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Friday, August 02, 2013

देशभर में मिलावटी खाद्य सामग्री का धड़्ल्ले से उपयोग हो रहा है। थोड़े से फायदे के लिए मिलावट खोर ऐसे ऐसे कार्यों को अंजाम दे रहे हैं जो उपभोक्ता के न केवल जेब पर भारी पड़ रहा है बल्कि स्वास्थ संबंधी जटिलताएं भी पैदा कर रहा है। जबकि इसे रोकने के लिए जिम्मेदार विभाग व अधिकारी घोड़े बेचकर सो रहे हैं। इसी मुद्दे पर आधारित कार्टूनिस्ट पवन का यह कार्टून व्यस्था पर जबरदस्त कटाक्ष करता है।

Friday, August 02, 2013

सरकार एक बार फिर गरीब और गरीबी की नई परिभाषा के साथ अवतरित हुई है। इस बार सरकार ने पूर्व के 27 रुपए की बजाए 32 रुपए को गरीबी रेखा निर्धारित करने का मानक बिंदू बताया है। अर्थात जो व्यक्ति प्रतिदिन 32 रुपए कमाता है वह गरीब नहीं है। हालांकि जैसा कि तय था, सरकार के इस मानक बिंदू का विरोध भी खूब हुआ। लेकिन अपनी गलती स्वीकार करने की बजाए सरकार व सरकारी नुमाइंदों में इसे सही साबित करने की होड़ मच गई। कोई भरपेट भोजन के लिए 12 रुपए को पर्याप्त बताने लगा तो कोई दो कदम और आगे बढ़ पांच रुपए को पेटभर खाने के लिए उपयुक्त...

Friday, July 19, 2013

भ्रष्टाचार और घोटालों के माध्यम से लाखों करोड़ों रुपए का वारा न्यारा कर चुकी सरकारों का यह बयान कि "घोटालों से देश को जीरो लॉस हुआ है" यह बताने के लिए काफी है कि करदाता के खून पसीने से अर्जित धन का इनके लिए क्या महत्व है।

 

Thursday, July 04, 2013
राजनीति को पैसे से बाहर करने का एक ही तरीका है और वह है, राजनीति को पैसा बनाने के काम से बाहर कर दिया जाए... (बड़े आकार में देखने के लिए कार्टून पर क्लिक करें...)   - रिचर्ड एम. साल्समैन
Thursday, June 27, 2013
जब सरकारी जूता जनता के गर्दन पर होता है तो इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि जूता बायां है या दांया... - अज्ञात
Thursday, May 16, 2013

बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी? 

रिश्वत कांड में आरोपी पूर्व रेलमंत्री पवन कुमार बंसल द्वारा जारी विवाद से मुक्ति पाने के लिए बकरे की पूजा करने की खबर आने पर कार्टूनिस्ट पवन द्वारा अपने कार्टून के माध्यम से किया गया कटाक्ष बिल्कुल सटीक बैठता है...।

Monday, April 29, 2013

राजनैतिक हितों व वोट बैंक के स्वार्थ के वशीभूत हो सियासी दलों द्वारा निजीकरण, मुक्त बाजार व पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति की चाहे जितनी अनदेखी व आलोचना की जाए। लेकिन वास्तविकता यही है कि महंगाई की समस्या का समाधान किसी सरकार के पास नहीं बल्कि स्वयं बाजार के पास ही होता है। यदि बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति हो तो वस्तुओं/सेवाओं की कीमतों में उतरोत्तर कमी व गुणवत्ता में तुलनात्मक रूप से वृद्धि देखने को मिलती है। अर्थशास्त्र के इस सामान्य से नियम की न केवल अनदेखी की जाती है बल्कि लोगों के मन में बाजार को...

Thursday, April 25, 2013

मुक्त बाजार व्यवस्था लोगों के बीच तालमेल और सहयोग को बढ़ावा देती है और उनका जीवन स्तर सुधारने में मदद करती है। दूसरी ओर, अगर अर्थव्यवस्था सरकार के हाथ में है तो यहां हमेशा कुछ ऐसे लोग होंगे जिन्हें सरकार से "खास फायदे" मिलते हैं। जो दूसरे लोगों को लूटते हैं और खुद लुटने से हमेशा बच जाते हैं।

 

- एलन बरिस

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