मंजूरी की मजबूरी

यह जितना उत्साहजनक है कि अब सीबीआइ को भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे नौकरशाहों के खिलाफ जांच आगे बढ़ाने के लिए सरकारी मंजूरी का इंतजार नहीं करना पड़ेगा वहीं यह उतना ही निराशाजनक कि इसे उचित ठहराने के लिए सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ को आगे आना पड़ा।

इसकी जरूरत इसलिए पड़ी, क्योंकि सरकार ने यह प्रावधान बना रखा था कि वरिष्ठ नौकरशाहों के खिलाफ जांच के लिए उसकी मंजूरी आवश्यक है। इस प्रावधान के चलते कई बार सीबीआइ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में घिरे अफसरों के खिलाफ भी जांच कर पाने में खुद को अक्षम पाती थी। कई बार तो उसे वर्षो बाद ऐसे अफसरों के खिलाफ प्रारंभिक जांच करने की अनुमति मिल पाती थी। सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह यह पाया कि दिल्ली पुलिस संबंधी कानून की धारा 6-ए अवैध और संविधान के अनुच्छेद 14 का हनन करने वाली है उससे यही पता चलता है कि भ्रष्ट तत्वों का बचाव करने वाले कानूनी प्रावधान न केवल अस्तित्व में थे, बल्कि उनकी तरफदारी भी की जा रही थी।

इसी धारा के चलते संयुक्त सचिव अथवा इससे ऊपर के पदों पर आसीन अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत जांच से पहले सरकार की मंजूरी लेना आवश्यक थी। इस कानूनी धारा के पीछे सरकार का तर्क था कि कई बार अधिकारियों के खिलाफ थोथी शिकायतें होती हैं और उनके चलते वे अनावश्यक रूप से परेशान होते हैं। इस तर्क को निराधार नहीं कहा जा सकता, लेकिन आखिर थोथी शिकायतों से केवल वरिष्ठ अधिकारी ही क्यों महफूज रहें? क्या ऐसे प्रावधान समानता के अधिकार की खिल्ली नहीं उड़ाते? वरिष्ठ नौकरशाहों के खिलाफ जांच में आड़े आ रहे गैरकानूनी प्रावधान को तय करने में जिस तरह डेढ़ दशक से भी ज्यादा लंबा समय लगा वह कोई शुभ संकेत नहीं। इस संदर्भ में समय रहते फैसला आ गया होता तो भ्रष्टाचार से लड़ने में कहीं अधिक सहायता मिली हुई होती।

यह विचित्र है कि सरकारी तंत्र को यह साधारण सी बात समझ नहीं आई कि भ्रष्ट तत्वों का वर्गीकरण नहीं किया जा सकता और उनके साथ एक जैसा व्यवहार किया जाना चाहिए। अब सीबीआइ को न केवल भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे अफसरों से बिना सरकारी मंजूरी पूछताछ करने, बल्कि उनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल करने का भी अधिकार होगा। सीबीआइ के इस अधिकार से लैस होने के बाद यह उम्मीद की जाती है कि भ्रष्ट नौकरशाहों के खिलाफ कार्रवाई में तेजी आएगी। इसी के साथ यह भी अपेक्षित है कि सीबीआइ इस तरह से काम करेगी जिससे नीति-निर्धारण की प्रक्रिया में शामिल नौकरशाहों को अनावश्यक परेशानी का सामना न करना पड़े, क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो इससे यह प्रक्रिया ही शिथिल पड़ सकती है और इससे सारे देश को नुकसान उठाना पड़ सकता है। दरअसल नीति-निर्धारण की प्रक्रिया में खामी और भ्रष्टाचार के बीच जो बारीक रेखा है उसे सही ढंग से देखने और समझने की जरूरत है।

यह अच्छी बात है कि सीबीआइ प्रमुख ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए यह भरोसा भी दिलाया है कि वरिष्ठ अधिकारियों को बेवजह परेशान करने के इरादे से की गई शिकायत पर कार्रवाई से पहले सावधानी बरतने की प्रणाली बनाई जाएगी। इस प्रणाली को शीघ्र ही अस्तित्व में लाने की आवश्यकता है। जितना जरूरी यह है कि भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो उतना ही यह भी कि ईमानदार लोगों को संरक्षण मिले जिससे वे बिना किसी भय के फैसले ले सकें।

 

 

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