व्यंग्य: बाल दिवस और गंजेपन का एहसास

बाल दिवस और गंजेपन का दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है। लेकिन जिस तरह अमेरिका का कई देशों से कोई लेना-देना नहीं होता लेकिन फिर भी वो उनके फटे में टांग अड़ाता है, उसी तरह बाल दिवस आते ही लोग सोशल मीडिया पर बेवजह गंजों को प्रताड़ित करने लगते हैं। बाल दिवस को गंजेपन से जोड़कर मीम बनाए जाते हैं। कार्टून शेयर होते हैं।

हद ये कि मज़े लेते लेते लोग चाचा नेहरु के मज़े लेने लगते हें। नेहरुजी भी स्वर्ग में बैठे-बैठे सोचते होंगे कि जित्ता बवाल अंग्रेजों ने उनकी जान को नहीं लगाया, उससे कहीं ज्यादा बवाल हिन्दुस्तानी लगाए रहते हैं। जाने कहां-कहां से सच्ची-झूठी तस्वीरें और बयान उनके नाम के साथ जोड़कर वायरल कर देते हैं।

लेकिन अपना नेहरुजी से क्या लेना देना? जब उनके खांटी चेलों को ही नेहरु दर्शन याद नहीं तो अपन काहे बेवजह बाल दिवस पर नेहरुजी को लेकर इमोशनल हों। दरअसल, बाल दिवस पर अपन भावुक हैं अपने बालों को लेकर। कॉलेज का ज़माना था, जब अपनी ज़ुल्फें भी ‘नया दौर’ के दिलीप कुमार की जुल्फों की तरह उछला करती थीं। किसी कुँवारी ने कभी कहा नहीं इसलिए थोड़ा कंफ्यूजन जरुर है कि किसका दिल कितना मचला? कॉलेज के बाद नौकरी खोजने और सो कॉल्ड सैटल होने में इत्ता वक्त चला गया कि उड़ने वाली जुल्फें वास्तव में उड़ गईं। जो थोड़े बहुत बाल बचे, उन्हें मैंने जैसे तैसे एडवेंचर करने से रोका हुआ है।

बालों का मेरे सिर से अब उसी तरह का घनिष्ठ संबंध है, जैसा दिल्ली-एनसीआर में तमाम बिल्डरों से धोखा खाए लोगों का अपने घर से है। घर उनका है, लेकिन पास नहीं है। सिर पर चंद बाल हैं, लेकिन लोगों को दिखते नहीं हैं। मैं अलग अलग महंगे तेल रुपी ईएमआई अरसे से भर रहा हूं, लेकिन ‘चांद’ की जमीन पर बालों का कब्जा नहीं हो रहा। सच कहूं तो लाखों ग्राहकों की तरह मैंने भी मन ही मन मान लिया है कि अब कब्जा नहीं मिलेगा। लेकिन एक धुंधली सी उम्मीद में लड़ाई जारी है।

बाल दिवस पर चाहे अनचाहे मैं बालों की राजनीतिक साजिश का पोस्टमार्टम करने लगता हूं। वो बाल, जो मेरे शरीर से विटामिन-प्रोटीन लेकर हर अंग में उगने को आतुर रहते हैं, लेकिन खोपड़ी से गठबंधन को तैयार नहीं होते। खोपड़ी पर चमकती सुनहरी सतह भी विस्तार को बीजेपी सरीखी व्याकुल है, जिसे विपक्षी बाल अपने नक्शे पर मंजूर नहीं।

करुं तो क्या करुं? मैं इसी बाल चिंतन में खोया हुआ मदहोशी में कागज पर बाल वाले व्यक्ति का रेखाचित्र बनाने लगा। बेटा परेशानी ताड़ गया। बोला-'डैड, गंजेपन को कमी नहीं फैशन स्टेटमेंट बनाइए। अनुपम खेर अंकल की तरह। थोड़ी एक्टिंग को तैयार हों तो आप गंजा बाबा के रुप में भी स्थापित हो सकते हैं। भक्तों की कमी नहीं रहेगी। वैसे भी मार्केट में बहुत दिनों से कोई नया बाबा नहीं आया।'

मैं अब बाल दिवस पर अपने बालक के प्रैक्टिकल ज्ञान पर मोहित हं !

- पीयूष पांडे (लेखक जाने माने व्यंग्यकार और व्यंग्य पुस्तिका छिछोरेबाजी का रिजोल्यूशन के लेखक हैं। 

साभारः नई दुनिया