अविनाश चंद्रा's blog

- अंतर्राष्ट्रीय लघु फिल्म प्रतियोगिता में ‘ड्रीमर्स ऑफ ब्रेसवाना’ और ‘ब्रिंगिग स्कूल्स वेयर देयर इज नन’ को क्रमशः दूसरी और तीसरी श्रेष्ठ फिल्म का खिताब

- एडुडॉक फेलो वर्ग में विकिरण को श्रेष्ठ शॉर्ट फिल्म का पुरस्कार

- 10वें स्कूल च्वाइस नेशनल कॉंफ्रेंस के दौरान शिक्षाविदों ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली को बताया अप्रासंगिक

नई दिल्ली। देश की शिक्षा प्रणाली दशकों पुराने ढर्रे पर चल रही है जबकि दुनिया तेजी बदल रही है। अलग अलग छात्रों की सीखने व समझने की क्षमता अलग अलग होती है जबकि वर्तमान प्रणाली अभी भी सभी छात्रों को समान तरीके से ‘ट्रीट’ करती है। छात्रों का सर्वांगीण विकास हो इसके लिए जरूरी है कि उन्हें वैकल्पिक शिक्षा प्रणाली के माध्यम से ज्ञान प्रदान किया जाए।

हमारी मांग स्कूलों और शिक्षकों की सुरक्षा के लिए कानून

पढ़े-लिखे बेरोजगारों की विशाल फौज को देखकर लोग अनायास ही कह देते हैं कि शिक्षा को 'रोजगार परक' बनाया जाना चाहिए। उनका तात्पर्य यह होता है कि जिन क्षेत्रों में रोजगार की अधिक संभावाएँ हैं, उनसे संबंधित शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। देश के अधिकांश महाविद्यालयों में शिक्षा के नाम पर भाषा, साहित्य, इतिहास, राजनीति, समाजशास्त्र, विज्ञान, आदि विषय ही पढ़ाए जाते हैं। और इन विषयों की डिग्री लेने से किसी को कोई नौकरी मिलेगी, इसका कोई भरोसा नहीं। अत: ऐसे विषयों की पढ़ाई एवं उन पर होने वाले सरकारी खर्च के औचित्य पर प्रश्न उठना लाजिमी है। आखिर शिक्षा को

यह अच्छा हुआ कि प्रधानमंत्री ने लखनऊ में उद्योगपतियों के बीच यह कहा कि वह उनके साथ खड़े होने में डरते नहीं। इसी के साथ उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि देश के विकास में उद्योगपतियों की भी भूमिका है। वैसे तो इस सामान्य सी बात को हर कोई समझता है, लेकिन कुछ लोग इस बुनियादी बात को समझने से इन्कार करने के साथ ही आम जनता को बरगलाने का काम भी कर रहे हैं।

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नेताजी का मन उदास था। रह रहकर कुछ अजीब सी 'फीलिंग' हो रही थी। चलते मॉनसून सत्र में उनका काम में मन नहीं लग रहा था। इलाके के लोगों ने कई सवाल देकर भेजा था उन्हें लेकिन वो आज साथी सांसदों के लिए भी खुद एक सवाल बन गए थे। उनके मुरझाए हुए चेहरे को देखकर आलाकमान ने भी उन्हें आज जरुरी हो तो सिर्फ गांधी प्रतिमा के पास मुंह पर काली पट्टी बांधने का काम दिया था, जबकि जिनके चेहरे पर तेज था, उन्हें वेल में उतरकर हल्ला-गुल्ला करने और कागज उड़ाने जैसे तमाम अधिकार थे। नेताजी को डर सताने लगा था कि हाल यही रहा तो उनका टिकट कट सकता है। नेताजी का प्लान था कि मॉनसून सत्र के आरंभ होते ही वो पर

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जब हम अपनी आज़ादी का उपयोग जिम्मेदारी से करते हैं, तब हमें पता चलता है कि वास्तव में हम कुछ अलिखित नियमों तथा शर्तों से बंधे हुए हैं। हमें पता चलता है कि हम कुछ भी अंधाधुंध करने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं।

मेरे गुरु महर्षि अमर ने हमें समझाया था कि हमें इच्छा-स्वातंत्र्य का वरदान मिला हुआ है। हम कुछ भी यहां तक कि गलत चुनने के लिए भी स्वतंत्र हैं। हम कभी गलत चीजों का चुनाव करते हैं, गलतियां करते हैं, असफल होते हैं। किंतु हम सीखते हैं और बदलते हैं। यह एक महत्वपूर्ण सत्य है, जिसे हमें समझना होगा।

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भरी गर्मी और तपती दोपहरी से बचने के लिए आपने अपने कमरे में लगवाने के लिए नया एसी लिया है लेकिन आप अपना कमरा कितना ठंडा करेंगे इसका फैसला सरकार करेगी। ये सुन आपका चौकना स्वाभाविक है लेकिन सरकार कुछ ऐसा ही करने का मन बना रही है।

टेलीविजन पर 'साफ नीयत सही विकास' के विज्ञापन को लगभग घूरते हुए पड़ोसी शर्मा जी बुदबुदाए- "हद है...क्या बकवास है। बंद करो इसे यार।" ज़िंदगी जिस तरह मेरे साथ दिन में कई बार मजाक करती है, मैंने सोचा थोड़ा मजाक शर्माजी के साथ कर लिया जाए। मैंने पूछा- "आपने विज्ञापन को बकवास कहा या टीवी को या मुझे। आपने टीवी को बंद करने के लिए कहा, विज्ञापन को या मुझे।" शर्माजी झुंझलाए। बोले-"अब तुम दिमाग का दही मत करो। वैसे ही 18 घंटे लेट घर पहुंचा हूं। दिमाग सही ठिकाने पर नहीं है।"

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