिसंबर, 1972]

राजाजी पर प्रायः अंसगत और बार-बार अपना पक्ष बदलते रहने का आरोप लगता रहा है। हम कुछ ऐसी महत्वपूर्ण परिस्थितियों का अवलोकन कर सकते हैं, जब उनका विरोधाभास स्पष्ट रूप से दिखाई दियाः

Category: 

सितम्बर, 2019 में एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के दौरान भारत के उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति वैंकेया नायडू ने अदालतों में बड़ी तादात में लंबित मामलों के निपटारे के लिए न्यायिक व्यवस्था में बड़े सुधार की बात कहीं। अपने उद्धबोधन में उन्होंने उच्चतम न्यायालय को चार न्यायपीठों (Cassation Court) में विभाजित करने का सुझाव दिया। उपराष्ट्रपति के इस सुझाव से निश्चित ही न्यायप्रणाली में सुधार आयेगा।

ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म वर्ष 1827 में 11 अप्रैल को सतारा, महाराष्ट्र में हुआ था। वे जाति से माली थे और उनके परिवार का मुख्य व्यवसाय फूलों का था। जब उनकी उम्र मात्र 9 माह थी तभी उनकी मां चल बसी। बालक ज्योतिराव ने भी काफी समय तक अपने पिता के साथ फूलों के गजरे बनाने और बेचने का काम किया। जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने खेती भी की। उनके पिता उन्हें स्कूल नहीं भेजते थे। उन्हें लगता था कि पढ़ लिख जाने के बाद ज्योतिराव को काम करने में शर्म आएगी। लेकिन ज्योतिराव की पढ़ाई में रूचि और तेज दिमाग को देखते हुए बाद में उनका दाखिला स्कॉटिश मिशन्स हाई

Category: 

Pages