अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात का प्रयास

सर्वेक्षण पर सवाल

जनमत सर्वेक्षणों पर कांग्रेस की आपत्ति निराधार नहीं कही जा सकती, लेकिन वह जिस तरह उन पर प्रतिबंध लगाने की वकालत कर रही है उससे उसके इरादों को लेकर संदेह पैदा होता है। क्या वह इसलिए जनमत सर्वेक्षणों के खिलाफ खड़ी हो गई है, क्योंकि हाल के ऐसे सर्वेक्षणों में उसकी हालत पतली होती दिखाई गई है? पता नहीं सच क्या है, लेकिन यह स्पष्ट है कि कांग्रेस पिछले कुछ समय से अपने आलोचकों के प्रति कुछ ज्यादा ही सख्त तेवर अपनाती दिख रही है।

क्या यह महज एक दुर्योग है कि पहले एक तरह से सोते से जगकर टीवी चैनलों को यह हिदायत दी गई कि वे प्रधानमंत्री के लालकिले के भाषण की तुलना किसी अन्य के भाषण से करने से बाज आएं और फिर लता मंगेशकर पर इसलिए हमला बोल दिया गया कि उन्होंने मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने की इच्छा जाहिर कर दी? ध्यान रहे कि इसके पहले कुछ पाठ्य पुस्तकों में छपे काटरूनों को निकाल बाहर किया गया था, जबकि वे बच्चों को सरस ढंग से शिक्षित करने का माध्यम थे। क्या कांग्रेस उस सब पर प्रतिबंध लगा देगी जो उसे रास नहीं आएगा?

कांग्रेस ने खुद को इस सवाल के समक्ष खड़ा करने का काम अपने आचरण के जरिये किया है। वह केंद्रीय सत्ता का नेतृत्व कर रही है तो इसका यह मतलब नहीं हो सकता कि इस देश में सब कुछ उसी के हिसाब से हो और यहां तक कि लोग वैसा ही बोलें-कहें अथवा अनुमान लगाएं जैसा उसे रुचिकर लगता हो। बेहतर हो कि कांग्रेस अपने रुख-रवैये में तनिक नरमी लाए। जनमत सर्वेक्षणों पर पाबंदी के बजाय उसे ऐसी कोई मांग करनी चाहिए कि उन्हें और तार्किक, वैज्ञानिक और विश्वसनीय बनाए जाने की जरूरत है। उसे इस तरह की मांग करने का भी अधिकार है कि मौजूदा माहौल में जनमत सर्वेक्षणों के प्रकाशन-प्रसारण की अवधि पर नए सिरे से विचार किया जाए-ठीक वैसे ही जैसे एक्जिट पोल अर्थात मतदान बाद सर्वेक्षणों के प्रकाशन-प्रसारण की अवधि निश्चित की गई है।

जनमत सर्वेक्षणों पर पाबंदी की मांग इसलिए सही नहीं क्योंकि वे किसी न किसी स्तर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा हैं। इस तरह की कोई पाबंदी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के माहौल पर बुरा असर डाल सकती है। इस सबके साथ ही इस तथ्य को भी आत्मसात करने की आवश्यकता है कि जनमत सर्वेक्षण पूरी तरह वैज्ञानिक और विश्वसनीय नहीं कहे जा सकते। जनमत सर्वेक्षण अनेक बार न केवल गलत साबित हो चुके हैं, बल्कि यह भी जाहिर कर चुके हैं कि कई दफे उन्हें राजनीतिक दल विशेष के हितों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है। दलगत हितों की पूर्ति करने वाले आधे-अधूरे ढंग से तैयार जनमत सर्वेक्षण अपना ही नुकसान कर रहे हैं। यह ठीक नहीं कि एक अरब से अधिक आबादी वाले देश में कुछ सौ लोगों की राय को देश की राय बताकर पेश किया जाए।

जो लोग भी जनमत सर्वेक्षणों की वकालत कर रहे हैं उन्हें इसके लिए भी कोशिश करनी चाहिए कि वे कैसे विश्वसनीय बनें? जनमत सर्वेक्षणों के समर्थक इससे इन्कार नहीं कर सकते कि यह जनमत की टोह लेने की एक ऐसी विधा है जिसे और भरोसेमंद बनाया जाना शेष है, लेकिन यह भी सही है कि जनमत सर्वेक्षणों पर सवाल उठाना और उन पाबंदी की मांग करना अलग-अलग बातें हैं।

 

साभारः दैनिक जागरण