सभ्य समाज की ओर

ओलिवर वेंडेल होम्स ने लिखा है कि कराधान वह मूल्य है जिसे हम अपनी सभ्यता के लिए चुकाते हैं। लेकिन इसे यदि इस तरह से व्यक्त किया जाए कि कराधान हम वास्तव में सभ्यता के अभाव के लिए चुकाते हैं तो ज्यादा उचित होगा। यदि लोग अपनी, अपने परिवार और अपने आस-पास रह रहे जरूरतमंद लोगों की बेहतर देखभाल स्वयं करने लगें तो सरकार खुद-ब-खुद पीछे हट जाएगी और इसके परिणामस्वरूप समाज सशक्त हो जाएगा।

अर्थशास्त्री मार्क कोसेन ने हाल ही में इसे कुछ इस तरह व्यक्त किया: हर (अधिकतर) समय हम कुछ नियम और कानून बनाते रहते हैं , हमेशा करों में वृद्धि करते रहते हैं, हमेशा युद्धों में संलिप्त रहते हैं और व्यक्ति को निदेर्शित होने में उनके द्वारा की जाने वाली भूलें पहचानने में लगे रहते हैं। जब हम नागरिकों से कोई काम, उन्हें समझा बुझाकर और उन्हें प्रेरित करके करवाते हैं, तब तो हम सफल होने का दावा कर सकते हैं लेकिन वही काम, जब हम उन पर दबाव डालकर करवाते हैं तो हम असफल होते हैं। यदि जोर- जबरदस्ती या दबाव पर इच्छा या मर्जी की विजय होती है तो लोग एक दूसरे की सहायता करते हैं क्योंकि वे ऐसा करना चाहते हैं। इसलिए नहीं, कि सरकार उनसे ऐसा करने के लिए कहती है. कोसेन तर्क देते हैं कि यही सभ्य लोगों एवं सभ्य समाज की पहचान है।

जो सभी लोग हमारी संस्कृति की तरक्की और समृद्धि की कामना रखते हैं, उनके लिए यह दूरगामी परिणामों वाला एक महत्वपूर्ण अवलोकन है। सांस्कृतिक प्रगति को, दूसरों द्वारा किए गए अर्जन से अधिक से अधिक लेकर, इसे सरकारी नौकरशाहों द्वारा अच्छी चीजों पर खर्च किए जाने के रूप में परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए। संस्कृति की सही तरक्की तब होती है, जब व्यक्ति राजनेताओं, पुलिस और नौकरशाहों की सहायता लिए बगैर अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं करें।

जब फ्रांसीसी सामाजिक टिप्पणीकार एलेक्सिस डी टोक्योविले ने 1830 में अमेरिका की यात्रा की, तो उन्होंने इस सभ्य समाज के उत्साह को यहाँ की महत्वपूर्ण संपदा के रूप में देखा। वह ये देखकर हैरान थे कि अमेरिकी लोग कला की तरक्की, पुस्तकालयों के निर्माण और अन्य सभी तरह की सामाजिक जरूरतों के लिए स्वयं ही लगातार संस्थाएं गठित कर रहे हैं। यदि हमारे पूर्वज भी जब कुछ अच्छा करते थे तो उन्हें भी राजनीतिकों या नौकरशाहों से कोई मदद नहीं मिलती थी, क्योंकि इनमें लोगों के लिए कुछ करने के उत्साह एवं लगन का अभाव था। टोक्योविले ने डेमोक्रेसी इन अमेरिका में लिखा है, “उन कानूनों में, जिनसे मनुष्य का स्वभाव शासित होता  है, में से कोई भी इससे ज्यादा सारगर्भित और स्पष्ट नहीं है, जिनमें सब के साथ साझेदारी की बात कही गई। यानी आपसी समन्वय के पनपने और इसके बहुत अधिक विकास की जरूरत है...”

आज सरकार जब सभी स्तरों पर व्यक्तिगत आय का 41 प्रतिशत खर्च करती है तो यह अनिवार्य रूप से स्पष्ट है कि आज के अमेरिकी न तो वैसा सोचते हैं, न व्यवहार करते हैं और न ही, वैसे वोट डालते है र्जैसा उनके पूर्वज टोक्योविले के दिनों में किया करते थे। अब सवाल यह है कि कैसे हम वैसी मनोवृतियों एवं संस्थाओं को वापस स्थापित और सुदृढ करें, जिनसे अमेरिकी समाज की नींव पडी थी?

