हवाई अड्डे का जनप्रतिकूल प्रबंधन: कब होगा यहाँ आर्थिक सुधार?

    उदारीकरण और निजीकरण का नुस्खा हवाई यात्रा क्षेत्र में थोड़ा सुधार लाने में तो जरूर सफल हुआ है, पर हवाई अड्डा के विकास के दौर में पीछे छूट जाने के कारण न सिर्फ यात्रियों को घोर असुविधाओं का सामना करना पड़ता है, बल्कि यह नागरिक उड्डयन क्षेत्र को भी तेजी से विकास करने से रोक रहा है। देश में हवाई अड्डे का प्रबंधन कितना खराब चल रहा है, उसे राजीव की बातें सुन कर अच्छी तरह समझा जा सकता है। पेश है यहाँ उनका अनुभव उन्हीं की जुबानी।
    ''चेन्नई में इतना बड़ा एयरपोर्ट है, पर फ्लाइट के बारे में बताने वाला कोई नहीं है। वहाँ करीब दस कंपनियों के हवाई जहाज उतरते होंगे, पर कोई ऐसा केंद्र नहीं, जहाँ एक ही जगह यह पता चल जाए कि कौन-कौन सी कंपनी के हवाई जहाज कहाँ-कहाँ जाते हैं। पहले कोलकाता होकर आने की सोचा तो, एक-एक करके सभी कंपनियों के केंद्रों पर जाकर पूछना पड़ा कि आपका हवाई जहाज कोलकाता जाता है या नहीं। फिर पता चला कि गुवाहाटी होकर भी जा सकते हैं। तो फिर अलग-अलग कर सभी कंपनियों के केंद्रों पर जाकर पूछना पड़ा कि उनके हवाई जहाज गुवाहाटी जाते हैं कि नहीं। अब बार-बार जाकर पूछने में संकोच भी होता है कि वे क्या सोचेंगे। एक कंपनी वाले दूसरी कंपनी के हवाई जहाज के बारे में न तो जानते हैं। न ही बताना चाहते हैं। यही सब पता करने में 4 घंटे लग गए। सोचने की बात यह है कि सूचना तंत्र पर ही पूरा हवाई जहाज का तंत्र चलता है, पर पब्लिक को सूचना देने के लिए कोई सम्यक व्यवस्था नहीं। कोई हेल्प की व्यवस्था नहीं।''
    राजीव आगे कहते हैं, ''हवाई यातायात प्रणाली में कोई लचीलापन भी नहीं है, बागडोगरा एयरपोर्ट तो सैनिक एयरपोर्ट है, इसलिए वहाँ हड़ताल जैसी समस्या नहीं होती। पर दूसरे एयरपोर्ट पर कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है। उस दिन (शायद 14 या 15 दिसंबर) कोलकाता एयरपोर्ट पर हड़ताल थी, तो दुनिया के किसी भी कोने से वहाँ कोई जहाज उतर नहीं सकता था। ऐसे विपरीत समय के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था तो होनी ही चाहिए थी।
    दिल्ली से दूसरे दिन बागडोगरा के लिए जो विमान था, उसमें एक जगह पाने के लिए भी खासी मशक्कत करनी पड़ी, पर बाद में पता चला कि विमान में 7-8 जगह खाली थी। पर एक जगह पाने के लिए कितनी मिन्नतें करनी पड़ीं, कितने ही पैरवी जुगाड़ लगाने पड़े। सुबह पटना वाली फ्लाइट की टिकट ले रखी थी। पर जब बागडोगरा वाले विमान में जगह मिल गई। तो पटना वाले विमान का टिकट कैंसल कराने में भी काफी मुश्किलें आईं। पहले तो एक अधिकारी ने कहा कि आपको विशेष सुविधा के तहत टिकट दिए गए हैं। इसलिए कैंसल कराने के बाद पैसे वापस नहीं होंगे। पर दूसरे अधिकारी से मिलने पर पैसे वापस होना संभव हो पाया।'' राजीव को हवाई अड्डे पर हुआ यह कटु अनुभव किसी छोटे कस्बाई शहर में सरकारी काम कराने जैसा ही तो था, जहाँ पैरवी, पहुँच और जुगाड़ से ही कोई काम बन पाता है।
    अभी ठंड के मौसम में कोहरे के कारण हवाई जहाज के यात्रा समय में होने तब्दीली के कारण यात्रियों को होने वाली परेशानी भी कुछ ऐसी ही थी। यात्रियों को कहीं कुछ भी स्पष्ट सूचना नहीं मिल पा रही थी। जिसके कारण यात्रियों को गंभीर परेशानी का सामना करना पड़ा। और यह सब पहली बार नहीं हुआ, बल्कि यह अफरा-तफरी हर साल होती रही है। एक तो कड़ाके की ठंड ऊपर से एयरपोर्ट पर नाकाफी इंतजाम। लोगों का कहना है कि हर बार एयरपोर्ट अधिकारी व्यवस्था दुरूस्त करने का दावा करते हैं मगर फिर हालत वैसी ही देखने को मिलती है। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें समय से विमानों के बारे में जानकारी भी नहीं मिल पा रही है। ज्ञात हो कि कोहरे में उड़ान भरने में यदि हवाई कंपनी सक्षम भी हो जाएँ, तो वे इसलिए ऐसा नहीं कर सकते कि एयरपोर्ट पर तकनीकी सुविधाएँ वैसी नहीं हैं।
