भाजपा अगर दे साथ तो बन जाए जीएसटी की बात

श्रीमान यशवंत सिन्हा (और उनकी जैसी सोच वाले भाजपा के अन्य सदस्यों), क्या मैं आपको यह सुझाव देने का दुस्साहस कर सकता हूं कि आप एक संवाददाता सम्मेलन (शायद वित्त मंत्री पी चिदंबरम के साथ संयुक्त रूप से ) बुलाएं और निम्रलिखित घोषणाएं करें: पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तर्ज पर देशभक्ति और किसी तरह पक्षधरता से मुक्त होकर भाजपा संप्रग सरकार के साथ मिलकर काम करेगी ताकि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को तत्काल लागू किया जा सके। जैसा कि आप सब अच्छी तरह जानते हैं, जीएसटी को पारित करने के  लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता होगी जिसे केंद्र और भाजपा शासित राज्यों में बगैर भाजपा की मदद के अंजाम नहीं दिया जा सकता। अब सवाल उठता है कि आपकी पार्टी को यह काम क्यों करना चाहिए? मैं आपको ऐसा करने के कुछ गैर राजनीतिक कारण बताता हूं उसके बाद आप इसके राजनीतिक नफा-नुकसान के बारे में विचार कर सकते हैं। आर्थिक नीति की बात करें तो यह सरकार भरपूर कलंक सह चुकी है और वह उसकी पात्रता भी रखती है। वर्ष 1998-2004 के दौरान आप और जसवंत सिंह तथा अरुण शौरी आदि ने अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में इस सरकार के मुकाबले काफी बेहतर काम किया था। लेकिन अर्थव्यवस्था के निरंतर निम्र विकास की राह पकड़ लेने के बाद गत कुछ सप्ताह के दौरान मौजूदा सरकार ने सुधार की प्रक्रिया को दोबारा शुरू किया है। भाजपा के पास मौका है कि जीएसटी जैसे महत्त्वपूर्ण सुधार को लेकर सरकार की मदद करे। यह लंबी अवधि के दौरान देश के जबरदस्त हित में साबित होगा।

जीएसटी के महत्त्व को बढ़ा चढ़ाकर नहीं बताया जा सकता है। विजय केलकर की याद तो आपको होगी ही, वह आपकी सरकार का हिस्सा थे। उन्होंने जीएसटी का बखूबी समर्थन किया है। यह राजस्व प्राप्ति का एक बढिय़ा स्रोत बनेगा और राजकोषीय स्थिति को स्थायी रूप से दुरुस्त बना देगा। इससे न केवल कर प्रशासन को मदद मिलेगी बल्कि अप्रत्यक्ष कर संग्रह में भ्रष्टाचार के मामलों में भी कमी आएगी। इसकी बदौलत भारत को एक अधिक आमफहम बाजार बनाने में मदद मिलेगी।

दूसरी बात, आप देश में अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था का आधुनिकीकरण करने वालों में शामिल हैं। वर्ष 2001 में, आपने वित्त मंत्रियों की अधिकारप्राप्त समिति बनाइ्र्र थी और अपने एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माकपा नेता असीम दासगुप्ता को इसका अध्यक्ष बनाकर जबरदस्त दांव चला था? उसकी बदौलत ही एक राजनीतिक सहमति बन पाई और राज्य स्तर पर वैट लागू हो सका। इस वक्त भी जीएसटी पर संसदीय समिति की अध्यक्षता आपके पास है और भाजपा के आपके साथी ही वित्त मंत्रियों के अधिकारप्राप्त समूह के अध्यक्ष हैं। अब आप विपक्ष में रहते हुए उस काम को पूरा करने में मदद क्यों नहीं कर रहे हैं जिसकी आपने विपक्ष में रहते हुए शुरुआत की थी।

यकीनन आप एक राजनेता हैं और अधिकतम राजनीतिक लाभ हासिल करना आपका मकसद है। ऐसे में आपके विरोधी रुख को समझा जा सकता है। आप इस सरकार को जीएसटी को सफलतापूर्वक लागू कर कोई राजनीतिक लाभ नहीं हासिल करने देना चाहते। लेकिन हकीकत यह है कि इसका फायदा कहीं न कहीं भाजपा को भी मिल सकता है।

