बांस को दिया जाए घास का दर्जा

- वन कानून में बदलाव के लिए सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई जनहित याचिका

- याचिका में ट्रांजिट पास परमिट व्यवस्था खत्म करने की भी लगाई गई है गुहार

विज्ञान मानता है कि बांस भी एक घास है जबकि भारतीय कानून (1927) के मुताबिक वह एक पेड़ या लकड़ी है। इस कानून के हिसाब से किसी भी सरकारी जमीन या जंगल से बांस काटना गैर-कानूनी है। यहां तक कि अपनी निजी जमीन पर भी बांस उगाकर काटने के लिए भी ट्रांजिट पास लेना पड़ता है। इसी मुद्दे पर सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) नामक संस्था ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करने गुहार लगाई है कि सरकार कानून में बदलाव लाकर बांस को घास का दर्जा दे और ट्रांजिट पास की व्यवस्था को खत्म करे।

सीसीएस के अमित चंद्र कहते हैं कि बांस कटाई के बाद खुब ब खुद पैदा हो जाता है और यह अन्य पेड़ों की तुलना में वातावरण से 25% ज्यादा कार्बन डाइ ऑक्साइड सोखता है। उन्होंने कहा कि बांस को पेड़ मानने से देश को बहुत नुकसान हो रहा है। भारत में बांस 90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र (विश्व के सबसे बड़े भूभाग) में पैदा होता है। विश्व बाजार में इसकी हिस्सेदारी महज 4.5% है। जबकि चीन में बांस 40 लाख हेक्टेयर में पैदा होता है और विश्व बाजार में इसकी हिस्सेदारी 50% से अधिक है। चीन, बांस का दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक है।

उन्होंने कहा कि इसका महत्व सरकार भी समझती है। भारत सरकार ने बांस उद्योग को बढ़ावा देने के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज, बैंगलोर और नेशनल मिशन ऑन बैंबू एप्लिकेशन की स्थापनी की। यहां तक कि फॉरेस्ट राइट एक्ट 2006 के तहत बांस का वर्गीकरण नॉन-टिंबर माइनर फॉरेस्ट उत्पाद के तौर पर किया गया है। लेकिन राज्यों ने अबतक अपने कानूनों को फॉरेस्ट राइट एक्ट 2006 में समाहित नहीं किया है। इससे लकड़ी (पेड़ों) पर लागू होने वाले सभी नियम कानून बांस पर भी लागू होते हैं।

ट्रांजिट पास की समस्या सबसे अधिक मध्य प्रदेश व नागालैंड में है। इस परमिट के लिए बहुत समय खर्च करने वाली और प्रताड़ना सहने वाली प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि पहले भी इस दिशा में कई प्रयास हो चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 1996 में बांस को माइनर फॉरेस्ट प्रॉडक्ट के तौर पर मान्यता देते हुए जंगलों में इसकी कटाई पर से रोक हटा दी थी। उधर, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की तरफ से 14 मई 2013 में राज्य सरकारों से निजी भूमि पर उगाए गए बांस के लिए ट्रांजिट पास की अनिवार्यता समाप्त करने का आग्रह किया गया था। अमित कहते हैं कि दरअसल लैंड सीलिंग एक्ट में बदलाव कर बांस के पौधारोपण के समतुल्य बनाया जाना चाहिए।

 

साभारः दैनिक भास्कर