फिर भू माफिया और निकायों में अंतर ही क्या रहा?

देशभर में बहुत से ऐसे लोग हैं जो खुले आसमान के तले जीवन बसर करते हैं। सिर ढंकने तक को छत नहीं मिल रही। दूसरी ओर जिन स्थानीय निकायों पर लोगों को सस्ते आवास उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है, वे जमीनों के कारोबार में लग गए हैं। ये निकाय जनहित और आवास योजनाओं के नाम पर किसानों की जमीनें तो बहुत कम कीमत में लेते हैं, लेकिन जब योजना विकसित करके भूखंड अथवा आवास देने की बारी आती है तो वे इतने शुल्क जोड़ देते हैं कि वही जमीन दस गुना महंगी हो जाती है।

ऐसे में निकायों की आवास योजनाओं में अधिकांश भूखंड अथवा मकान उन्हीं लोगों को मिलते हैं जिन्हें उनकी जरूरत नहीं होती। ऐसे लोग निवेश के रूप में इन योजनाओं में आवास या भूखंड लेते हैं और बाद में महंगे दाम पर बेच देते हैं। इस तरह स्थानीय निकाय खुद जमीनों का कारोबार करते और करवाते हैं। पिछले दिनों में कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जिनमें निकायों की विकसित आवासीय योजनाओं का कई कई साल से पूर्ण विकास नहीं हुआ अथवा वहां मूलभूत सुविधाएं भी विकसित नहीं की गईं। जबकि निकायों को सभी वर्गों का ध्यान रखते हुए निजी क्षेत्र से सस्ते मकान उपलब्ध कराए जाने चाहिए। परन्तु अधिकारीगण निजी प्रॉपर्टी डीलर या रियल एस्टेट सेक्टर के लोगों से मिलकर जानबूझकर अपनी योजनाओं को महंगा रखते हैं जिससे प्राइवेट डवलपर्स की योजनाएं बिक सकें।

जयपुर में भी जयपुर विकास प्राधिकरण ने जमीनों की आरक्षित दर तय करने का जो फार्मूला अपनाया है, उसमें कृषि भूमि पर इतने शुल्क जोड़ दिए हैं कि जमीन दस गुना महंगी करके लोगों को आरक्षित दर पर उपलब्ध कराई जा रही है। जबकि हाउसिंग सोसायटी और निजी डवलपर्स की स्कीमों में वहीं जमीन दोगुनी या ढाई गुनी कीमत पर ही बेची जा रही है। जबकि इसमें उनका मुनाफा और सरकारी अधिकारियों को दिया जाने वाला सुविधा शुल्क भी शामिल है। इसका खुलासा भी तब हुआ जब पत्रकारों के लिए घोषित की गई आवासीय योजना की आरक्षित दर 3400 रुपए प्रति वर्गमीटर रखी गई, जबकि उसी जगह पर रिहायशी जमीन की डीएलसी दर 210 रुपए प्रति वर्गमीटर बताई गई है। दर में इतना अंतर आने पर जब पड़ताल की गई तो इसका खुलासा हुआ कि स्थानीय निकाय किस तरह से आवासीय योजनाओं में लोगों से पैसा वसूल कर रहे हैं। निकाय लाभ कमाने वाली संस्था नहीं हैं और उन्हें दूसरे मदों में भी जैसे नक्शा पास करने, भू उपयोग परिवर्तन करने, प्राइवेट योजनाओं का अनुमोदन करने पर शुल्क मिलते हैं, इसलिए उन्हें निजी क्षेत्र से प्रतिस्पर्द्धा करते हुए भूखंडों अथवा आवासों की कीमतें इतनी रखनी चाहिए जिससे कम आय वाले लोग और जरूरतमंदों को आवास मुहैया हो सके।

- गिरिराज अग्रवाल