विशेष दर्जे के मायने

बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार और कांग्रेस एक दूजे की ओर तक रहे हैं। चिदंबरम बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए मानकों में कुछ बदलाव करने का भरोसा दे चुके हैं, जिसकी मांग नीतीश लंबे समय से करते रहे हैं। 17 मार्च को नीतीश ने रामलीला मैदान में अपनी रैली में एक बार फिर यह मांग उठाई। नीतीश कुमार लोकसभा चुनावों में विशेष राज्य के दर्जे की उपलब्धि को भुनाना चाहते हैं। निश्चित रूप से वह इतने भोले नहीं हैं जो यह मानकर चल रहे हों कि यह दर्जा बिहार का कायाकल्प कर देगा और निकट भविष्य में बिहार आर्थिक पिछड़ेपन से उबर जाएगा।

देश में 11 राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा हासिल है। इनमें उत्तर-पूर्व के सभी राज्यों के अलावा हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड शामिल हैं। 1969 में तीन राज्यों असम, नागालैंड और जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने के साथ यह सिलसिला शुरू हुआ था। अन्य राज्यों को अलग-अलग समय पर यह दर्जा दिया गया। आखिरी बार 2001 में उत्तराखंड को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया था, ताकि वह पिछड़ेपन, ढांचागत अभाव, पूंजी और संसाधनों की कमी जैसी समस्याओं के समाधान तलाश सके। विशेष दर्जे को कोई संवैधानिक समर्थन नहीं होता है। योजना आयोग की तरह यह विकास और पिछडे़पन से लड़ने की संविधान से इतर एक व्यवस्था है। किसी राज्य को विशेष दर्जा देने के लिए योजना आयोग ने कुछ मानक तय कर रखे हैं। मसलन, राज्य में पहाड़ी भू-भाग, कम जनसंख्या घनत्व, जनजातीय आबादी, सीमा पर सामरिक महत्व, आर्थिक व ढांचागत पिछड़ापन होना जरूरी है। इसमें राज्य की भौगोलिक संरचना बड़ा महत्व रखती है।

बिहार इन सभी मानकों पर खरा नहीं उतरता है। बिहार का पिछड़ापन उसकी भौगोलिक संरचना के कारण नहीं है, बल्कि बीते वर्षो में लगातार प्रशासन की असफलता का नतीजा है। यदि प्रशासन की असफलता को किसी राज्य को विशेष दर्जा देने का मानक मान लिया जाए तो देश के बहुत से राज्य इस श्रेणी में आने की पात्रता पूरी कर लेंगे। यदि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिल जाता है तो उसे वास्तव में क्या लाभ होगा? विशेष राज्य का दर्जा मुख्य रूप से बड़ी केंद्रीय योजनागत मदद अपने साथ लाता है। राज्यों को योजनागत मदद कई तरीकों से दी जाती है। जैसे विभिन्न उद्देश्यों के लिए सामान्य और अतिरिक्त मदद अथवा विशेष योजनागत मदद। विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों को सामान्य मदद बढ़ जाती है, जो तथाकथित गाडगिल-मुखर्जी फार्मूले के तहत दी जाती है। इसके तहत केंद्र की राज्यों को दी जाने वाली कुल मदद का 30 फीसद विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों को दिया जाता है। यह मदद बाहरी सहायता से दी जाने वाली योजनाओं, विशेष क्षेत्र कार्यक्रमों और उत्तर-पूर्व परिषद को दिए जाने वाला अनुदान तय करने के बाद दी जाती है। शेष राशि दूसरे राज्यों में वितरित कर दी जाती है, जो उन राज्यों की जनसंख्या, प्रति व्यक्ति आय आदि मानकों के आधार पर दी जाती है।

11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान गाडगिल-मुखर्जी फार्मूले के तहत कुल एनपीए में बिहार की हिस्सेदारी 11 फीसद थी। यह उत्तर प्रदेश को छोड़कर तमाम राज्यों में सबसे अधिक थी। उत्तर प्रदेश का हिस्सा 19.5 फीसद था। विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों में सिक्किम का हिस्सा 3.8 प्रतिशत तो असम का 19.5 फीसद था। केंद्र से भारी अनुदान के अलावा विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों को उद्योग स्थापित करने के लिए एक्साइज ड्यूटी सहित विभिन्न करों में छूट दी जाती है। विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों की संख्या तीन से बढ़कर 11 होने के बावजूद इन राज्यों को दी जाने वाली केंद्रीय अनुदान की 30 फीसद राशि में बदलाव नहीं किया गया। नतीजतन राज्यों का अनुदान में हिस्सा गिरता चला गया। राज्यों को अनुदान के रूप में मुहैया कराए जाने वाले धन पर उनका कोई नियंत्रण नहीं रहता है। सरकारी खातों से बाहर रहने कारण इसमें पारदर्शिता का भी अभाव रहता है। यह भारतीय वित्तीय व्यवस्था में राजनीतिक रूप से चली गई चाल है। लेकिन, यह राजस्व के संघीय ढांचे के सिद्धांतों पर प्रहार भी है। साल दर साल इस तरह के अतिरिक्त बजट का सीधे हस्तांतरण बढ़ता रहा, जबकि गाडगिल फार्मूले के तहत दिया जाने वाला अनुदान घटता चला गया।

नौवीं योजना के दौरान कुल योजनागत हस्तांतरण में उन राज्यों की हिस्सेदारी 35 प्रतिशत थी, जो 11वीं योजना तक घटते-घटते 10 प्रतिशत ही रह गई। इसके विपरीत सीधे हस्तांतरण में हिस्सेदारी इस अवधि के दौरान 20 फीसद से बढ़कर 52 प्रतिशत हो गई। परिणामस्वरूप विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों के लिए योजनागत मदद हस्तांतरण भी सिकुड़ता गया। राज्यों के बजट से होकर जाने वाला योजनागत अनुदान अब राज्यों के कुल हस्तांतरण का 30 फीसद से भी कम है। 2011-12 के दौरान बिहार को मिले कुल राजस्व प्राप्ति का करीब पांचवां भाग यानी 8958 करोड़ रुपये सीधे हस्तांतरण के तहत दिए गए, जिस पर राज्य सरकार का कोई नियंत्रण नहीं था।

यदि नीतीश विशेष राज्य के दर्जे पर अड़े न रहकर व्यवहारिक रुख अपनाते हैं तो उन्हें केंद्रीय कल्याण के नाम पर सीधे हस्तांतरित किए जाने वाले फंड को बंद कर इस राशि को राज्य की जरूरत के अनुसार इस्तेमाल करने की मांग करनी चाहिए। वरना विशेष राज्य बनकर बिहार को ज्यादा कुछ हासिल नहीं होगा। सिर्फ टैक्स में छूट मिलने से ही राज्य में उद्योग नहीं आ जाएंगे। विशेष दर्जा हासिल होने के बावजूद उत्तर-पूर्व के राज्यों में भी नए उद्योग नहीं लग रहे हैं। बिजली और ढांचागत सुविधाएं इसके लिए और भी ज्यादा जरूरी हैं। विशेष राज्य का दर्जा हासिल कर नीतीश राजनीतिक स्कोर तो बना लेंगे, लेकिन बिहार की अर्थव्यवस्था वहीं रहेगी जहां है।

- गोविंदो भट्टाचार्जी (लेखक पब्लिक फाइनेंस के विशेषज्ञ हैं)
साभारः दैनिक जागरण