खेल बंटवारे का...

जैसा होता आया है, वैसा ही हुआ। एक जिद्दी बच्चे की जिद पूरी हो जाए तो बाकी बच्चे भी उसकी देखा-देखी में जिद करने लगते हैं और फिर बात हाथ से बाहर हो जाती है।

ऐसा ही कुछ इन दिनों तेलंगाना के मामले में भी हुआ। अलग तेलंगाना राज्य के गठन की प्रक्रिया शुरू करने की केंद्र सरकार की हरी झंडी के बाद अब न सिर्फ आंध्र प्रदेश बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी अलग राज्य के गठन की मांग के स्वर मुखर होने लगे हैं। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने 11 दिसंबर को लखनऊ में छोटे राज्यों की वकालत करते हुए राज्य का समर्थन कर डाला। खास यह कि उन्होंने हरित प्रदेश, बुंदेलखंड और पूर्वांचल के गठन पर अपनी सहमति भी जता दी। तेलंगाना की मांग पूरी होने के एकदम बाद ही हरित प्रदेश की मांग कर रहे राष्ट्रीय लोक दल के अजित सिंह ने अपना आंदोलन तेज करने की बात कही थी।

अगर पश्चिम बंगाल की ओर देखें तो गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के 21 कार्यकर्ताओं ने चंद्रशेखर राव की देखादेखी अनशन पर बैठने का निर्णय लिया है और तो और, 14 दिसंबर से 96 घंटे बंद का भी भी आह्‍वान किया है।

देखा जाए तो कांग्रेस काफी हद तक छोटे राज्यों का समर्थन करती आई है, अब महाराष्ट्र पर नजर दौड़ाएं तो वहां से भी अलग विदर्भ की मांग उठने लगी है। राज्यों का विभाजन सिर्फ इसलिए होता है ताकि प्रशासन-व्यवस्था को बेहतर ढंग से जनता तक पहुंचाया जा सके। लेकिन ऐसा प्रत्येक मामलों में नहीं हो पाता।

अब प्रश्न यह पैदा होता है कि क्या इस तरह छोटे-छोटे राज्य बनाने से वाकई कुछ हासिल होगा? या फिर यह सिर्फ राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए आधार भर है? छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड के मामले बेशक सकारात्मक है, अगर झारखंड की स्थिति पर नजर डालें तो बिहार से अलग होने के बाद से जो वहां के राजनैतिक और आर्थिक हालात हैं, वह किसी से छिपे नहीं हैं।

क्या आपको लगता है कि वाकई हमारे नेताओं की अलग राज्य की मांग कोरी राजनीति से इतर कुछ और भी है?

वाकई इससे आम जनता को फायदा पहुंचेगा?

क्या आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति इससे अत्यधिक प्रभावित नहीं होगी?

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