अनोखा संघर्ष : अब बैंबू का दर्जा बदलने के लिए शुरू हो गई जंग

विश्‍व में भारत ऐसा देश है, जहां पर बांस सबसे ज्‍यादा पाया जाता है। मगर वन विभाग कानून के तहत इसे पेड़ की कैटेगरी में दर्ज किया गया है, यही कारण है कि इसकी गैरकानूनी ढंग से कटाई पर भारत में रोक है, लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि बांस कोई पेड़ नहीं है, बल्‍कि यह घास की ही एक प्रजाति का वंशज है।

भारत को छोड़कर बहुत से देशों में इसे घास का दर्जा प्राप्‍त है। बांस को पेड़ की कैटेगरी से हटाकर घास की कैटेगरी में शामिल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट जल्‍द ही सुनवाई करेगी।

सेंटर फॉर सिविल सोसायटी नामक एक स्‍वयं सेवी संस्‍था ने अधिवक्‍ता निधि व प्रशांत नारंग के माध्‍यम से यह जनहित याचिका दायर की है। इस याचिका के माध्‍यम से बांस को घास की कैटेगरी में शामिल किए जाने की मांग की गई है, जिससे कि यहां के लोग पेड़ों की बजाए घरेलू फर्नीचर में बांस का प्रयोग आसानी से कर सकें।

यह है पूरा मामला
स्‍वयं सेवी संस्‍था की ओर से सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर करने वाली अधिवक्‍ता निधि एवं प्रशांत नारंग का याचिका में कहना है कि इंडियन फॉरेस्ट एक्ट, 1927 के सेक्शन 2 के अनुसार बांस अब भी लकड़ी है। राज्यों ने अब तक अपने कानूनों को फॉरेस्ट राइट एक्ट 2006 में समाहित नहीं किया है, अतः लकड़ी (पेड़ों) पर लागू होने वाले सभी नियम कानून बांस पर भी लागू होते हैं। परमिट प्राप्त करने की थकाऊ, समय बर्बाद करने व प्रताड़ित करने वाली प्रक्रिया अपनाई जाती है। जिससे बांस उद्योग देश में पनप नहीं पा रहा। याचिकाकर्ता का कहना है कि माननीय सर्वोच्च अदालत ने वर्ष 1996 में बांस को माइनर फॉरेस्ट प्रोडक्ट के तौर पर मान्यता देते हुए जंगलों में इसकी कटाई पर से रोक हटा दी थी। वहीं, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की तरफ से 14 मई 2013 में राज्य सरकारों से निजी भूमि पर उगाए गए बांस के लिए ट्रांजिट पास की अनिवार्यता समाप्त करने का आग्रह किया गया। इंडियन फॉरेस्ट एक्ट के सेक्शन 41 के अनुसार, राज्य सरकारों को भी लकड़ी व अन्य जंगली उत्पाद के परिवहन (ट्रांजिट) से संबंधित अपने नियम बनाने की शक्ति प्राप्त है। यहां तक कि सेक्शन 41 (ई) बांस व अन्य वन्य उत्पादों को ट्रांजिट रेग्युलेशन से छूट भी प्रदान की गई है। इसके बावजूद बांस सेक्टर में कुछ भी नहीं बदला है। कोटा राज/लाइसेंस राज प्रणाली ने देश को दशकों तक जकड़े रखा है। बड़े उद्योगों को 1991 में आर्थिक व व्यापार करने की आजादी प्राप्त हो गई किंतु छोटे उद्योग अब भी सदियों पुराने नियमों में जकड़े हुए हैं और आर्थिक आजादी व विकास से दूर हैं। चूंकि राज्य अब बांस उद्योग को उदार और व्यावसायीकरण कर विकसित करना चाहते हैं इसलिए यह जरूरी हो गयी है कि इस मामले में दखल दिया जाए।

भारत में उपज ज्‍यादा, मगर वैश्‍विक हिस्‍सेदारी कम

संस्‍था के पदाधिकारी अमित चंद्रा ने र्इनाडु इंडिया को विशेष बातचीत के दौरान बताया कि वैज्ञानिक तौर पर बांस, घांस की एक बड़ी प्रजाति है। बांस की 1200 से ज्यादा प्रजातियां होती हैं और यह गर्म व सर्द सभी प्रकार के वातावरण में व पहाड़ व मैदान सभी प्रकार के भू-क्षेत्र में पाया जाता है। भारत में बांस 90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र (विश्व में सबसे बड़ा भूभाग) में पैदा होता है और विश्व बाजार में इसकी हिस्सेदारी महज 4.5% है। चीन में बांस 40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में पैदा होता है किंतु विश्व बाजार में इसकी हिस्सेदारी 50% से अधिक है। बांस कटाई के बाद स्वतः उत्पन्न हो जाता है और यह अन्य पेड़ों की तुलना में वातावरण से 25% ज्यादा कार्बन डाई ऑक्साइड सोखता है। यह गुण घास का होता है, न कि पेड़ों का। दुनिया भर में लगभग 600 मिलियन लोगों की आजीविका बांस और इससे संबंधित उद्योगों पर निर्भर है।

सरकार मान रही है बांस उद्योग की महत्‍ता

संस्‍था के पदाधकारी अविनाश चंद्रा ने ईनाडु इंडिया को बताया कि केंद्र सरकार भी बांस की महत्‍ता का लोहा मान रही है। जिसके चलते अलग-अलग तरह की योजनाएं राज्‍यों सरकारों के साथ मिलकर शुरू की गई हैं। बांस की महत्ता को देखते हुए भारत सरकार ने बांस उद्योग को बढ़ावा देने के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज-बैंगलोर, कर्नाटका फॉरेस्ट डिपार्टमेंट, नेशनल मिशन ऑन बाम्बू एप्लिकेशन की स्थापना की है। योजना आयोग ने इसे विशेष दर्जा प्रदान करते हुए नेशनल मिशन ऑन बाम्बू टेक्नोलॉजी एंड ट्रेड डेवलपमेंट लांच की है। बांस उद्योग के विकास के लिए द नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (नाबार्ड) ने बाम्बू डेवलपमेंट पॉलिसी के तहत प्राथमिक स्तर पर इसके वाणिज्यिकरण पर जोर दिया है।

बांस उद्योग के विकास के लिए सुप्रीम कोर्ट में ये दिए गए हैं सुझाव

- जनजातीय मामलों के मंत्रालय (मिनिस्ट्री ऑफ ट्राइबल अफेयर्स) के 12 जुलाई 2012 में लिखे गए पत्र के सुझावों के अनुसार राज्य सरकारों को ट्रांजिट पास जैसी बाध्यता को पूर्णतया समाप्त कर देनी चाहिए।

- इंडियन फॉरेस्ट एक्ट 1927 में बदलाव कर बांस को पेड़ की बजाए घास के तौर पर वर्णित किया जाना चाहिए और इसके कटाव पर से रोक हटा ली जानी चाहिए।

- लैंड सीलिंग एक्ट में बदलाव कर बांस के पौधारोपण को चाय, कॉफी व इलाईची के पौधारोपण के समतुल्य बनाया जाना चाहिए।

- पवन कुमार शर्मा

साभारः ई-ईनाडू इंडिया