    यहाँ यह सोचना काफी काफी प्रासंगिक है कि विकल्प और प्रतियोगिता की वजह से जो विकास हवाई उड़ानों में आया, वही विकास एयरपोर्ट प्रबंधन में भी देखने को क्यों नहीं मिल रहा? क्या इसका एक कारण यह नहीं कि हर शहर में आम तौर पर एक ही एयरपोर्ट होने के कारण उसकी मोनोपॉली स्थापित हो गई है? एयरपोर्ट प्रबंधकों को इस बात का कोई डर नहीं कि गलत प्रबंधन हवाई कंपनियों और नागरिकों को दूसरे एयरपोर्ट के इस्तेमाल के लिए प्रेरित करेगा। और प्रकारांतर से यह मोनोपॉली क्या शायद इसलिए नहीं कि अपने देश में उतनी आजादी नहीं कि कोई उद्यमी एक अन्य एयरपोर्ट स्थापित करने का साहस कर सके। इस प्रसंग में केरल की वामपंथी सरकार की पीठ थपथपानी ही होगी, जहाँ देश में सबसे पहले निजी हवाई अड्डा स्थापित हुआ। ज्ञात हो कि कोच्चि एयरपोर्ट देश का पहला निजी हवाई अड्डा है। इसमें 50 प्रतिशत धन गैर-आवासी भारतीयों का है। क्या एक वामपंथी सरकार का यह कदम अन्य वामपंथियों या अपेक्षाकृत कम वामपंथियों के लिए अनुकरणीय नहीं? यहाँ प्रसंगवश यह भी समझ लेना चाहिए कि भारत के सभी राजनीतिक दल समाजवादी हैं। प्रतिष्ठित लेखक और पत्रकार सौविक चक्रवर्ती की पुस्तक 'फ्री योर माइंड' के अनुसार अपने देश में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम सिर्फ समाजवादी पार्टियों को ही चुनाव लड़ने की इजाजत देता है। (पृष्ठ X)। भारत का कानून समाजवादी विचारधारा से इतर अन्य विचारों पर आधारित राजनीतिक पार्टी के गठन पर ही रोक लगाता है। इसलिए भारत में मुक्त बाजार के लिए आवाज उठाने वाली कोई पार्टी नहीं। हम चुनने के लिए तो स्वतंत्र हैं, पर यह स्वतंत्रता सिर्फ समाजवादी विकल्पों के बीच से ही चुनाव तक सीमित है। भारत में कभी मीनू मसानी जैसे उदारवादियों के नेतृत्तव में स्वतंत्र पार्टी चल रही थी। पर तत्कालीन भारत की प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने इसे नष्ट कर दिया। उन्होंने संविधान संशोधन कर यह सुनिश्चित कर दिया कि आगे मुक्त बाजार की बात करने वाली किसी भी पार्टी का वैधानिक अस्तित्व न रहे। (पृष्ठ 75)। इस व्यवस्था से एक खास किस्म के विचारों की मोनोपॉली स्थापित हो गई है। और मोनोपॉली चाहे कोई भी हो, वह हमेशा जनता के लिए समस्या खड़ी करती है। व्यवस्था ही नहीं विचारों में भी खुली बहस एवं प्रतियोगिता होनी चाहिए। तभी उसका जन हितकारी रूप बरकरार रहता है। खैर, एयरपोर्ट।
    यद्यपि उदारीकरण से विमान सेवा की स्थिति में काफी सुधार आया है, लेकिन एयरपोर्ट पर भी सुधारवादी कदम उठाने की जरूरत है। सिस्टम को लचीला बनाया जाना है। सिस्टम में विकल्प खड़े किए जाने की जरूरत है। ताकि विभिन्न विमान परिचालक और विभिन्न एयरपोर्ट प्रबंधन आपस में प्रतियोगिता करें और परिणामस्वरूप पब्लिक को सुविधा हो। आज इस सेवा का पहले से उपयोग करता आया कोई आदमी ही आसानी से इसका लाभ उठा सकता है। पर यहाँ नये यात्रियों के लिए दौड़ काफी कठिन है। इस स्थिति में बदलाव आना ही चाहिए। पर सोचने वाली बात यह है कि यह बदलाव कुछ और अधिक कठोर कानून बनाने से होगा या हर स्तर पर निजीकरण, प्रतियोगिता, विकल्प और रेगुलेशन मुक्त माहौल को बढ़ावा देकर हो पाएगा। इस संबंध में नीति निर्माताओं को ही नहीं बल्कि आम जनता को भी सोच विचारकर एक स्पष्ट राय बनानी होगी।

(2 जनवरी 2007)
संजय कुमार साह

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