समाजिक बदलाव के लिए अरुणा राय का समाधान

भारत को ऐसे थिंक टैंकों की जरूरत है, जो असरकारी, कम खर्चीले और टिकाऊ नीतिगत समाधानों की खोज कर सके. -पार्थ जे शाह

जन कल्याण परियोजनाओं के मस्टर रोल के साथ काफी छेड़-छाड़ होता रहा है। कई बार अधिकतर ऐसे लोग जिनका मस्टर रोल में नाम होता है, वे वास्तव में काम पर मौजूद नहीं होते हैं और वास्तव में काम करने वाले कई लोगों का नाम मस्टर रोल में नहीं होता है। राजस्थान में अरुणा राय और उनके संगठन एमकेएसएस (मजदूर किसान शक्ति संगठन) ने इस मुद्दे पर काम करना शुरू किया। उनके कार्यकर्ता विभिन्न कार्यों के सरकारी मस्टर रोल की कॉपी लेते, कार्यस्थलों पर जाते, उसका मिलान करते और सूची में हुए किसी भी घपले को उजागर करते। शुरू में उन्होंने इसके लिए काफी संघर्ष किया। जब उन्हें कुछ सफलताएं मिलने लगीं, तो वे दूसरे अनेक कार्यस्थलों पर भी जाने लगे।

गौरतलब है कि मस्टर रोल के साथ यह छेड़-छाड़ देश भर में होता रहा है। किसी भी नए संगठन की तरह अरुणा राय को भी स्केल अप की समस्या का सामना पड़ा। स्केल अप से तात्पर्य है अपनी गतिविधियों को फैलाना। चाहे व्यवसायिक कंपनी हो या सामाजिक बदलाव के लिए काम कर रहा कोई नॉन प्रोफिट संगठन 'स्केल अप' दोनों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है।

स्केल अप के लिए एककेएसएस कोई भी स्थापित तरीका अपना सकती थी:

  • एमकेएसएस का विस्तार करना: देशभर में एमकेएसएस की शाखाएं खोलना, हजारों कार्यकर्ताओं को बहाल करना, अपने इस महान कार्य को आर्थिक सहयोग देने के लिए सरकार और कारोबारियों से अनुरोध करना। इस तरह एमकेएसएस का कारोबार करोड़ों रुपए का हो जाता और वह एक राष्ट्रीय एनजीओ हो जाती।
  • विकेंद्रित नेटवर्क: दूसरे संगठनों को भी इस मुद्दे पर काम करने के लिए प्रेरित करना और इस तरह देश भर में अपने सहयोगी संगठनों का एक मजबूत ढांचा खड़ा करना।

दूसरी तरफ मेधा पाटकर भी हैं, जो विभिन्न परियोजनाओं से प्रभावित होने वाले लोगों के अधिकारों के लिए काम कर रही हैं (नर्मदा बचाओ आंदोलन)। बड़े बांधों, राजमार्गों, फैक्टरियों, सेज, जैसी अनेक विकास परियोजनाओं से विस्थापित होने वाले लोगों को दूसरे स्थानों पर बसाना और उनके लिए समुचित हरजाने की मांग करना, और इससे संबंधित अन्य गतिविधियां। पिछले 20 सालों से अधिक समय से वह नर्मदा बांध परियोजना से विस्थापित हुए लोगों के अधिकारों के लिए लड़ रही है। हाल में उन्होंने उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखंड में भूख हड़ताल कीं। लेकिन सवाल यह है कि इस तरह वह एक नियत समय में कितने स्थानों पर मौजूद हो सकती हैं? तो वह नर्मदा बचाओ आंदोलन की गतिविधियों को कैसे बढ़ा (स्केल अप) सकती हैं?

अरुणा राय और मेधा पाटकर दोनों के ही सामने समान चुनौती है- समस्या के सही कारणों को समझना और उसके बाद एक समुचित स्केल के समाधान की योजना बनाकर पूरी समस्या पर हमला करना।

श्रीमती राय ने इस चुनौती का सामना करने के लिए एमकेएसएस का आकार नहीं बढ़ाया, बल्कि उसके लिए एक दूसरा तरीका अपनाया। उन्होंने आरटीआई यानी, 'सूचना का अधिकार' की लड़ाई शुरू की। एक ऐसी सरकारी नीति के लिए जो आम लोगों को मांगने पर सरकार के बारे में सूचना हासिल करने का हक देती हो। इसके साथ उन्होंने मस्टर रोल की कॉपी हासिल करने के लिए एक-एक व्यक्ति के सशक्तिकरण का तर्क दिया- किसी भी व्यक्ति को यदि किसी सरकारी कार्य परियोजना में रुचि हो, तो वह उस मुद्दे पर काम कर सकता है।

