वाउचर प्रणाली के जरिए शिक्षा की रकम लोगों को सीधे मिले

भारत में शिक्षा के लिए संसाधन जुटाने की तमाम कोशिशें हो रही हैं। शिक्षा उपकर से लेकर न जाने क्या-क्या? पर हकीकत ये है कि सरकार जो पैसे खर्च करती हैं, उसका भारी दुरुपयोग होता है। क्यों न शिक्षा के लिए आवंटित पैसे सीधे-सीधे छात्रों को वाउचर के रूप में दे दिया जाए - पेश है इस पर एक पड़ताल।
    आजादी की आधी सदी से अधिक गुजर जाने के बावजूद क्या हम शिक्षा के क्षेत्र में कुछ खास हासिल कर पाए हैं? सरकार चाहे जितनी डींगें हाँके, पर भारत का एक-एक बच्चा शिक्षा की दुरव्यवस्था से वाकिफ है। अब समय आ गया है कि हम सरकार के कार्य-कलापों का मूल्यांकन करें और व्यवस्था के हर खोट पर चोट करें। जागरूक लोग इस दिशा में सक्रिय हैं। दुनिया भर में व्यवस्था सुधार के नये-नये प्रयोगों का अध्ययन कर वे भारत की जरूरतों में फिट हो सकने योग्य नये-नये मॉडलों को बनाने में लगे हुए हैं। जरूरत यह है कि देश की जनता भी उनके विचार जानें। ताकि उनका वोट बल संकीर्ण स्वार्थ में फंसी राजनीति को धकिया कर सही मार्ग पर आगे बढ़ा पाने में कामयाब हो सके।
    दिल्ली स्थित एक वैचारिक संस्था सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की नीति समीक्षा श्रृंखला के तहत हालिया प्रकाशित 'एजुकेशन वाउचर: ग्लोबल एक्सपीरियंस एंड इंडियाज प्रॉमिसेज' में देश की शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी सुधार के लिए 'वाउचर व्यवस्था' का सुझाव प्रस्तुत किया गया है। वाउचर व्यवस्था में देश को शैक्षिक बदहाली से बाहर निकालने की काफी संभावनाएं हैं। वाउचर व्यवस्था संबंधी उनके विचारों का सार यहाँ प्रस्तुत है।
    आज की ''नि:शुल्क'' शिक्षा पद्धति के तहत विद्यालयों को अनुदान (ग्रांट) दिया जाता है, जहाँ विद्यार्थी लगभग मुफ्त शिक्षा ग्रहण करते हैं। इसकी जगह वाउचर व्यवस्था में विचार यह है कि सरकार विद्यालयों को कोई अनुदान न देकर वही रकम सीधे गरीब विद्यार्थियों को शिक्षा वाउचर के रूप में दे दे। शिक्षा वाउचर सरकार द्वारा दिया जाने वाला एक कूपन होगा, जो विद्यार्थियों की मनपसंद विद्यालय में पढ़ाई का पूरा अथवा आंशिक खर्च वहन करेगा। विद्यालय विद्यार्थियों से वाउचर लेगा, अपने बैंक खाते में जमा करेगा और बैंक सरकार के खाते से उतनी राशि निकालकर विद्यालय के खाते में डाल देगा। किसी प्रत्यक्ष रकम का कहीं कोई हस्तांतरण नहीं होगा। सिर्फ वाउचर विद्यार्थियों के हाथ से विद्यालय और फिर सरकार तक पहुंचेगा। इस व्यवस्था में विद्यालयों को पैसा सीधे सरकार से न मिलकर वही पैसा विद्यार्थियों के हाथ से मिलेगा। इससे विद्यालय सीधे विद्यार्थी और उसके अभिभावक के प्रति जवाबदेह होंगे। वे अधिक से अधिक पैसा कमाने के लिए अधिक से अधिक विद्यार्थियों को आकर्षित करना चाहेंगे। इससे विद्यालयों के बीच प्रतियोगिता