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Thursday, January 06, 2011

हर सुबह काम पर जाते वक्त मेरे रास्ते में झुग्गी-झोपड़ियां पड़ती हैं। मुझे दिखाई देते हैं मिट्टी की दीवारों और प्लास्टिक व टीन की छतों वाले छोटे-छोटे अस्थायी घर। इन घरों में कचरा बीनने वाले भी रहते हैं तो चाकरी करने वाले भी। गलियों में फेरी लगाने वाले भी रहते हैं तो रोज कुआं खोदने और रोज पानी पीने वाले मेहनतकश भी।

दिल्ली समेत देश के सभी महानगरों में इस तरह के नजारे आम हैं। लेकिन कुछ दिनों पहले एक सुबह मैं यह देखकर हैरान रह गया था झुग्गियां कहीं भी नजर नहीं आ रही थीं। उनके स्थान...

Tuesday, January 04, 2011

सरकारी कर्मचारी की ज़िन्दगी जी रही डिलमा रूसेफ़ जिस ने पहले कोई चुनाव तक नही लड़ा था, उस के लिए अपने ही देश का राष्ट्रपति बन जाना एक असंभव सपने के सच हो जाने सरीखा है. लाटिन अमरीकी देशो में महिलाओं के लिए इतिहास रचते हुए, डिलमा रूसेफ़ ने ब्राज़ील की पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में हाल ही मे शपथ ली. उन्होंने लूला डी सिल्वा की जगह ली है, जिन्हें ब्राज़ील के इतिहास का सबसे लोकप्रिय राष्ट्रपति माना जाता है.

ब्राजील में लिंग असमानता की शिकायतों के बीच एक महिला राष्ट्रपति का...

Monday, January 03, 2011

जनता की कमर तोड़ महंगाई के साथ कदम मिला चुके बीते वर्ष से शायद सबकी सिर्फ यही उम्मीद थी की महंगाई जैसी बीमारी से लोगों को कुछ राहत जरुर मिलेगी क्योंकि वर्ष 2009 ने जनता को महंगाई की आग में बहुत जलाया था लेकिन आग बुझने की आस लगाये बैठी जनता ने अपना एक और वर्ष 2010 के रूप में बिता डाला. गुज़रे साल मे एक तरफ अंत तक राहत के नाम पर सिर्फ महंगाई रूपी जहर को पीते-पीते दामो में बढ़ोत्तरी ही देखने को मिली वहीँ दूसरी तरफ पूरे साल ख़ुशी और देश के विकास में टकटकी लगायी आँखों को अंत में महा घोटालों का तोहफा मिला. अब ऐसे में...

Thursday, December 30, 2010

नहीं, कोई ऐसा नहीं कर सकता कि वह डॉ. विनायक सेन और उनके साथियों को रायपुर की एक अदालत द्वारा आजीवन कारावास दिए जाने पर खुशी मनाए। वैचारिक विरोधों की भी अपनी सीमाएं हैं। इसके अलावा देश में अभी और भी अदालतें हैं। हमें अपनी अदालतों और अपने तंत्र पर भरोसा तो करना ही होगा। आखिर क्या अदालतें हवा में फैसले करती हैं? क्या इतने ताकतवर लोगों के खिलाफ सबूत गढ़े जा सकते हैं? ये सारे सुविधा के सिद्धात हैं कि फैसला आपके हक में हो तो सब कुछ अच्छा और न हो तो अदालतें भरोसे के काबिल नहीं हैं। भारतीय सविधान, जनतंत्र और अदालतों को...

Wednesday, December 29, 2010

2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला मामले की जेपीसी से जांच कराने की मांग पर सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध के चलते संसद का पूरा शीतकालीन सत्र बिना किसी काम काज के समाप्त हो गया. इसी के साथ पूरे सत्र के दौरान एक भी दिन कामकाज नहीं हो पाने का देश के संसदीय इतिहास में एक रिकॉर्ड बन गया.

यहीं एक गंभीर प्रश्न उठता है कि क्या हमारी संसद वाकई हमारे लिए सार्थक है? संसद के ठप्प हो जाने के बाद भी, देश के बाकी काम काज सुचारू रूप से चलते रहे. एक तरफ हमारे नीति निर्माता एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप की...

Tuesday, December 28, 2010

प्रसिद्ध उद्योगपति अजीम प्रेमजी ने समृद्ध और गहन सामाजिक सरोकारों का परिचय देते हुए महादान का प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। दुनिया के 28वें तथा देश के तीसरे सबसे धनी व्यक्ति अमीन अजीम प्रेमजी ने शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए 8846 करोड़ रुपयों का दान देकर दान परंपरा को नई ऊंचाई पर पहुंचाया है। उन्होंने 21.3 करोड़ शेयर अजीम प्रेमजी फाउंडेशन को देने की घोषणा की है। यह राशि विप्रो में उनकी हिस्सेदारी का लगभग 11 फीसदी है। अजीम प्रेमजी ट्रस्ट उत्तराचल, राजस्थान व कर्नाटक के दो-दो जिलों में 25 हजार स्कूलों को...

Wednesday, December 22, 2010

प्रायः 'दरिद्रता' और 'निर्धनता' को पर्यायवाची के रूप में उपयोग किया जाता है किन्तु इन दोनों शब्दों में भारी अंतराल है. 'निर्धनता' एक भौतिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति के पास धन का अभाव होता है किन्तु इससे उसकी मानसिक स्थिति का कोई सम्बन्ध नहीं है. निर्धन व्यक्ति स्वाभिमानी तथा परोपकारी हो सकता है. 'दरिद्रता' शब्द भौतिक स्थिति से अधिक मानसिक स्थिति का परिचायक है जिसमें व्यक्ति दीन-हीन अनुभव करता है जिसके कारण उसमें और अधिक पाने की इच्छा सदैव बनी रहती है. अनेक धनवान व्यक्ति भी दरिद्रता से पीड़ित होते हैं.

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Tuesday, December 21, 2010

देशभर में बहुत से ऐसे लोग हैं जो खुले आसमान के तले जीवन बसर करते हैं। सिर ढंकने तक को छत नहीं मिल रही। दूसरी ओर जिन स्थानीय निकायों पर लोगों को सस्ते आवास उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है, वे जमीनों के कारोबार में लग गए हैं। ये निकाय जनहित और आवास योजनाओं के नाम पर किसानों की जमीनें तो बहुत कम कीमत में लेते हैं, लेकिन जब योजना विकसित करके भूखंड अथवा आवास देने की बारी आती है तो वे इतने शुल्क जोड़ देते हैं कि वही जमीन दस गुना महंगी हो जाती है।

ऐसे में निकायों की आवास योजनाओं में...

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