बांस को मुक्त करने के लिए नौकरशाही और जारी व्यवस्था की बाधा हटे

बांस के पेड़ की बजाए घास होने के तथ्य के वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित और संवैधानिक तौर पर स्वीकृत हो जाने के बावजूद नौकरशाही और पहले से जारी व्यवस्था के कारण अब तक इसे घास के रूप वैधानिक मान्यता नहीं मिल सकी है। जिसके कारण इसकी कटाई और व्यवसायिक प्रयोग की मनाही है। यदि इसे घास के रूप में पर्यावरण और वन मंत्रालय से वैधानिक मान्यता मिल जाती है तो देश में न केवल हरे वृक्षों की कटाई में कमी आएगी बल्कि इसके सहारे आजिविका कमाने वाले लाखों आदिवासियों व जंगल पर निर्भर जनजातियों को व्यवसाय भी उपलब्ध हो सकेगा। यहां तक कि स्वयं योजना आयोग का भी मानना है कि इससे 5 करोड़ लोगों के रोजगार की समस्या का हल हो जाएगा। ये बातें विश्व बांस दिवस (वर्ल्ड बांबू डे) के उपलक्ष्य में सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) व साऊथ एशिया बांबू फाऊंडेशन (एसएबीएफ) द्वारा आयोजित कार्यक्रम व संगोष्ठी के दौरान उभर कर आयीं। इस दौरान उद्योगों के लिए बांस की खेती व इसके सतत प्रयोग की जरूरत पर बल दिया गया और जल्द से जल्द इसे फॉरेस्ट लॉ में बतौर घास सम्मिलित करने की मांग की गई।

इस मौके पर साऊथ एशियन बांबू फांऊडेशन (एसएबीएफ) के संस्थापक व कार्यकारी निदेशक कमेश सलाम ने कहा कि मुख्य मुद्दा पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा बांस को घास के तौर पर स्वीकृत न करने के कारण इसके औद्योगित विकास की राह में गतिरोध बना हुआ है। परिणाम स्वरूप लाखों बांस उत्पादक व आजिविका के लिए जंगलों पर निर्भर रहने वाली जातियां इसका औद्योगिक उपयोग नहीं कर पा रहीं हैं। उन्होंने कहा कि देश की पॉलिसी में तत्काल परिवर्तन अति आवश्यक है। सलाम ने बताया कि संवैधानिक बाधा समाप्त होने के बावजूद नौकरशाही और जारी व्यवस्था के कारण इसका लाभ संबंधित लोगों को नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने कहा कि अब संस्था का मुख्य उद्देश्य कानून और पॉलिसी में परिवर्तन कराना है।

सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) के प्रेसिडेंट पार्थ जे शाह के मुताबिक वर्ष 1927 में बने भारतीय वन अधिनियम में बांस को घास के स्थान पर पेड़ के तौर पर शामिल किया गया है। तब से लेकर अबतक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुए कई वैजानिक शोधों से यह बात साबित हो चुका है कि बांस पेड़ नहीं घास है। इसके बावजूद अधिनियम में अबतक सुधार नहीं किया गया है जिससे आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर लाखों लोग इसके औद्योगिक उपयोग से वंचित है। यदि इसमें सुधार कर लिया जाता है तो यह जनजातिय और आदिवासी लोगों के साथ ही साथ भारतीय उद्योग जगत के लिए भी काफी फायदेमंद होगा।

- अविनाश चंद्र

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