निश्चित ही सरकारी योजनाओं को चुपचाप अपनाकर हम ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि वो हमारे निजी प्रयासों को बिलकुल ही स्थिर कर देते हैं या उन सरकारी योजनाओं के बारे में कानूनी सवाल उठाने वालों के उद्देश्यों पर रोक लगाकर भी हम ऐसा नहीं कर सकते। वास्तविकता तो यह है कि हम सभ्य समाज का पुनर्गठन तब तक नहीं कर सकते, जब तक हमें अपने आप पर विश्वास नहीं हो और हम यह न मान लें कि सरकार का हम सब पर एकाधिपत्य है। हम तब तक ऐसा नहीं कर सकते, जब तक सरकार हमारी व्यक्तिगत आय का 41 प्रतिशत कर के रूप में लेकर यह शिकायत करती रहेगी कि लोगों के पास अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए धन नहीं है।

हम तभी सभ्य समाज के पुनर्गठन की ओर कदम बढ़ा सकते हैं जब लोग सरकारी योजनाओं की जगह गंभीरतापूर्वक निजी पहल करें। इसके लिए हमें अपनी बहस को और परिपक्व स्तर पर ले जाना होगा। सभ्य समाज तभी बनेगा जब हम यह समझ जाएंगे कि सरकारी मध्यस्थों को बहुत ज्यादा कीमत देकर कुछ अच्छा नहीं किया जा सकता, जो प्राय: जरूरतमंदों और सहायता करनेवालों के बीच की कड़ी को तोड़ देते हैं।

हम प्रगति तब कर पाएंगे, जब यह सोचना बंद कर देंगे कि ''किसी भी समस्या का समाधान सरकार है।'' हमें यह सोचना होगा कि सरकार सभी समस्याओं का समाधान नहीं है, वरन, जिन समस्याओं के समाधान के लिए उसकी जरूरत है, वह उन्हें भी पूरा नहीं कर पा रहीं है। वह किसी भी काम को ठीक ढ़ंग से नहीं कर रही। और यहाँ तक की यह अपने तरीके से, और, आत्मसंतुष्टि के लिए काम करती है।

सभ्य समाज की वापसी आसान नहीं होगी क्योंकि गलत आदतें और छोटी-छोटी सोचें कभी खत्म नहीं होतीं। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है: जब मैकिनेक सेंटर और सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी ने हाल ही में मिशिगन के 280 खरब डॉलर के बजट में साढ़े सात प्रतिशत कटौती की सलाह दी तो एक समाचार पत्र के संपादकीय में इस सुझाव को अच्छी पहल के रूप में नहीं देखा गया। उसमें सभ्य समाज की वापसी की तुलना, मानव जीवन को बाजार में सबसे ऊँची बोली लगाने वालों की मर्जी के अधीन होने से की गई। संपादकीय में सेंटर के सुझाव पर कुछ ठोस कहने के बजाए काफी हाय-तौबा मचाई गई। कुल मिलाकर संदेश यह था कि हम लोग मैकिनेक सेंटर की अपेक्षा ज्यादा मानवीय एवं उदार हैं क्योंकि हम चाहते हैं कि सरकार हमारी समस्याओं का समाधान करे।

एक समाचार पत्र जो राजनीतिक अभियानों के दिखावे पर गहरा अफसोस जताता है लेकिन वही अखबार, जब गंभीर प्रस्तावों की बात आती है, तो उसे वैसे नहीं उठा पाता जिससे उसकी असहमति होती है। दूसरी ओर, इसी समय विचारशील लेखकों को देश में उत्साहवर्द्धक प्रवृति दिखलाई पड़ रही हैं । अमेरिकी न्यूज एंड वर्ल्ड रिकॉर्ड के, 9 जनवरी 1996 के, एक लेख में सभ्य समाज की वापसी की ऊँचे स्वर में घोषणा की गई और इसमें फ्रैंकफोर्ड पेंसलवानिया को उदाहरण के तौर पर लिया गया। फ्रैंकफोर्ड में कर बहुत अधिक लग रहा था, लोग निराश थे और सरकार पर निर्भर समुदाय इसके विकल्प के लिए बहुत उद्विग्न था। वहाँ सभ्य समाज की चिनगारी जली और अब लोग अपनी समस्याओं का समाधान खुद कर रहें हैं। अब वे बैठकर अपनी स्थितियों पर ऑंसू नहीं बहाते और इस विषय पर संपादकीय नहीं लिखा जा रहा कि राजनेता नागरिकों के लिए कैसे काम करें। वहाँ के एक स्थानीय नागरिक ने कहा कि यदि सरकार आपके लिए कोई काम नहीं करती तो आप उसे स्वयं कर लें।

जो लोग यह सोचते हैं कि परोपकार का मतलब किसी और का धन खर्च करना होता है तो उनकी अपेक्षा हम फ्रैंकफोर्ड से ज्यादा अच्छी तरह से सबक ले सकते हैं।

सभ्य समाज बनाने के लिए आवश्क है कि हम उन सभी चीजों को नहीं कहें जिनसे हमारी व्यक्तिगत एवं स्थानीय जिम्मेदारियां संकुचित होती हों और हमारी अपेक्षाएं सरकार से बढ़ती हों। जरूरत है कि हम अपने निजी प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए रचनात्मक तरीके से सोचें और उन पर अमल करें।

व्यू प्वाईंट ऑन पब्लिक इशयुज (8-जुलाई-1996)
लॉरेंस डब्ल्यू रीड