बांस ला सकता है आदिवासियों की जिंदगी में खुशहाली -------(1)

पिछले वर्ष केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर स्पष्ट किया है कि बांस दरअसल घास है न कि इमारती लकड़ी। उनका यह पत्र निश्चित रूप से सार्थक दिशा में उठाया गया एक कदम  था । अब नईं पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने भी बांस के दस हजार करोड़ के व्यापार को पर नौकरशाही के एकाधिकार को खत्म करने के लिए उनके कई एतराजों को खारिज कर उन्होंने बांस को  लघु वन उपज घोषित कर दिया है। इससे आदिवासियों को बांस उगाने और बेचने की अनुमति मिल जाएगी। यदि जयंती नटराजन का फैसला सचमुच जमीनी स्तरपर लागू हो सका तो इससे करोड़ों आदिवासियों के जीवन में खुशहाली आ सकती है।

भारत जैसे देश में प्रगतिशील कानून बनाना बहुत आसान है लेकिन उन्हें लागू कर पाना उतना ही मुश्किल है। बांस उसका बहुत कारगर उदाहरण है। भारतीय वन कानून (1927) बांस को एक पेड़ या इमारती लकड़ी  के बतौर वर्गीकृत करता है । इसका साफ मतलब है  कि वन विभाग का इस पर एकाधिकार है। जो लोग अपने घरों के पिछवाड़े बांस उगाते हैं, उन्हें बगैर वन विभाग की अनुमति के इसे काटने और बेचने का अधिकार नहीं है।

जंगलों और गांवों में रहनेवालों को तभी अपना बांस काटने की अनुमति मिल पाती है जब वे कई अफसरों को  रिश्वत खिलाने  के अलावा लंबा संघर्ष करते । ज्यातर राज्यों में किसी वृक्ष मालिक को बांस काटने के लिए 'पारगमन पास' की जरूरत होती है। इसके तहत वृक्ष मालिकों को राजस्व संबंधी दस्तावेजों के साथ जिलाधिकारी अथवा वन विभाग के अधिकारियों से बांस काटने की अनुमति हासिल करनी होती है।

इस प्रक्रिया में उसे लगभग 10 अलग अलग विभागों की अनुमति लेनी होती है और विभिन्न 'मुख्यालयों' के चक्कर काटने होते हैं। ऐसे में वृक्ष अथवा घास को आय बढ़ाने वाली गतिविधि के रूप में किसी तरह का प्रोत्साहन भी हासिल नहीं हो पाता और ऐसे में कोई वृक्ष नहीं उगाता और पर्यावरण का नुकसान होता है।

इन सारी बातों को ध्यान में ऱखकर ही यूपीए सरकार ने वर्ष 2006 में वन अधिकार कानून पारित किया था । इस अधिनियम के तहत, 'लघु वन उपज का स्वामित्व, उसे एकत्रित करने, इस्तेमाल करने और निपटाना आदि तमाम अधिकार आदिवासियों और पारंपरिक वनवासियों को रहेंगे।'  इस अधिनियम में बांस को भी लघु वन उपज के रूप में चिह्नित किया गया है।

इसके बावजूद वन विभाग की अक्खड़ नौकरशाअपनी बेढंगी चाल से ही चलती रही। नए कानून को लागू करने के बजाय वह भारतीय वन कानून 1927 और उसके नियमों के आधार पर ही चलती रही।उसी के वर्गीकरणों को मानती रही। आखिरकार 2011  में जयराम रमेश ने पत्र लिखकर मुख्यमंत्रियों से कहा है कि वे सभी अपने वन प्रशासन को निर्देश दें कि बांस को लघु वन उपज माना जाए और उपरोक्त समुदायों के अधिकारों का सम्मान किया जाए।जयराम रमेश का आदेश इस स्थिति को केवल आंशिक रूप से ही बदल पाया।

इस वर्ष की सुरूआत में आदिवासी कल्याण मंत्रालय मंत्रिमंडल अपनी यह बात मनवाने में सफल रहा कि किसानों को कई फसलों के लिए  दिए जानेवाले समर्थन मूल्य की तर्ज पर लघु वन उपजों के लिए जिसमें बांस भी शामिल है को न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया जाए। दरअसल प्रधानमंत्री आदिवासी कल्याण की योजनाओं के तहत पहले ही इसकी घोषणा भी कर चुके थे।लेकिन जब आदिवासी कल्याण मंत्रालय बांस का नियंत्रण आदिवासियों को सौंपने और समर्थन मूल्य की योजनालागू करने  के अंतिम चरण में था तब उसे एक झटका क्योंकि पर्य़ावरण मंत्रालय की नौकरशाही  ने वही पुराना राग अलापना शुरू कर दिया कि बांस तो पेड़ है घास नहीं । आदिवासी इसकी फसल नहीं उगा सकते न उसे ला या लेजा सकते है न बेंच सकते है।आखिरकार जयंती नटराजन को अपने विभाग की नौकरशाही एतराजों को खारिज करना पड़ा ताकि बांस की फसल उगाने और बेचने का अधिकार आदिवासियों को मिल सके।  नटराजन ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय वन नियम 1927 के तहत बांस को लघु वन उपज माना जाए।