पैदा होगी। और इस प्रक्रिया में शिक्षा का स्तर खुद-ब-खुद ऊँचा उठ जाएगा। शिक्षा वाउचर का प्रयोग विश्व के कई देशों में पहले से हो रहा है। स्वीडन, चिली, कोलंबिया, हॉलैंड, यूएसए, यूके, न्यूजीलैंड, बांग्लादेश, चेक गणराज्य और कोट डी आइवरी जैसे विविध प्रकार के देशों में वाउचर कार्यक्रम का उपयोग विभिन्न प्रकार से किया गया है। इससे इन देशों में हजारों विद्यार्थियों को लाभ पहुँचा है। इनके अनुभवों का लाभ उठाने की जरूरत है।
    सुधार के वर्तमान प्रयासों के तहत मौलिक शिक्षा को जन-जन तक पहुँचाने के लिहाज से सरकार और शिक्षा विशेषज्ञों का सबसे ताजा प्रयास 'शिक्षा का अधिकार विधेयक 2005' है। इस विधेयक में देश को एक ऐसी 'समान विद्यालय व्यवस्था' (कॉमन स्कूल सिस्टम) की ओर ले जाने का प्रयास किया गया है, जिसमें सरकार ही यह तय करेगी कि विद्यार्थी को किस विद्यालय में पढ़ना है। सोच यह है कि एक निश्चित क्षेत्र के सभी अमीर अथवा गरीब विद्यार्थी एक ही (समान) विद्यालय व्यवस्था में पढ़ें। 'समान विद्यालय व्यवस्था' को कई पश्चिमी देशों ने लगभग सौ साल पहले स्थापित किया था। अब वे इस केंद्रीकृत और नौकरशाही पीड़ित व्यवस्था से अपना पल्ला झाड़ने में लगे हैं। यह व्यवस्था वस्तुत: शिक्षक-संघों और प्रशासकों के लाभ के हिसाब से गढ़ी गई है न कि विद्यार्थियों के। क्यों न हम उनकी गलतियों को दुहराने से बचें?
    कुछ लोग शिक्षा बजट बढ़ाने की बात करते हैं। शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 6 प्रतिशत खर्च करने अथात् खर्च दो गुणा कर देने से कुछ तो लाभ मिलेगा ही। लेकिन सवाल यह है कि खर्च जिस अनुपात में बढ़ेगा क्या फायदा भी उसी अनुपात में बढ़ेगा? द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उच्च साक्षरता स्तर हासिल करने वाले देशों में से शायद ही किसी ने अपने सकल घरेलू उप्ताद (जीडीपी) का 6 प्रतिशत के आसपास खर्च किया हो। दक्षिण कोरिया ने 3.2 प्रतिशत, जापान ने 3.8 प्रतिशत तथा चीन ने 2.6 प्रतिशत खर्च किया है। संयुक्त राज्य अमेरिका सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों में आता है, लेकिन उनके विद्यार्थियों का स्तर विश्व-स्तर के मुकाबले बहुत नीचे है। दुनिया भर के उदाहरण यही बताते हैं कि सरकारी खर्च की मात्रा नहीं, बल्कि खर्च का तरीका ही यह तय करता है कि शिक्षा का स्तर कैसा होगा।
    तो सुधार का सही एजेंडा क्या हो? भारत के आर्थिक सुधार की सफलता से ही शिक्षा सुधार का भी सही रास्ता निकलता है: लाइसेंस, रेगुलेशन और राजनीति हटाइए। विकेंद्रीकरण लाइए। विद्यालयों और महाविद्यालयों की जवाबदेही अभिभावकों और विद्यार्थियों (ग्राहकों) के प्रति सुनिश्चित कीजिए न कि शिक्षा अधिकारियों (लाइसेंस देने वालों) के प्रति। शिक्षा में विकल्प और प्रतियोगिता को बढ़ाइए, जैसा हमने अर्थव्यवस्था में किया है। टयूशन और डोनेशन की ऊँची दर और प्रवेशार्थियों की लंबी कतार आपूर्ति में कमी की ओर इशारा करती है। 1991 के उदारीकरण से पहले उपभोक्ता सामानों की आपूर्ति में भी ऐसा ही अभाव छाया था। हमने औद्योगिक क्षेत्र से लाइसेंस-परमिट-कोटा राज समाप्त किया और आपूर्ति की कमी खत्म हो गई। लेकिन यही लाइसेंस-परमिट-कोटा राज शिक्षा व्यवस्था में अभी भी जारी है।
