शिक्षण संस्थानों को आजादी दें

इस वर्ष फरवरी में मुझे राष्ट्रपति भवन में आयोजित कुलपतियों के सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। इस बहस का उद्‌देश्य भी अच्छा था और इसे बहुत ही अच्छी तरह संचालित किया गया था। देश के शीर्ष केंद्रीय विश्वविद्यालयों के करीब सौ कुलपति सम्मेलन में मौजूद थे। इन्हें कई उप-समूहों में बांटकर देश में शिक्षा क्षेत्र के सामने उपस्थित ज्वलंत विषयों पर विचार-विमर्श किया गया। हालांकि, सम्मेलन का स्वरूप थोड़ा औपचारिक था, लेकिन जिन विचारों पर चर्चा हुई वे सारे ज्वलंत व प्रासंगिक थे।
 
उद्योगों, शोध और शिक्षा संस्थानों को आपस में जोड़ने की जरूरत, टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल, इनोवेशन को बढ़ावा, उद्यमशीलता पर पड़ रहा दबाव, शैक्षणिक श्रेष्ठता के लिए पूर्व छात्रों का दोहन, अंतर विश्वविद्यालयीन सहयोग, नेटवर्क कनेक्टिविटी- इन सारे प्रासंगिक व शानदार मुद्‌दों पर विचार हुआ। इसलिए यह धारणा सही नहीं है कि हमारे शिक्षा संस्थानों के प्रमुख समय के साथ नहीं चल पाते या यह नहीं जानते कि दुनिया में क्या चल रहा है। हालांकि कुछ ही लोग इससे असहमत होंगे कि हमारे यहां शिक्षा में अभी बहुत कुछ किया जाना है।
 
सवाल उठता है कि यदि सम्मेलन में जिन मुद्‌दों पर विचार-विमर्श हुआ उन पर जब सब सहमत हैं तो वैसा होता क्यों नहीं? मसलन, उद्योग जगत व यूनिवर्सिटी के बीच ज्यादा आदान-प्रदान क्यों नहीं होता? या फिर हमारे यहां नई जमीन तोड़ने वाली रिसर्च क्यों नहीं होती? देश में और अधिक ए-ग्रेड संस्थान क्यों नहीं हैं? साठ और सत्तर के दशक में बनाए गए आईआईटी, आईआईएम, एम्स, दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुछ कॉलेज व देश के कुछ अन्य एजुकेशन ब्रैंड ही प्रतिष्ठित संस्थान क्यों हैं? हमने अस्सी, नब्बे और नई सदी में आईआईटी-आईआईएम जैसे नए ब्रैंड शिक्षा जगत में क्यों नहीं खड़े किए? इसका जवाब स्वायत्तता के सवाल में मौजूद है, जिससे देश का हर सरकारी संस्थान प्रभावित है।
 
उस सम्मेलन में शिक्षा जगत के प्रमुखों ने चाहे कितनी ही अच्छी तरह और कितनी ही मुखरता से विचार रखे हों, लेकिन वे अपने विचारों का 10 फीसदी भी अपने संस्थानों में लागू नहीं कर पाएंगे, क्योंकि उनके हाथ बंधे हुए हैं। सरकार यूनिवर्सिटी को पैसा देती है, इसलिए उस पर नियंत्रण रखती है। यह नियंत्रण इस संतुलित रूप में नहीं है कि यूनिवर्सिटी फल-फूल सकें।
 
आईआईटी और आईआईएम में नियंत्रण व स्वायत्तता का संतुलन दूसरों से बेहतर रहा है, इसलिए वे स्थिति के अनुसार खुद को ढाल सके, शीर्ष प्रतिभाओं को आकर्षित कर सके और लंबे समय तक श्रेष्ठता का ऊंचा मानदंड बनाए रख सके। अचरज नहीं कि उनकी ब्रैंड वैल्यू दूसरों से ज्यादा है। बेशक, आईआईएम भी बच नहीं सके हैं। बताते हैं कि नया आईआईएम बिल, 2015 आईआईएम को वैधानिक संस्थान बनाने के हिसाब से तैयार किया गया है ताकि वे डिप्लोमा की जगह डिग्री (यह सिर्फ एक तकनीकी मामला है) जारी कर सकें, लेकिन इससे उस स्वायत्तता का संतुलन गड़बड़ा जाएगा, जिसकी वजह से ये संस्थान फले-फूले हैं।
 
सरकार को श्रेय देना होगा कि उसने यह बिल सार्वजनिक चर्चा के लिए (माय जीओवी डॉट इन एक अच्छा इनोवेटिव मंच है) रखा है। हालांकि, विधेयक का मूल मसौदा इस तरह से बनाया गया है कि संचालन संबंधी लगभग हर प्रक्रिया के लिए सरकार की मंजूरी आवश्यक होगी- फिर चाहे भर्ती व नामांकन हो या कम्पनसेशन अथवा रिसर्च। कहने की जरूरत नहीं कि इससे तो आईआईएम की स्वायत्तता नाटकीय रूप से घट जाएगी और संतुलन सरकारी नियंत्रण की ओर झुक जाएगा। जाहिर है कि इसके बाद आईआईएम हमेशा के लिए बदल जाएंगे।
 
