एक शिक्षक होने के लिए

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) द्वारा निर्धारित योग्यता के अनुसार, वर्तमान में शिक्षक बनने के इच्छा रखने वाले अभ्यर्थियों को न केवल डिप्लोमाधारी होना चाहिए बल्कि शिक्षण पात्रता परीक्षा (टीईटी) में भी उत्तीर्ण होना चाहिए। पहली से पांचवी कक्षा में अध्यापन के लिए अभ्यर्थी को सीनियर सेकेंडरी स्तर पर 50% अंक के साथ प्राथमिक शिक्षा में डिप्लोमा और शिक्षक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण होना आवश्यक है।

सवाल यह है कि आखिर टीईटी की आवश्यकता क्यों? क्या डिप्लोमा काफी नहीं है? यदि नहीं है तो क्या यह उक्त पाठ्यक्रम की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह नहीं है? कितना ही अच्छा होता यदि एक अतिरिक्त बाधा पैदा करने की बजाए मौजूदा प्रविष्टि बाधा अर्थात योग्यता की समीक्षा और सुधार पहले कर ली जाए।

दूसरा सवाल यह है कि, क्या टीईटी यह गारंटी दे सकता है कि ऐसे शिक्षकों द्वारा पढ़ाए गए छात्रों का परीक्षा परिणाम व ज्ञान का स्तर तुलनात्मक रूप से श्रेष्ठ होगा? उदाहरण के तौर पर, आईईएलटीएस या टीओईएफएल प्रमाण पत्र उस परीक्षा की तरह है जो डिग्रीधारक के कौशल को प्रमाणित करती है। यदि किसी का आईईएलटीएस में स्कोर अच्छा है तो इसका मतलब यह है कि आप उसके अंग्रेजी वाक कौशल पर भरोसा कर सकते हैं।

ये बात और है कि कई शोध अध्ययनों के बावजूद प्राथमिक स्कूलों में सीखने की उपलब्धियों और अनिवार्य शिक्षक योग्यता मानदंड के बीच सीधा संबंध देखने को नहीं मिला है। जबकि शोधों के बाबत यह जरूर स्पष्ट हुआ है कि योग्यता और ज्ञान से अधिक परिश्रम और लगन महत्वपूर्ण है।

अतः निति निर्धारकों व शिक्षाविदों के लिए सुझाव है कि बजाय दो स्तरीय प्रवेश बाधाओं के, सरकार को प्रथम, अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय आदि विभिन्न प्रतिष्ठित निजी संस्थाओं को अनुमति देनी चाहिए कि वे भावी शिक्षकों के साथ ही स्कूलों का प्रमाणीकरण कर सकें। यह प्रमाणीकरण स्वैच्छिक होना चाहिए।

इसी तरह टीईटी के भी कई विकल्प हो सकते हैं जो विभिन्न कौशलों या कठिनाईयों या विषयों के ज्ञान पर आधारित हो सकते हैं। 

स्कूलों की मान्यता के लिए- बजाय आरटीई मॉडल के अनिवार्य बुनियादी सुविधाओं आधारित मान्यता के,  गुजरात की तर्ज पर विद्यार्थियों के परिणाम और अभिभावकों की संतुष्टि के स्तर सहित कई घटकों पर एक तीसरी पार्टी द्वारा मूल्यांकन किया जा सकता है।

इस सुझाव से इत्तेफाक न रखने वाले ऐसा कह सकते हैं कि: (क) निजी स्कूलों के द्वारा पैसे बचाने के लिए अयोग्य शिक्षकों की सेवा लेने की संभावना है, (ख) प्रथम पीढ़ी के शिक्षार्थियों के गरीब अभिभावकों के पास स्कूलों पर इस बात के लिए दबाव डालने की क्षमता नहीं है कि बच्चों को केवल अच्छे शिक्षक ही पढाए, और ( ग) सरकार सार्वजनिक और निजी स्कूलों में अध्यापन की गुणवत्ता को कैसे सुनिश्चित कर पायेगी?

क्या हम इस तथ्य की अनदेखी कर सकते हैं कि बजट प्राइवेट स्कूल ना तो मुफ्त शिक्षा देते है और ना ही मुफ्त वर्दी, किताबें और स्टेशनरी देते हैं। फिर भी गरीब माता-पिता इन निजी बजट स्कूलों की शिक्षा की गुणवत्ता की सराहना करते हैं और पब्लिक स्कूलों की बजाय उन्हें ही पसंद करते हैं। निजी एजेंसियो द्वारा मान्यता देने की व्यवस्था होने व स्कूलों की गुणवत्ता का आंकलन करने से स्कूलों में प्रतिस्पर्धा बढेगी, उनकी गुणवत्ता में सुधार के लिए स्कूलों में उत्साह बढेगा। उधर, अकेले सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के लिए 12 लाख पद रिक्त हैं। बहु स्तरीय प्रवेश बाधाएं आपूर्ति की कमी पैदा करते हैं। इसके अलावा, हर कानून की प्रशासनिक, प्रवर्तन और अधिनिर्णय लागत है। बेहतर मूल्यांकन और प्रोत्साहन के साथ अच्छी शिक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

 

- प्रशांत नारंग (लेखक अधिवक्ता हैं और एक जनहित कानूनी पहल के साथ जुड़े हैं)

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