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Friday, January 28, 2011

देश में राजनीति के प्रति लोगों की उदासीनता को देखते हुए 25 जनवरी को देश में मतदाताओं को जागरूक करने के लिए राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाये जाने का संकल्प लिया गया है पर क्या मात्र इस कदम से देश में मतदाताओं में कोई जागरूकता आने वाली है? शायद नहीं क्योंकि हम भारत के लोग कभी भी किसी बात को संजीदगी से तब तक नहीं लेते हैं जब तक पानी सर से ऊपर नहीं हो जाता है. देश में गाँवों आदि में तो फिर भी लोग वोट देने के लिए चले जाते हैं पर हमारे तथाकथित पढ़े लिखे सभी समाज की चुनावों में क्या भूमिका होती है उसको हम सभी जानते हैं. आज...

Thursday, January 27, 2011

समूचे भारत वर्ष में उल्लास के साथ गणतंत्र दिवस की 61 वीं सालगिरह मनायी गयी। इन 61 सालों में देश के विकास के बारे में यदि दृष्टि डाली जाये तो ना तो यह कहना सही होगा कि हमने कुछ भी हासिल नहीं किया है और ना ही यह कहना सही होगा कि हमने सब कुछ पा लिया है। हां विकास की गति पर जरूर मतभेद हो सकते है।

इन 61 सालों के प्रजातांत्रिक सफर में गण याने आम आदमी तो लगभग गौण हो चुका है। इसका स्थान गण के द्वारा चुने गये जन प्रतिनिधयों ने ले लिया जो कि उनका ध्यान पांच साल में सिर्फ एक बार एक महीने...

Tuesday, January 25, 2011

आमतौर पर लोग सोचते हैं कि गरीबों के लिए अनुदान सहायता (डॉनर एड) के रूप में लोक शिक्षा पर अरबों-खरबों डॉलर और अधिक खर्च करने की जरूरत है। लेकिन यह इस सच्चाई को नजरंदाज करता है कि गरीब अभिभावक सरकारी स्कूलों को छोड़ कर अपने बच्चों को बजट प्राइवेट स्कूलों में भेज रहे हैं। ये बजट प्राइवेट स्कूल बहुत कम शुल्क लेते हैं, जो दिहाड़ी पर काम करने वाले अत्यधिक गरीब अभिभावकों द्वारा आसानी से वहन किया जा सकता है।

हालिया रीसर्च में पाया गया कि भारत एवं अफ्रीकी उप-सहारा क्षेत्र के कुछ खास...

Monday, January 24, 2011

बुन्देलखण्ड के चार जनपद बांदा, चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर में बीते ढाई दशकों से प्राकृतिक संपदाओं की बेइतहां लूट जारी है। लूट के दुष्परिणामों का असर किसानों, मजदूरों और अन्य श्रमजीवियों पर पड़ रहा है। घटता जलस्तर, भू-प्रदूषण, कम होती वर्षा, विस्थापित होते हुए किसान-मजदूर और साल दर साल बदहाल होती खेती इसके बड़ी सामान्य उदाहरण हैं।

इसी की एक बानगी है कि पिछले छः वर्षों से इन जनपदों में अकाल,आत्महत्या, कर्ज, सूखा एवं पलायन की समस्या सिर चढ़ कर बोल रही है। वर्ष 2005-07 मे सैकड़ों...

Friday, January 21, 2011

देश में कमर तोड़ महंगाई ने सब का जीना मुश्किल कर दिया है. खाने की चीजों के दाम में लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है और पेट्रोल की बढ़ती कीमतों ने मिल कर आम आदमी का बजट बिगाड़ दिया है. भारत में मुद्रास्फीति यानी महंगाई की दर दिसंबर के अंत में 18.32 फीसदी दर्ज की गई है जो कि  वर्ष 2010 में सबसे अधिक थी.

बताया जाता है कि चीनी, दाल, तेल और सब्जियों की महंगाई के लिये इनकी बढ़ती मांग और कम पड़ती आपूर्ति एक बड़ी वजह है. खाद्य पदार्थों की महंगाई को गंभीर चिंता का विषय है...

Thursday, January 20, 2011

केंद्र सरकार ने मौसम आधारित फसल बीमा योजनाओं को लागू तो कर दिया है, लेकिन कई खामियों की वजह से यह किसानों के लिए बहुत उपयोगी साबित नहीं हो पा रही है। राज्य सरकारों की उदासीनता भी कहीं न कहीं इसके लिए जिम्मेदार है।

उद्योग चैंबर फिक्की के अनुसार केंद्र सरकार को सबसे पहले इन स्कीमों के लिए कम से कम तीन वर्ष अवधि की रणनीति बनानी चाहिए। अभी हर फसल मौसम से पहले सरकार इस बारे में ऐलान करती है। इससे बीमा कंपनियों के लिए लंबी अवधि की रणनीति बनाना मुश्किल होता है।

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Wednesday, January 19, 2011

एक शाम, मैं सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के एक कार्यक्रम में हिस्सा लेकर घिटोरनी मेट्रो स्टेशन से दिल्ली विश्वविद्यालय वापस आ रहा था. अगले स्टेशन से लोगों का जो रेला शुरू हुआ कि मुझे ‘शेर की मांद में आने वालो के पंजो के ही निशान मिलने वाली बात’ याद आ गयी. केवल आने वाले दिख रहे थे, जाने वाला कोई नहीं. एक सतत शाश्वत प्रक्रिया, ‘अगला स्टेशन ….. है’ की अनुगूंज, ट्रेन धीमी होती, दरवाजे खुलते, घर जाने को आतुर जन सैलाब अंदर घुसता. बाहर से आने वाले गतिज ऊर्जा से भरे हुए थे तो अंदर वाले, दब दब कर स्प्रिंग सदृश स्थितिज ऊर्जा...

Monday, January 17, 2011

वाशिंगटन पोस्ट के स्तंभकार मैट मिलर ने वैश्विक पूंजीवाद के बारे में कुछ समय पहले एक टिप्पणी दी जिस में उन्होने कहा कि "वैश्विक पूंजीवाद के चलते चीन, भारत सहित अन्य विकासशील देशों में करोडो लोग गरीबी से बाहर निकल कर अपना स्तर सुधार तो रहे हैं पर आंशिक रूप से ये परिवर्तन अमीर देशो के कई हज़ार वर्करों की नौकरियां जाने की वजह से संभव हो पाया है".

ये सच है कि पूंजीवाद की वजह से कुछ विशेष प्रकार की नौकरियों...

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