बुद्धू न बनो बुद्धदेव

    कई दिनों से पश्चिम बंगाल का सिंगूर और नंदीग्राम राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में छाया रहा। सिंगूर में ममता अनशन पर बैठी रहीं, पर राज्य सरकार को ममता नहीं आई। लेकिन नंदीग्राम में बुद्धदेव जी ने अपनी भूल स्वीकार कर ही ली। वे मान रहे हैं कि वहाँ स्थानीय प्रशासन स्तर पर भारी भूल हुई है। वो भूल क्या थी, स्पष्ट नहीं किया गया। कुछ साफ पता चले तो उसके निहितार्थों पर विचार किया जा सकता है।
    जब देश के अन्य राज्य उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण का फायदा दोनों हाथों से बटोरने में लगे हैं, तो ऐसे में बुद्धदेव बाबू शायद यह सोच रहे हैं कि तेजी से आगे बढ़ती जा रही दुनिया में अब साम्यवादी सिद्धांतों से चिपके रहना बेवकूफी है। शायद इसलिए वे अब ठेठ पूंजीवादी का-सा बर्ताव करने लगे हैं। साम्यवाद के उसूलों को ताक पर रख कर खुलेआम राज्य के किसानों की जमीन बलपूर्वक छीन-छीन कर धन्नासेठ अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कंपनियों के हवाले करने में लगे हैं। जनता अपनी जमीन देना नहीं चाहती है। पर बुद्धदेव जी तो वही करेंगे, जिसे वे सही समझते हैं। उनकी नजर में निरक्षर किसान और आम जनता ठहरे निरे बेवकूफ। उन्हें क्या मालूम कि उनका हित किस में है। कम्युनिस्ट शासन प्रणाली के जिन पहलुओं पर बुद्धिजीवी हमेशा प्रहार करते रहे हैं, उनमें से एक यह है कि वह कठोर केन्द्रीकृत शासन प्रणाली स्थापित करती है। जिसमें शीर्ष पर बैठा एक तानाशाह शासक सर्वेसर्वा और सर्वज्ञ होता है या माना जाता है। पूरे राज्य में सिर्फ वही जानता है कि व्यापारी को क्या बेचना चाहिए, क्या नहीं। जनता को क्या खरीदना चाहिए और क्या नहीं। पब्लिक को क्या देखना चाहिए, क्या नहीं। विद्यार्थी को क्या पढ़ना चाहिए और क्या नहीं। एक व्यक्ति को महीने में कितने पैसे से गुजारा करना है। यह सब वही सर्वेसर्वा बताता है। इतना ही नहीं व्यावसायिक कंपनियाँ कितने बजे खुलेंगी। बाजार में दुकानें कितने बजे तक चलेंगी। विद्यालय में कौन से विषय पढ़ाए जाएंगे। और हम अपनी जमीन-जायदाद किसे बेच सकते हैं और किसे नहीं। यह सब वही नीति-नियंता निर्धारित करता है। वह द लीस्ट रूल इज द बेस्ट रूल के विचार को सही नहीं मानता। दुनिया के समस्त धर्म और दर्शन यह बताते हैं कि देश-काल-पात्र के हिसाब से आदमी को अपना विवेक इस्तेमाल करना चाहिए। पर कमयुनिस्टों की नजर में अपना विवेक इस्तेमाल करने वाला आदमी अपराधी है। उनके यहाँ हर काम के लिए एक सर्वमान्य नियम-रेगुलेशन बना होता है। आदमी को उसी पर चलना होता है, चाहे परिस्थिति उसकी इजाजत दे या न दे। यहाँ आप क्रिएटिव नहीं हो सकते क्योंकि क्रिएटिव होने की पहली शर्त है कि आप रूल से ऊपर उठ कर बुद्धि-विवेक-विचार अर्थात् कॉमनसेंस के स्तर पर सोचें।
    कुछ विचारकों का यह मानना है कि ऐसी कठोर केंद्रीकृत शासन प्रणाली का खतरा यह है कि शीर्ष पर यदि एक सनकी व्यक्ति पहुँच जाए, तो उसकी ऊट-पटांग हरकतों का खामियाजा पूरे देश की जनता को भुगतना पड़ता है। और यदि एक अच्छा आदमी आ जाए, तो उसकी प्रतिभा ऊपर लिखी गयी फिजूल की बातों में बर्बाद होती रहती है। दुकान कब खुलनी चाहिए। कहाँ खोलनी चाहिए। दुकान में बेचने हेतु कौन-सी वस्तु रखनी चाहिए। ये सारी बातें एक दुकानदार ही बेहतर समझ सकता है। ऐसी बातों पर अगर सरकार माथापच्ची करे, तो वह कठिन मेहनत से जुटाये गए राजस्व की बर्बादी है।
    खैर आएं बुद्धदेव जी पर, जिनके कम्युनिस्ट तरकश में अब शायद विकास का एक भी तीर नहीं बचा और इसीलिए अब उनके हृदय में पूंजीपतियों के प्रति प्रेम की गंगा लबालब बहने लगी है। तो बुद्धदेव जी, क्या आपने मान लिया है कि साम्यवादी विचार राज्य का विकास करने एवं बेरोजगारी दूर करने में सक्षम नहीं? अगर सचमुच मान लिया है, तो साम्यवाद का रहा सहा चोला भी उतार कर फेंक दीजिए ना! और अगर आपको अभी भी लगता है कि पूंजीपति देश और गरीबों के दुश्मन हैं, तो फिर गरीबों की जमीन पूंजीपतियों को देने में क्यों लगे हैं? क्या मिल रहा है आपको?
