कठिन है राहगुजर....

सुबह के साढ़े नौ बजे, दिल्ली का कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन भीड़ के समुद्र से पटा पड़ा है। कुछ युवा, इनमें से कुछ प्रेमी और कुछ अमूमन खाली बिरादरी के लोग यहां-वहां सीढ़ियों पर डेरा डाले बैठे हैं।

जाहिर है, ये भागमभाग कर रही कुछ यात्रियों की राह का रोड़ा भी बन रहे हैं। भीड़ का यही स्वभाव है। मेट्रो की सवारी में भीड़ तंत्र ने जैसे चैन छीन लिया है। गाड़ी आती है, सवारियां बेतहाशा दौड़ती हैं, जैसे आज की यह आखिरी गाड़ी हो। गाड़ी का दरवाजा खुलता है, लोगों की लगी हुई लाइन टूट कर बिखर जाती है, धक्का-मुक्की, रेलम-पेल के बीच दरवाजे को निशाना बना कर लोग चढ़ने लगते हैं, रुकते ही नहीं, दरवाजा बंद होने तक यह जद्दोजहद खत्म नहीं होती। बमुश्किल दरवाजा बंद होता है, ट्रेन को आगे ले जाने के लिए। फिर भी, लोग हैं कि मानते ही नहीं।

गाड़ी के अंदर खड़े होने की जगह नहीं, कुछ लोग नीचे बैठे हैं। सफर की रफ्तार से भी ज्यादा आवाज में मोबाइल पर इधर-उधर से संगीत का चीखना जारी है।

जी हां, दिल्ली में मेट्रो स्टेशनों पर इस तरह के नजारे आम हैं। कई तरह से लोगों को मेट्रो कल्चर सिखाने मे कामयाब हुई, लेकिन बहुत कम ही हाथ लगा है। मेट्रो में दुर्व्यवहार के बढ़ते मामलों के कारण ही महिलाएं अब अलग कोच की मांग करने लगी हैं। नवंबर 2008 में मेट्रो सिटिजन फोरम की स्थापना की गई थी और अभी इसके 304 सदस्य सक्रिय हैं। इसकी स्थापना के एक साल के भीतर अभी तक 2,942 लोगों पर जुर्माना भी किया जा चुका है। लेकिन हालातों में ज्यादा सुधार देखने नहीं मिला है।

बेशक मेट्रो ने दिल्ली के लोगों को विश्वस्तरीय सुविधाओं से लैस किया है और सरकार ने इस दिशा में बेहतर कार्य किया है। जरूरतों और अपेक्षाओं के चलते मेट्रो का विस्तार किया जा रहा है, क्या आपको नहीं लगता कि यात्रियों को भी थोड़ी शिष्टता दिखानी चाहिए, अभद्रता रोकने के लिए कारगर कदम उठाए जाने चाहिए और लोगों के आराम से सफर करने की स्वतंत्रता का हनन नहीं होना चाहिए?

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