ऑटो रिक्शा चालक क्या मांगे, आजादी!

लगभग 3 करोड़ की आबादी वाली दिल्ली, दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले शहरों में से एक है। 1950 में दिल्ली की आबादी 10 लाख थी जो 2019 तक बढ़कर 2.96 करोड़ हो गई। अनुमान है कि वर्ष 2035 तक दिल्ली की जनसंख्या 4.3 करोड़ हो जाएगी। लेकिन नीति निर्धारकों की अदूरदर्शिता के कारण जिस तेजी से शहर की जनसंख्या में वृद्धि हुई उस तेजी से यहां के इंफ्रास्ट्रक्चर (भौतिक संरचना) में बदलाव नहीं हो सका। इस कारण अनके चुनौतियां पैदा हो गईं जैसे कि आवास, परिवहन, प्रदूषण, रोजगार, शिक्षा आदि आदि।
यदि हम दुनिया के अन्य अधिक जनसंख्या वाले बेहतर प्रबंधन युक्त शहरों की संरचना देखें तो हम पाएंगे कि वहां व्यापारिक क्षेत्र और रिहाइशी क्षेत्रों को जरूरतों के हिसाब से विकसित किया गया है। बेहतरीन सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था और सड़कों के निर्माण पर जोर दिया गया ताकि लोग घर से दफ्तर और कारखानों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों तक आराम से आवागमन कर सकें। इसके विपरीत दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया गया। परिणाम स्वरूप निजी वाहनों की संख्या बढ़ती गई। सड़कों पर वाहनों के दबाव के कारण यात्रा के समय और प्रदूषण में जबरदस्त वृद्धि हुई। आवागमन की समस्या से बचने के लिए लोग अपने कार्यस्थल के आसपास ही रहने को प्राथमिकता देने लगें। परिणाम यह हुआ कि शहर में जनसंख्या का घनत्व अप्रत्याशित रूप से बढ़ने लगा और आवास, शैक्षणिक संस्थानों और अस्पतालों आदि की जबरदस्त कमी पड़ने लगी।

यदि समस्याओं के मूल में देखा जाए तो लचर परिवहन व्यवस्था इसके केंद्र में रही है। उदाहरण के लिए यदि दिल्ली में टुकटुक यानी ऑटो रिक्शॉ की संख्या को ही देख लिया जाए तो पता चलता है कि वर्ष 1997 में दिल्ली में परमिट वाले ऑटो रिक्शॉ की संख्या 82,138 थी। सरकार ने ऑटो रिक्शॉ से होने वाले प्रदूषण को ध्यान में रखते हुए इस संख्या के आगे परमिट जारी करना बंद कर दिया। जबकि इस समय शहर की जनसंख्या 1,34,51000 थी। जनसंख्या जहां तेजी से बढ़ती गई वहीं ऑटो रिक्शॉ की संख्या स्थिर रही क्योंकि सरकार ने नए परमिट जारी नहीं किये। वर्ष 2002 में सरकार ने 5 हजार नए परमिट जारी किये जिससे कुल ऑटो रिक्शॉ की संख्या बढ़कर 87,138 हो गई जबकि इस दरम्यान जनसंख्या 1,69,56000 हो चुकी थी।

वर्तमान में दिल्ली की जनसंख्या बढ़कर 2,93,99000 हो चुकी है जबकि ऑटो रिक्शॉ की संख्या मात्र 95,000 है जबकि परमिट संख्या जारी किए जाने की उच्चतम सीमा 1 लाख है। वह भी तक जबकि वर्षों से दिल्ली में ऑटो रिक्शा पेट्रोल/डीजल की बजाए सीएनजी (कंप्रेस्ड नेचुरल गैस) से चल रहे हैं। परमिट की अनुपलब्धता के कारण एक ऑटो रिक्शॉ की शो रूम कीमत जहां 1.75 लाख रूपए के लगभग है वहीं बिचौलियों और दलालों के कारण सड़क पर उतरते समय इसकी कीमत 4.5 लाख से 5 लाख हो जाती है। ऑटो चालकों के द्वारा मीटर से न चलने और मनमाना किराया वसूलने के पीछे बड़ा कारण यह भी है।

