अच्छा कानून, कमज़ोर अमल

हम लोग अंतर्विरोधों की एक नयी दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं. राजनीति में हम एक व्यक्ति-एक वोट के सिद्धांत को स्वीकार करेंगे. पर हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन में, मौजूदा सामाजिक-आर्थिक ढांचे के चलते हम लोग एक लोग- एक मूल्य के सिद्धांत को हमेशा खारिज करेंगे. कितने दिनों तक हम अंतर्विरोधों का यह जीवन जी सकते हैं? विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष सुखदेव थोरात द्वारा लिखी किताब ‘दलित्स इन इंडिया सर्च फ़ॉर ए कॉमन डेस्टिनी’ बदलते दलित जीवन पर निगाह डालती है और निष्कर्ष देती है कि विगत साठ सालों की तब्दीलियों के चलते अनुसूचित जाति के लोगों में गरीबी थोड़ी कम हुई है, कुछ सार्वजनिक दायरों में अस्पृश्यता एवं भेदभाव की घटनाएं भी कम हुई हैं. दलितों के भौतिक जीवन में आ रहे इन आंशिक रूपांतरणों की वजह से कहें या मुल्क में मौजूद सियासी माहौल की गर्मी का नतीजा कहें कि कभी-कभी यह बात उछलती रहती है कि दलितों-आदिवसियो की रक्षा के लिए बने विशेष कानूनों को अब समाप्त करना चाहिए. दूसरी तरफ़ अगर दलितों पर होने वाले अत्याचारों या उनके साथ बरती जानेवाली अस्पृश्यता के मामलों को देखें तो वही किताब इस विचलित करनेवाले तथ्य को उजागर करती है कि ऐसे मामलों में अपराधियों के बेदाग छूटने की दर 99 फ़ीसदी के करीब है. पिछले दिनों दलितों - आदिवसियो पर अत्याचार की रोकथाम के लिए बने एक विशेष कानून ‘अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण अधिनियम)-1989 के बीस वर्ष पूरे होने पर जगह-जगह जो उसकी समीक्षा का सिलसिला चला, उसमें यही बात स्पष्टता के साथ रेखांकित की गयी. मिसाल के तौर पर राजधानी दिल्ली में विभिन्न दलित मानवाधिकार एवं सामाजिक संगठनों की संयुक्त पहल पर एक दिवसीय कंवेंशन का आयोजन किया गया, जिसका फ़ोकस प्रस्तुत कानून की बीस साला यात्रा की समीक्षा करना था. प्रस्तुत समीक्षा में कानून के अमल की पड़ताल की गयी तथा साथ ही कानून में चंद संशोधन भी प्रस्तावित किये गये. उसमें पीड़ित एवं गवाहों के अधिकारों को सुनिश्चित करने, तत्काल मुकदमा चलाने जैसे सुझावों के साथ उस विसंगति को दूर करने की भी बात की गयी थी, जिसके अंतर्गत एक ही अपराध के लिए भारतीय दंड विधान व अत्याचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत दी जानेवाली ज्यादा और कम सजा का भी उल्लेख था, जिसे दूर करने की बात कही गयी थी. सभी जानते हैं कि वर्ष 1955 में बने ‘प्रोटेक्शन ऑफ़ सिविल राइट्स एक्ट’ की सीमाओं के मद्देनजर इस अत्याचार निवारण अधिनियम-1989 का निर्माण किया गया था, जिसमें कई अहम प्रावधान शामिल किये गये थे. जैसे इन वंचित तबकों के लिए विशेष अदालतों का गठन, अपने कर्तव्यों में लापरवाही के लिए अधिकारियों को दंड, उत्पीड़कों की चल-अचल संपत्ति की कुर्की, इलाके की दबंग जातियों के हथियारों को जब्त करना, उत्पीड़ितों में हथियारों के वितरण और इलाका विशेष को अत्याचारप्रवण घोषित कर वहां विशेष इंतजाम करने तक कई सारे अहम प्रावधान शामिल किये गये थे. इनमें से ज्यादातर प्रावधान इतने सख्त हैं कि एक बार इसके तहत गिरफ्तारी