    आज एक विद्यालय खोलने के लिए शिक्षा अधिकारियों से अनिवार्यता प्रमाणपत्र (एसेंसियलिटी सर्टिफिकेट) लेना पड़ता है। आवेदन का मूल्यांकन करते समय अधिकारी यह देखते हैं कि उस क्षेत्र में पहले से कितने विद्यालय चल रहे हैं और नये विद्यालयों की कोई जरूरत है भी या नहीं। लाइसेंस देने की यह एक बोझिल और अनावश्यक प्रक्रिया है। अनिवार्यता प्रमाणपत्र के अलावा सरकार ने कक्षा के आकार, खेल के मैदान की सुविधा, शिक्षकों एवं कर्मचारियों को नौकरी देने या बर्खास्त करने तथा उनके वेतन संबंधी सूक्ष्म-से-सूक्ष्म विवरण के साथ मानक तय कर रखे हैं। निश्चितरूपेण ये रेगुलेशन अच्छी मंशा से बनाए गए हैं। लेकिन परिणाम प्राय: मंशा के विपरीत ही निकलते हैं।
    दिल्ली में झुग्गियों के बच्चों के लिए चल रहे एक विद्यालय, दीपालय को 10 सालों से सरकारी मान्यता सिर्फ इस वजह से नहीं मिल पाई है कि यह शिक्षकों को सरकार द्वारा निर्धारित वेतन नहीं देता है। गरीबों के लिए गैरसरकारी संगठनों (एनजीओ) द्वारा अथवा निजी तौर पर चलाए जाने वाले छोटे विद्यालय शिक्षकों को उतना वेतन नहीं दे सकते। उनमें से अधिकांश विद्यालय अपने शिक्षकों से सरकार द्वारा निर्धारित वेतन राशि पर हस्ताक्षर करवाते हैं, पर उन्हें उतना ही देते हैं, जितना वे दे सकते हैं। दीपालय ने बेईमान बनना स्वीकार नहीं किया। इसलिए उसे मान्यता नहीं मिली। इसके विद्यार्थी दूसरे मान्यता प्राप्त विद्यालयों में बोर्ड परीक्षा हेतु पंजीकरण कराते हैं। इन नियमों से क्या गरीबों का भला हो रहा है? लाइसेंस-परमिट-कोटा राज की जो विकृति हम औद्योगिक क्षेत्र में देख चुके हैं, वह शिक्षा क्षेत्र में अभी भी कायम है।
    सरकारी आंकड़ों के अनुसार विद्यालय जाने वाली उम्र के 40 प्रतिशत बच्चे विद्यालय से बाहर हैं जबकि अधिकांश घरेलू (हाउसहोल्ड) सर्वेक्षणों के अनुसार यह ऑंकड़ा 6 से 10 प्रतिशत है। अर्थात् लगभग 30 प्रतिशत बच्चे बिना मान्यता वाले निजी विद्यालयों में पढ़ते हैं, जिनकी सरकारी सर्वेक्षणों में गिनती नहीं होती। उन्हें विद्यालय से बाहर मान लिया जाता है। 2-4 कमरों में चलने वाले इन विद्यालयों में 50 से 200 रुपये बतौर शुल्क लिए जाते हैं, जहाँ घरेलू नौकरों से लेकर रिक्शा वालों तक के बच्चे पढ़ते हैं। ये विद्यालय कभी भी खेल का मैदान या कर्मचारियों को सरकार द्वारा तय वेतन नहीं दे सकते। सरकार की मंशा भली है, पर अच्छी मंशा से बनाए गए ऐसे अधिकांश कानूनों का मंशा के विपरीत परिणाम निकला है। वे बेइमानी बढ़ाते हैं और ईमानदारों को सताते हैं। इसी तरह के परिणाम 'लाभ नहीं कमाने वाले ट्रस्ट और सोसाइटी द्वारा ही विद्यालय चलाने की बाध्यता' से सामने आते हैं। जिसके कारण ज्यादा समय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा थोपे गये शब्द ''सरप्लस'' को छिपाने या बांटकर बराबर करने में खर्च होता है।
