जीने  के अधिकार पर प्रहार ...

सबसे  अहम होता है जीने का अधिकार, फिर चाहे वह एक आम आदमी हो या फिर जेल या थाने में बंद कोई अपराधी ही क्यों न हो। उसके मानवाधिकार पर प्रहार सभ्य समाज के लिए सबसे दुखदायी है। ऐसा इसलिए क्योंकि हमारी कानून-व्यवस्था में कुछ ऐसी खामियां है जो समय-समय पर उजागर होकर हमारी आंखें खोल देती हैं।

अब  राष्ट्रीय मानवाधिकार के आधिकारिक रिकॉर्ड के हवाले से छपी उस रिपोर्ट को ही लें जो इस बात का खुलासा करती है कि हिरासत में मौत के मामले में उत्तर प्रदेश देश में शीर्ष पर है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में इस साल 30 नवंबर तक 232 लोग हिरासत में दम तोड़ चुके हैं। यह दूसरी बार है, जब उत्तर प्रदेश हिरासत में मौत के मामलों में सबसे ऊपर है। गौर करने लायक बात यह है कि रिपोर्ट में आतंकवाद की मार झेल रहे कश्मीर में इस साल हिरासत में मौत के सिर्फ तीन मामले पेश आने की बात कही गई है, जबकि राज्य पुलिस मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर लगातार निशाने पर रही है। अगर सबसे साफ-सुथरे रिकॉर्ड की बात करें तो इस मामले में अंडमान-निकोबार ने बाजी मारी है। यहां पिछले चार साल में हिरासत में मौत का सिर्फ एक मामला ही देखने को मिला है। राष्ट्रीय स्तर पर आंकड़ों का आकलन किया जाए तो देशभर के थानों से पिछले चार साल में औसतन प्रतिदिन हिरासत में मौत के पाँच से अधिक मामले सामने आए हैं। इस अवधि में देशभर में हिरासत में मौत के 7,333 मामले पेश आए।

वाकई  यह आंकड़े परेशान कर देने वाले हैं, और हमारी कानून-व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। अपराध से मुक्त समाज देने के लिए गठित पुलिस बलों का यह रवैया सही संदेश नहीं देता और समय-समय पर इस तरह के मामले सामने आने तथा उस पर कोई ठोस कार्रवाई ने होने से हमारे राजनीतिकों में इस समस्या से निपटने के लिए जरूरी जज्बे की कमी भी उजागर होती है। ऐसे में मौजूदा कानून में सुधार की जरूरत है जो इस तरह की पुलिसिया बर्बरता पर अंकुश लगा सके।

ऐसे में, क्या सरकार को प्रीवेंशन ऑफ टॉर्चर बिल, 2009 सरीखे अपने कदमों को और अधिक मजबूती नहीं देनी चाहिए?

आपको  नहीं लगता राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को इस तरह के मामलों को लेकर और अधिक गंभीरता दिखानी चाहिए?

इस  पुलिसिया बर्बरता से निपटने के लिए आपका क्या सुझाव  है?