किसी भी सामाजिक मुद्दे पर काम करने के दो आधारभूत तरीके हैं : सीधा हस्तक्षेप और (सरकारी) नीति स्तर पर हस्तक्षेप। पहला तरीका निश्चित रूप से काफी महत्वपूर्ण है, खासकर किसी आपात स्थिति में। लेकिन इसकी तुलना में दूसरा तरीका यानी, नीति स्तर पर हस्तक्षेप करने से अधिक लोगों पर प्रभाव पड़ता है और समस्या का सही और स्थायी समाधान भी होता है। आम तौर पर स्केलिंग अप का मतलब होता है सीधे हस्तक्षेप से नीतिगत हस्तक्षेप की तरफ बढ़ना।

आरटीआई की लड़ाई लड़कर श्रीमती राय ने देश के हर नागरिक का एक्टिविस्ट बना दिया। उन्होंने हम में से प्रत्येक को एमकेएसएस का कार्यकर्ता बना दिया। अब वह काम कोई भी कर सकता है, जो पहले एमकेएसएस के कार्यकर्ता करते थे। इस तरह उन्होंने एमकेएसएस की जरूरत ही खत्म कर दी। सबसे महत्तवपूर्ण यह है कि अब वह और एमकेएसएस दोनों किसी दूसरी समस्या और चुनौती को हाथ में ले सकते हैं।

यह साफ है कि आरटीआई सिर्फ नकली मस्टर रोल ही नहीं, बल्कि और भी कई दूसरी और उससे बड़ी समस्याओं का समाधान करने में कारगर है। यही है नीतिगत हस्तक्षेप के तरीके की असली ताकत। चलिए हम समस्या के समाधान के लिए नीतिगत हस्तक्षेप के कुछ और उदाहरणों की चर्चा करते हैं।

समस्या: बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड के बीच का रिश्ता। मान लीजिए कि महेश भट्ट को कोई फिल्म बनाने के लिए दाउद इब्राहिम से कर्ज लेना पड़ता है।

नीतिगत समाधान: बॉलीवुड को उद्योग का दर्जा दे दीजिए, ताकि वह वित्तीय संस्थानों से कर्ज ले सके।

समस्या: स्कूल में दाखिला लेने के लए लंबी कतार, ऊँचा शुल्क और डोनेशन की मांग।

नीतिगत समाधान: शिक्षा क्षेत्र से लाइसेंस राज हटाइए (जैसे हमने उद्योग से हटाया), स्कूलों को मुनाफा कमाने की इजाजत दीजिए, शिक्षा को उद्योग का दर्जा दीजिए, ताकि छोटे और सस्ते स्कूल अपने सुधार और विस्तार के लिए कर्ज ले सकें।

ऐसे संगठन जो सामाजिक समस्याओं के समाधान में सरकारी नीति की भूमिका की बात करते हैं, उन्हें आमतौर पर थिंक टैंक कहा जाता है। एमकेएसएस और एनबीए (नर्मदा बचाओ आंदोलन) जैसे सीधे हस्तक्षेप करने वाले संगठन काफी लोकप्रिय होते हैं। पर हमें सामाजिक बदलाव में थिंक टैंक की भूमिका और महत्व को समझने की जरूरत है। सामाजिक समस्याओं के सुधार में नीतिगत विचारों की ताकत सचमुच बेजोड़ है। कई बार हमें नई नीति बनाने की जरूरत पड़ती है, पर अधिकतर मामलों में पुरानी नीति में ही दोबारा सोच-विचार करने, दोहराने या हटाने की जरूरत पड़ती है।

भारत को बड़ी संख्या में थिंक टैंकों की जरूरत है, जो हमारी समस्याओं के वास्तविक कारणों को समझ सकें और ऐसे नीतिगत समाधान सुझा सकें, जो असरकारी, किफायती और टिकाऊ हों।

एक थिंक टैंक के ही अंदाज में एक सवाल के साथ समाप्त करना बेहतर होगा: तो मेधा पाटकर वाली समस्या के लिए अरुणा राय वाला समाधान क्या होगा?

पार्थ जे शाह