बीता वक़्त और दलितों की दशा

अनेक वर्षों से कई सामाजिक-राजनीतिक संगठनों द्वारा दलित समस्याओं को लेकर देश में जगह-जगह चर्चाएं-परिचर्चाएं की जाती रही हैं. सवाल उठाया जाता रहा है कि आखिर कब तक दलित पूरी तरह से आर्थिक-सामाजिक रूप से बेहतर होगा और वह भी समाज में उसी तरह सम्मान के साथ निडर होकर जी सकेगा जैसे समाज के अगड़े जी रहे हैं. ऐसे सवाल भी उठाये जा रहे हैं जो दलितों के लिए केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा लागू की गयी योजनाओं के अपेक्षित परिणाम न आने को लेकर हैं.

जिस आक्रामता के साथ दलित समस्याओं को उठाया जा रहा है, उससे साफ हो गया कि अब सरकारी-गैरसरकारी प्रयासों की समीक्षा बिना किसी आग्रह या दुराग्रह के करने का वक्त आ गया है. आजादी के बाद जब नया संविधान लागू किया गया तब आशा जगी थी कि दो दशक में तमाम दलित और पिछड़ों की समस्याओं से निजात मिल जाएगी. कांग्रेसी-गैरकांग्रेसी सरकारों ने दलितों के कल्याण व विकास की तमाम योजनाएं बनायीं और लागू किया. आरक्षण के जरिये उनकी आर्थिक, सामाजिक बेहतरी के लिए तमाम कदम उठाये गये. दलितों को हर उन अधिकारों को देने की पहल की गयी जिनसे वे सदियों से वंचित रहे और जिनकी किसी ने कभी कल्पना नहीं की होगी.

बावजूद इसके, दलितों से मुतल्लिक तमाम समस्याएं आज भी समाधान के लिए बाट जोह रही हैं. गांवों में दलित खेतिहर मजदूर के रूप में शोषण का शिकार हो रहा है. इसके अलावा लाखों की तादाद में बंधुआ मजदूर के रूप में दलित शोषित हो रहा है. जिन 75 लाख परिवारों के पास अपनी हकदारी का आवास न होने की बात सरकार मानती है, उनमें से ज्यादातर दलित तबके हैं. गांवों में भूमि-सुधार की जो पहल आजादी के बाद की गयी थी वह कारगर नहीं हो पाई. नतीजा यह हुआ कि गांव का दलित तमाम कोशिशों के बावजूद अब भी खेती के काबिल जमीन से लगभग महरूम है. गांव-गांव में पानी के संकट से निजात दिलाने के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों ने चापाकल (हैंडपाइप) लगवाने की जो योजनाएं लागू कीं उससे बड़ी तादाद में दलितों को लाभ तो हुआ, लेकिन अभी देश में हजारों गांव ऐसे हैं जहां न चापाकल पहुंच पाया है, न ही बिजली के तार लग पाये हैं. इसके अलावा और भी तमाम समस्याएं हैं जिससे गांव का दलित रोजाना रूबरू होता रहता है.

केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा दलितों की बेहतरी के लिए जो योजनाएं लागू की जाती हैं, उनमें अधिकतर भ्रष्टाचार का शिकार हो जाती हैं. सरकार द्वारा जरूरतमंदों के लिए जारी धन देर में और इतनी कम तादाद में पहुंच पाता है कि उससे दलितों की बेहतरी की आशा नहीं की जा सकती. उदाहरण के तौर पर मनरेगा को ही ले लें. सरकार द्वारा गांव के बेरोजगारों को 100 दिन के रोजगार की गारंटी देने वाली इस योजना के लिए आवंटित धन अधिकतर जिलों में जरूरतमंद लोगों के पास नहीं पहुंच पा रहा है. इसे ग्रामीण विकास मंत्रालय की संसदीय सर्वेक्षण रपट में भी स्वीकार किया गया है. इसी तरह दलितों के मैला ढोने के कार्य को समाप्त करने की तमाम घोषणाओं के बावजूद अब भी शहरों-कस्बों की महिलाएं बड़ी तादाद में इस अमानवीय-प्रथा को मजबूरी में ढो रही हैं जब कि केन्द्र और राज्य सरकारें इस कुप्रथा को जड़ से ही खत्म करने के दावे करती रही हैं.

हालांकि दलित भारतीय समाज के दूसरे तबकों से कई मायने में अब भी पीछे है, पर यह भी सही है कि आजादी के बाद दलित समाज को जो संवैधानिक, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक अधिकार मिले, वे हजारों वर्षों में पहली बार हासिल हुए. इसलिए दलित संगठनों को अपनी आक्रामकता के वक्त इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि दलित उत्थान और उनकी बेहतर स्थिति जो अब है, वह इतिहास में पहले कभी नहीं थी. गांवों में जहां उन्हें कुएं का पानी भरना दूर, उस पर चढ़ने तक की मनाही थी, वहां अब वह निडर होकर(कुछ अपवादों को छोड़ दें तो) पानी भरता है. दलित शासन और प्रशासन की उस ऊंचाई पर पहुंच गया है, जहां आजादी के पहले उसके पूर्वज कभी स्वप्न में भी नहीं सोचे रहे होंगे.

-अखिलेश आर्येन्दु

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