फिर मारा अपनों ने...

मौत से जूझते हुए एक रोगी को  इसलिए अस्पताल के भीतर  इलाज के लिए अंदर नहीं जाने दिया गया क्योंकि उस परिसर में हो रहे एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री आए हुए थे। 3 नवंबर 2009 को प्रधानमंत्री की सुरक्षा के नाम पर 32 वर्षीय सुमित  वर्मा  की चंडीगढ़ के पीजीआइ अस्पताल के दरवाजे पर ही मौत हो गई।

इसे विडंबना ही कहेंगे कि आजादी के आज 62 साल बाद  भी आम आदमी की स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। हमारे नेता आज भी अपना रूतबा और दम दिखाने के लिए जहां जनता के पैसे का बड़ा हिस्सा अपनी सुरक्षा और ऐशो-आराम पर खर्च कर रहे हैं, वहीं आम जनता को सड़क किनारे खड़े होकर आज भी वीआइपी महोदय की गाड़ी के गुजर जाने का इंतजार करना पड़ता है। अगर कभी उनकी गाड़ी के आगे आ भी गए तो समझो शामत।

प्रधानमंत्री सरीखे देश की अति महत्वपूर्ण हस्ती के लिए कड़ी सुरक्षा के इंतजामात कोई गलत बात नहीं है, लेकिन चंडीगढ़ के पीजीआइ जैसे अस्पताल की बात आती है, जहां इंसान अपने प्राणों की खैर के लिए आते हैं, वहां सुरक्षा के मायने आम लोगों और रोगियों को संकट में डालना नहीं है। प्रधानमंत्री मृतक के परिजनों से इस मामले पर खेद तो जता लिया है, लेकिन क्या यह काफी है?
क्या आपको लगता है कि देश का आम आदमी, फिर वह जिंदगी और मौत से जूझता मरीज ही क्यों न हो, प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए अस्पताल के दरवाजे पर खतरा है?

क्या हम इतने संवेदनाशून्य और लकीर के फकीर हैं कि सुरक्षा बंदोबस्त के नाम पर आम लोगों को मरने के लिए छोड़ दें?

क्या सुरक्षाकर्मियों से विवेक और इंसानियत की अपेक्षा नहीं की जा सकती?