    बुद्धदेव जी का द्वंद्व यह है कि आज के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने अपने खाली पड़ गये कम्युनिस्ट तरकश को उतारकर विश्व बाजार के आगे घुटने जरूर टेक दिए हैं, पर अभी भी उनकी शासन प्रणाली में दुनिया में हो रहे क्रांतिकारी विकास का कोई लक्षण नजर नहीं आता है। अगर राज्य में वैश्विक कंपनियों को प्रवेश देना ही है, और जिसके लिए ये कंपनियाँ लालायित हैं, तो क्यों ना जनता को सीधे उनके साथ मोल-भाव करने के लिए मजबूत किया जाए? और उसका सबसे अच्छा तरीका तो यही है कि जनता के हाथ से सरकारी बेड़ियाँ खोल दी जाएँ। अर्थशास्त्री पार्थ जे. शाह से इस मुद्दे पर बात करने पर इस दिशा में कुछ महत्वपूर्ण सुराग हाथ लगे। लैंड यूज रेगुलेशन आम तौर पर पूरे देश में लागू है, जिसके तहत जमीन के मालिक को घोषित करना पड़ता है कि वे जमीन का किस प्रकार का उपयोग करेंगे। खेती, बसोबास या कुछ और। अगर उन्होंने खेती के लिए जमीन खरीदी है, तो वे उसका कोई अन्य उपयोग, जैसे व्यवसायिक उपयोग, नहीं कर सकते। यह देखने की जरूरत है कि पश्चिम बंगाल में यह व्यवस्था कितनी लागू है और लोगों को यह अपनी संपत्ति के बारे में स्वतंत्र निर्णय लेने से कितना रोक रही है। इसके अलावा कई जगहों पर ऐसे कानून हैं, जो जमीन-मालिक को बाहरियों को जमीन बेचने से रोकते हैं। जैसे - उत्तर पूर्व, उत्तरांचल, झारखंड, आदि जगहों पर। संभव है ये कानून पश्चिम बंगाल में न हों, पर ऐसे ही और भी अन्य प्रकार के रोक-टोक हो सकते हैं। ऐसी बेड़ियों को तोड़ कर सरकार जनता को व्यावसायिक कंपनियों से सीधे तौर पर मोल भाव करने के लिए सामने ला सकती है तथा कुछ अन्य कदम के द्वारा जनता को मोलभाव करने के लिए अतिरिक्त रूप से मजबूत कर सकती है।
    आज देश भर के विभिन्न विकास प्राधिकरण, जैसे- दिल्ली विकास प्राधिकरण, हल्दिया विकास प्राधिकरण, वैश्विक कंपनियों के दलाल की भूमिका निभा रहे हैं। वह क्या करती हैं? जनता की जमीन हड़प कर वैश्विक कंपनियों को ही तो देती हैं! क्या सरकार यह सोचती है कि जनता को अपनी भूमि बेचना नहीं आता? अगर बुद्धदेव जी सचमुच चाहते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय कंपनियाँ राज्य में प्रवेश करें, तो वह तो बहुत सीधा है! कंपनियों को राज्य में जमीन खरीदने की सुविधा दीजिए। आपका जो कानून उन्हें जमीन खरीदने से रोकता है, उस कानून को फाड़ कर फेंक दीजिए। उसी प्रकार, जिस प्रकार आपने हल्दिया विकास प्राधिकरण द्वारा जारी अधिग्रहण नोटिफिकेशन को फाड़ कर फेंकने का आदेश दिया है। उसी तरह आप अन्य अवरोधक कानूनों को भी फाड़ कर फेंक सकते हैं। विकास प्राधिकरणों को या तो समाप्त कर सकते हैं या उन्हें जमीन की दलाली से बाहर रहने का आदेश दे सकते हैं। तीसरा उन सारे कानूनों को भी फाड़ कर फेंक दीजिए, जो एक किसान को अपनी जमीन किसी तीसरे को बेचने से रोकती है।
    इस प्रक्रिया में एक ओर जहाँ पूंजीपति धन लेकर जनता तक पहुँच जाएंगे। वहीं किसान भी पूरी तरह मोल-भाव करने की स्थिति में आ जाएंगे। अगर कंपनियाँ उन्हें आकर्षक कीमत देंगी, तो वे किसान जरूर जमीन उन्हें दे देंगे। और ना देंगे तो न दें। आपको क्या?
    रही बात किसी छिपे या व्यक्तिगत फायदे की, तो उस पर सरकार की नजर नहीं होनी चाहिए। जनता सरकार को इतना तो कर दे ही देती है कि सरकार, मंत्रियों एवं सरकारी कर्मचारियों का पेट भी भर जाए और अन्य ऐशो-आराम की ख्वाहिशें भी पूरी हो जाएँ। जनता उन्हें अपना कीमती मत देकर इसलिए तो नहीं भेजती कि वे किसी छिपे स्रोत से धन कमाने की फिराक में जनता का कबाड़ा कर डालें। तो बुद्धदेव जी अपना पाला सपष्ट करें। या तो पूरी तरह इधर आएँ, या पूरी तरह उधर जाएँ। जनता को कुछ साफ-साफ समझने दें। वरना इस भ्रम की सी स्थिति में जनता कन्फ्यूज हो रही है और आपके कर्मचारी तथा अनुयायी लुटेरे बन रहे हैं।

इकोनॉमी इंडिया (मार्च 2007)
संजय कुमार साह