ऑटो रिक्शॉ की संख्या को अव्यवहारिक रूप से कम रखने का दुष्परिणाम यह हुआ कि दिल्ली के आस पास के शहरों से काम करने के लिए आने वाली लाखों की भीड़ यहीं रहने को प्राथमिकता देने लगी। साथ ही दैनिक आवागमन के लिए कार व बाइक का इस्तेमाल करने लगी। इससे ट्रैफिक जाम, वायु प्रदूषण की समस्या तो पैदा हुई ही आवास, शैक्षणिक संस्थानों और अस्पतालों की जबरदस्त मांग बढ़ी। सरकार मांग के हिसाब से नए स्कूल, आवास व अस्पतालों की व्यवस्था तो नहीं कर सकी, निजी क्षेत्र पर भी अनेक प्रतिबंध लगाकर इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास को पंगु कर दिया।

ऑटो रिक्शॉ की संख्या पर से रोक हटाने की मांग को लेकर कुछ वर्ष पूर्व दाखिल एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ईपीसीए (एन्वायर्मेंट पॉल्युशन कंट्रोल अथॉरिटी) से इस बाबत राय मांगी। ईपीसीए ने कुछ शर्तों के साथ ऑटो की संख्या की उच्चतम सीमा को समाप्त करने के प्रति सहमति दे दी। लेकिन अबतक परमिट संख्या की उच्चतम सीमा को समाप्त नहीं किया जा सका है।

सुधार के सुझावः

परमिट प्रणाली खत्म कीजिए

परमिट प्रणाली बेकार है तथा ऑटो की संख्या पर पाबंदी लगाने वाली कोई भी सीमा हटा ली जानी चाहिए। धंधे में नये चालकों के प्रवेश अथवा पुराने चालकों के धंधा छोड़ने पर कोई नियंत्रण नहीं लगाया जाना चाहिए। परिवहन विभाग को सिर्फ वाहन पंजीकरण की भूमिका तक खुद को सीमित कर लेनी चाहिए। आप कहेंगे कि इससे सड़क पर ऑटो की बाढ़ आ जाएगी। सड़क जाम व प्रदूषण की समस्या भयावह हो जाएगी। पर ऐसा नहीं है। नियंत्रण हटा लेने पर भी सड़क पर उतने ही ऑटो रहेंगे, जितने की जरूरत है। और यह ऑटो की कुल वर्तमान संख्या से अधिक अथवा कम नहीं होगी। उल्टे यह धंधा संवेदनशील हो जाएगा तथा बाजार की जरूरतों के अनुसार अपना आकार घटाने अथवा बढ़ाने में सक्षम हो जाएगा। साथ ही अवैधानिकता तथा उससे जुड़ी शोषण की समस्या भी स्वतः समाप्त हो जाएगी। ऑटो के मालिकों को ऑटो कहीं भी बेचने की पूरी छूट दी जानी चाहिए, ताकि उन्हें समयानुकूल वाजिब कीमत हासिल हो सके।

सड़क जाम की समस्या से मुक्ति पाने के लिए ऑटो पर सड़क शुल्क लगाया जाना चाहिए - 'सड़क पर चलना है, तो कीमत अदा कीजिए'

ब्राण्ड को उभरने दीजिए

भाड़े पर ऑटो चलाने वाली कंपनियों तथा उनके ब्राण्ड को उभरने दिया जाय। इससे विभिन्न ऑटो समूहों के बीच प्रतियोगिता पैदा होगी तथा वे ब्राण्ड की पहचान व यात्रियों के बीच अपनी साख जमाने के प्रति अग्रसर होंगे। इससे वे ऑटो को सुंदर व ठीक-ठाक हालत में रखेंगे। सड़क नियमों का स्वयं पालन करने को प्रेरित होंगे। ऑटो चालकों द्वारा नियमों का उल्लंघन करने पर ऑटो कंपनी को जिम्मेदार माना जाएगा। फलतः वे स्वयं कुशल चालक रखने व नियम पालन के प्रति सावधान रहेंगे।

- अविनाश चंद्र

फोटो साभारः https://bit.ly/2TiqtL5