होने पर जल्द जमानत भी नहीं हो पाती. यह अलग बात है कि इन प्रावधानों एवं इनके अमल में जबरदस्त अंतर दिखता है. इस संदर्भ में सामाजिक न्याय मंत्रालय की तरफ़ से ‘प्रोटेक्शन आफ़ सिविल राइट्स एक्ट’ (1955) के अमल को लेकर बेंगलुरू स्थित नेशनल लॉ स्कूल द्वारा किये गये अध्ययन के नतीजे ध्यान देनेलायक हैं. वे बताते हैं कि किस तरह आज भी अस्पृश्यता का अस्तित्व ग्रामीण इलाकों में बना हुआ है, भले ही कानून के डर एवं दलितों में बढ़ी आत्मसम्मान की भावना के चलते उसका भौंडा प्रस्फ़ुटन होता नहीं दिखता. आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल पर मुख्यत केंद्रित यह अध्ययन इस बात को उजागर करता है कि अस्पृश्यता बदस्तूर जारी है. अगर हम वर्ष 2004-2005 की अनुसूचित जाति आयोग की वर्गीकृत रिपोर्ट को पलटें - जिसके अंश कुछ राष्ट्रीय अखबारों में भी प्रकाशित हुए हैं - तो यह स्पष्ट होता है कि अस्पृश्यता महज ग्रामीण इलाकों तक ही नहीं शहरी इलाकों में भी विभिन्न रूपों में आज भी मौजूद है. आंकड़े बताते हैं कि अनुसूचित जाति परिवारों में महज 30 फ़ीसदी के घरों में बिजली का कनेक्शन है तो महज 9 फ़ीसदी घरों में सेनिटेशन की उचित व्यवस्था है. आधे से ज्यादा दलित परिवारों के बच्चे आठवीं कक्षा के पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं. अनुसूचित जाति छात्रावासों में रहनेवाले तमाम बच्चे आज भी नहीं जानते कि दूध का स्वाद कैसा होता है, क्योंकि उनके लिए तयशुदा राशन बीच में ही गायब कर दिया जाता है. अनुसूचित जाति की 40 फ़ीसदी आबादी खेत मजदूरी में लिप्त है तथा उनके पास एक धुर जमीन भी नहीं है. दलित पैंथर आंदोलन से संबद्ध रहे गुजरात के वालजीभाई पटेल द्वारा ‘अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम’ के वास्तविक अमल का अध्ययन एक अच्छे कानून को निष्प्रभावी कर देने की परिघटना पर विस्तृत रोशनी डालता है. वालजीभाई ने गुजरात के 16 जिलों में 1 अप्रैल, 1995 के बाद कानून के तहत सामने आये 400 मुकदमों का विस्तृत अध्ययन किया. अध्ययन यह उजागर करता है कि किस तरह कानून के जबरदस्त प्रावधानों के बावजूद निम्न एवं उच्च स्तर पर पुलिस की जांच लापरवाही भरी होती है. उनका यह भी कहना है कि दलित - आदिवसियो पर अत्याचार के मामलों में आम तौर पर सरकारी वकील की काफ़ी प्रतिकूल भूमिका होती है, जिसकी वजह से केस खारिज हो जाता है. उनका अध्ययन इस मिथक का भी पर्दाफ़ाश करता है कि कानून की अकर्मण्यता इसके तहत दर्ज की जानेवाली झूठी शिकायतों के कारण या दोनों पक्षों के बीच होनेवाले समझौते के कारण दिखती है. अध्ययन में यह भी पाया गया कि कई बार मामूली कारणों से मुकदमा खारिज होता है. मसलन कानून के तहत यह अनिवार्य है कि जांच का काम उप पुलिस अधीक्षक या उसके वरीय अधिकारी करे, जिसे पुलिस महानिरीक्षक को सीधे रिपोर्ट भेजनी होती है. 95 फ़ीसदी मामलों में देखा गया कि मामला इसी वजह से खारिज हुआ और अभियुक्तों को इसलिए बरी किया गया, क्योंकि जांच उपाधीक्षक के नीचे के अधिकारी ने की थी. कई मामलों में पीड़ितों का जाति प्रमाणपत्र जांच अधिकारी द्वारा साथ में संलग्न न करने के कारण मामला खारिज हुए हैं.

-सुभाष गाताडे