कृपया पूर्ण स्वायत्तता और स्वायत्तता संतुलन के बीच के महत्वपूर्ण अंतर को ध्यान में रखिए। ऐसा हो ही नहीं सकता कि सरकार से पैसे लेने वाले किसी संस्थान पर सरकार का कोई नियंत्रण ही न हो। समस्या तो तब आती है जब सरकार इस अधिकार का उपयोग रोजमर्रा के संचालन संबंधी मामलों में दखल देने में करती है।
 
दिन-प्रतिदिन के मामलों में सरकारी दखल से क्या होता है, यह देखना हो तो एयर इंडिया और आईटीडीसी होटलों को देख लीजिए। दुनिया की श्रेष्ठतम एयरलाइन अौर होटलों की रैंकिंग से इनकी तुलना करके देखें तो हकीकत पता चल जाएगी। जब आप विश्वस्तरीय संस्थानों से स्पर्द्धा कर रहे हों तो सरकारी दखल विनाशकारी हो सकता है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि महान शिक्षा संस्थान, वहां मौजूद लोगों की वजह से महान होते हैं यानी शिक्षक व छात्र। वरना कॉलेज तो सिर्फ इमारत व फर्नीचर ही होता है। सर्वश्रेष्ठ बनने के लिए आपको एक महत्वपूर्ण तत्व की जरूरत होती है, जिसकी भारत में प्राय: उपेक्षा कर दी जाती है- टॉप टैलेंट, शीर्ष प्रतिभाएं। परिभाषा के मुताबिक समाज में दुर्लभ मानी जाने वाली प्रतिभाओं में ही नई चीजें लाने, उन्हें जमीन पर लागू करके दिखाने और क्षेत्र विशेष को पूरी तरह बदल देने की शक्ति होती है। दुर्लभ होने के बावजूद शीर्ष प्रतिभाएं किसी भी क्षेत्र से आकर देश को रूपांतरित कर सकती हैं।
 
दुख की बात यह है कि न तो हम इस तथ्य को मान्यता देते हैं और न हम जानते हैं कि इस स्थिति से कैसे निपटा जाए। यदि आपको किसी आईआईएम को चलाने के लिए शीर्ष प्रतिभा चाहिए, लेकिन उसके पीछे बाबू बैठे हों, जिनके पीछे नेताओं की खुशामद करने वाले लोग हों तो कोई भी शीर्ष प्रतिभा का व्यक्ति उस जगह पर आना ही क्यों चाहेगा? वेतन पहले ही कम है (सरकारी संस्थाओं के स्तर पर) और अब हम चाहते हैं कि वे उन नेताओं के झक्की किस्म के आदेश भी सुनें, जो संस्थान की वर्ल्ड रैंकिंग की परवाह करने की बजाय अपने मतदाताओं को खुश करने में ज्यादा रुचि रखते हैं। राजनीति अपनी परिभाषा से ही सर्वसमावेशी है जबकि श्रेष्ठता के लिए थोड़ी विशिष्टता की जरूरत होती है।
 
यदि नेता श्रेष्ठ संस्थान को रोजमर्रा के स्तर पर चलाएंगे तो लगातार संघर्ष होगा, जिससे संस्थान को नुकसान ही होगा। फिर हम ऐसा करें ही क्यों? कुछ अच्छा है तो उसके साथ छेड़-छाड़ क्यों करें? इसकी बजाय अन्य संस्थानों को और खुलापन क्यों नहीं दिया जा सकता? उन महान विचारों वाले कुलपतियों के बंधे हाथ खोल दीजिए। उन्हें इतनी आजादी दें कि वे अपने यूनिवर्सिटी ब्रैंड निर्मित कर सकें। उन पर निगरानी रखें, संतुलित अंकुश रखें, लेकिन संस्थान को चलाइए मत।
आईआईएम भी खामियों से मुक्त नहीं हैं। उन पर निगरानी रखी जा सकती है, रखी जानी चाहिए और उनमें सुधार लाना चाहिए। किंतु उस स्वायत्तता संतुलन को खत्म करना विपरीत परिणाम दे सकता है, जो अब तक बहुत अच्छे नतीजे देता रहा है। इसे खत्म करने की बजाय हमें तो आईआईएम मॉडल को देश भर की यूनिवर्सिटी में लागू कर आईआईएम जैसे और ब्रैंड निर्मित करने चाहिए। यह तो शर्म की बात होगी कि हम ऐसे संस्थानों को मैनेज नहीं कर पाए जो मैनेजमेंट ही पढ़ाते हैं।
 
- चेतन भगत 
साभारः दैनिक भास्कर
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