    क्यों ना हम निजी और सरकारी क्षेत्र की मौलिक विशेषताओं को परस्पर मिला दें? निजी क्षेत्र को शिक्षा का उत्पादन करने दीजिए—विद्यालय एवं महाविद्यालय बनाने और चलाने दीजिए—तथा उन तक पहुँचाने दीजिए, जो इसके लिए भुगतान कर सकते हैं। दूसरी ओर जो भुगतान नहीं कर सकते, सरकार उनकी शिक्षा का खर्च छात्रवृत्ति, शिक्षा वाउचर तथा ऋण के माध्यम से उठा सकती है। सरकार उत्पादन करके नहीं, बल्कि वित्तीय व्यवस्था कर शिक्षा सुनिश्चित कर सकती है। छात्रवृत्ति, शिक्षा वाउचर और ऋण गरीबों को चुनने की वैसी ही क्षमता देंगे, जैसा आज अमीरों को सुलभ है।
शिक्षा में सुधार के कुछ जरूरी कदम:

  • लाइसेंस-परमिट राज खत्म कीजिए, शिक्षा की आपूर्ति बढ़ाइए।
  • सरकारी विद्यालयों एवं महाविद्यालयों को वित्तीय स्वायत्तता दें।
  • सरकारी अनुदानों को हर शैक्षिक संस्थान की सफलता से जोड़ें।
  • स्वतंत्र रेटिंग, सर्टिफिकेशन और एक्रिडिटेशन एजेंसियों की स्थापना करें।
  • पैसा विद्यार्थियों को दें, संस्थानों को नहीं: गरीबों को छात्रवृत्ति, वाउचर और ऋण से मदद करें।
  • शिक्षा संस्थानों को लाभ कमाने की अनुमति दें।
  • निजी विश्वविद्यालय विधेयक पारित करें।
  • शिक्षा को उद्योग का दर्जा दें, ताकि शिक्षा उद्यमियों को ऋण और उद्यम पूंजी (क्रेडिट एवं वेंचर कैपिटल) आसानी से मिल सके।

    वाउचर अवसर की समानता देता है। इसके पीछे गरीब विद्यार्थियों को ताकतवर बनाने का विचार है। ताकि विद्यालय का चुनाव करते वक्त उनके सामने आर्थिक कमी का रोड़ा ना आए। इससे गरीबों को भी चुनने की उतनी ही ताकत मिलेगी, जितना आज अमीरों को सुलभ है। आज जो विद्यार्थी सरकारी विद्यालय में जाने को विवश हैं, वे ही कल सरकार से वाउचर लेकर अपने पसंदीदा विद्यालय में दाखिला ले लेंगे। वर्तमान प्रणाली में विद्यालय की जवाबदेही सरकार के प्रति है। वाउचर प्रणाली में विद्यालय विद्यार्थियों के प्रति जवाबदेह होगा; क्योंकि विद्यार्थी खुद अपनी शिक्षा के लिए भुगतान करेगा। अगर विद्यालय रास नहीं आए, तो विद्यार्थी वाउचर लेकर दूसरे विद्यालय जा सकते हैं। वाउचर से विद्यालयों को दाखिला तथा गुणवत्ता बढ़ाने की स्वाभाविक प्रेरणा मिलेगी। विद्यालय का कोष उसके यहाँ पढ़ने वालों की संख्या पर निर्भर करेगा—चाहे वे प्रत्यक्ष भुगतान करते हों या वाउचर के माध्यम से। सभी विद्यालय विद्यार्थियों को, यहाँ तक कि गरीब (वाउचर)  विद्यार्थियों को भी अपने यहाँ खींचने के लिए जीतोड़ कोशिश करेंगे।