आइए संभावित लागत से शुरुआत करते हैं। जीएसटी से फायदा नुकसान हो सकता है लेकिन वह भाजपा और कांग्रेस में से किसी के लिए भी उतना अधिक बुरा नहीं होगा। सच है कि ऐसे में जबकि कर दरें तय हैं, यकीनन अल्पावधि के दौरान कुछ राज्यों के राजस्व में कमी आएगी लेकिन इन राज्यों को होने वाले नुकसान की भरपाई 13वें वित्त आयोग द्वारा दिए गए सुझावों के मुताबिक की जा सकती है। कहा जाता है कि अप्रत्यक्ष कर मुख्य रूप से भाजपा से जुड़े मतदाताओं यानी छोटे कारोबारियों को नुकसान पहुंचाएगा क्योंकि उसको बेहतर तरीके से अपने खातों का रखरखाव करना होगा और वह कर वंचना आसानी से नहीं कर पाएगा। लेकिन एक दशक पहले राज्यों में वैट लागू करके आपने पाया था कि छोटे कारोबारियों पर इसका अधिक बोझ नहीं पड़ा। जीएसटी का अनुभव इससे अलग नहीं होगा। श्रीमान सिन्हा मैं आपसे कहना चाहूंगा कि जीएसटी का समर्थन करने के कारण आपको एक वोट भी गंवाना नहीं पड़ेगा।

आपकी एक उचित चिंता यह हो सकती है कि जीएसटी को लागू करने के इतने फायदे हो सकते हैं जिनका लाभ यह सरकार अगले आम चुनावों में उठा सकती है। लेकिन आपको चिंता करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि समय इस धारणा को गलत साबित करने वाला है। अच्छे से अच्छे हालात में जीएसटी का क्रियान्वयन 2013 के अंत में या 2014 के आरंभ में होगा। जाहिर है इसका आर्थिक प्रभाव अगले चुनाव के बाद ही नजर आना शुरू होगा। इस तरह यह कहा जा सकता है कि आपको इसका कोई राजनीतिक नुकसान नहीं उठाना होगा।

आपको यह चिंता भी हो सकती है कि जीएसटी विधेयक के पारित होने से घरेलू और विदेशी निवेशकों की नजर में सरकार की छवि सुधर जाएगी। इस बात में सच्चाई है। लेकिन जीएसटी के पारित होने के असर के निवेशकों के यकीन पर पडऩे वाले असर बढ़ाचढ़ाकर नहीं देखा जाना चाहिए। निवेशक, खासतौर पर विदेशी निवेशक जीएसटी पर बहुत ध्यान नहीं दे रहे हैं।

वे जीएसटी जैसे ढांचागत और लंबी अवधि के सुधारों का असर समझ पाने के लिए तैयार नहीं हैं। वे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, वित्तीय क्षेत्र के सुधार और पूंजी प्रवाह आदि को लेकर अधिक चिंतित हैं। ऐसे में आप भले ही निवेशकों से जुड़े सुधारों पर अपनी तरह के फैसले लें लेकिन आपको जीएसटी को बख्श देना चाहिए।

संक्षेप में बात करें तो श्रीमान सिन्हा, जीएसटी की प्रकृति ही ऐसी है कि इसके फायदे तो बहुत हैं लेकिन आपके राजनीतिक नजरिये के लिए महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ये फायदे काफी लंबी अवधि में देखने को मिलेंगे। जाहिर है न तो भारत के मतदाताओं और नही न्यूयॉर्क अथवा लंदन के फंड मैनेजरों पर कोई असर पड़ेगा। इसलिए इस बात की कोई संभावना नहीं है कि आप जीएसटी का समर्थन करके कोई राजनैतिक लाभ गंवाएंगे। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि देश का मध्य वर्ग जिसकी राय काफी मायने रखती है वह यह देख रहा है कि कैसे जीएसटी के मसले पर दोहरे मानक अपनाए जा रहे हैं। उनको पता है कि अगर आप सत्ता में होते तो आपने जीएसटी को उतना ही बढ़ावा दिया होता जितना कि आप अभी उसका विरोध कर रहे हैं। अगर वाजपेयी की तरह राजनीति निरपेक्ष होकर कदम उठाया जाए तो भाजपा को मध्य वर्ग की कुछ सद्भावना हासिल हो सकती है। जिसकी यकीनन उसे बहुत आवश्यकता है।

अरविंद सुब्रमण्यन
(हिंदी बिजनेस स्टैंडर्ड से साभार)

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