    इससे विद्यालयों के बीच प्रतियोगिता पैदा होगी। फलत: शिक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर और शिक्षणेतर गतिविधियों का स्तर खुद-ब-खुद ऊँचा उठेगा। विद्यार्थियों को खींचने और अपने पास बनाए रखने के लिए वे ऐसे तमाम बंदोबस्त करेंगे, जो विद्यार्थियों और अभिभावकों को लुभा सकें, जैसे- मध्याह्न भोजन (मिडडे मील), परिवहन, पूरक शिक्षा, कक्षा खत्म होने के बाद भी बच्चों की देखभाल। विद्यालय ये सब किसी मजबूरीवश नहीं करेंगे, बल्कि विद्यार्थी रूपी ग्राहक जुटाने के लिए ऐसा करना जरूरी होगा। इससे भी खास बात यह होगी कि हर विद्यालय यह खोजने में लगा रहेगा कि वे ऐसी कौन-सी सेवा पेश करें, जो उनके यहाँ पढ़ने वालों को विशेष रूप से भाए। कहीं यह मध्याह्न भोजन होगा, तो कहीं नि:शुल्क परिवहन, तो कहीं कक्षा समाप्त होने पर बच्चों की देख-रेख। इस प्रकार 'विद्यार्थियों की चयन' क्षमता और 'विद्यालयों के बीच प्रतियोगिता' के मिश्रित प्रभाव से ''सबको शिक्षा-बेहतर शिक्षा'' का सपना साकार होगा।
    वाउचर व्यवस्था को सफल बनाने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी होगा। पहला, सरकारी एवं निजी दोनों ही प्रकार के यथासंभव अधिक-से-अधिक विद्यालय वाउचर विद्यार्थियों को स्वीकार करने को तैयार हों, ताकि न सिर्फ प्रतियोगिता बढ़े, बल्कि प्रतियोगिता का गुणवत्ता-स्तर भी ऊँचा हो। दूसरा, किसी बाहरी संस्था द्वारा मूल्यांकन रिपोर्ट का प्रकाशन हो। तीसरा, प्रतियोगिता को शिक्षा की गुणवत्ता पर केंद्रित रखने के लिए जरूरी है कि निम्न सामाजिक-आर्थिक आधार वाले छात्रों को अधिक मूल्य का वाउचर दिया जाए या फिर केवल इसी वर्ग के छात्रों को वाउचर दिया जाए। ताकि विद्यालय वाउचर विद्यार्थियों के बीच आर्थिक हैसियत को लेकर भेद-भाव न कर सकें। चौथा, कार्यक्रम में शामिल विद्यालयों पर उतने ही नियम लगाए जाएँ, जितने जरूरी हों। पाँचवाँ, शिक्षा बाजार में उद्यमियों के प्रवेश पर कोई रोक ना हो अर्थात् अधिक-से-अधिक विद्यालयों की स्थापना को प्रोत्साहित किया जाए। छठा, सरकारी एवं निजी विद्यालय के साथ वाउचर फंड के मामले में कोई असमानता या भेद भाव न बरती जाए। सातवाँ, वाउचर ऐसा हो कि उच्च कोटि के निजी विद्यालय भी वाउचर विद्यार्थियों का दाखिला लेने को सहज ही तैयार हों, ताकि उनके प्रतियोगिता में आने से समग्र शिक्षा का गुणवत्ता स्तर उनके जैसा हो जाए।
    व्यापक नजरिए से देखा जाए, तो वाउचर व्यवस्था में देश की शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी सुधार लाने की काफी संभावनाएँ हैं। इसे अगर पूरे तौर पर नहीं तो सीमित तौर पर भी जरूर अपनाया जाना चाहिए। पर सवाल यह है कि कुव्यवस्था के अंधेरे में सुधार की मशाल लेकर आगे कौन आएगा? और कब आएगा?

इकोनॉमी इंडिया (मई, 2006)
संजय कुमार साह

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