प्रतिभाएं और आर्थिक विकास

वोक्स यू (VoxEU) में जीसस फेलिप, उत्सव कुमार और आर्नेलिन एबडन का एक आकर्षक लेख प्रकाशित हुआ है, ‘चीन और भारतः सबसे अलग दो धुरंधर’ (china and India: Those two big outliers)। इस लेख में वे इस रोचक तथ्य का जिक्र करते हैं कि जब बात निर्यात को व्यावहारिक बनाकर परिष्कृत करने, उसमें विविधता लाने की आती है तो भारत और चीन उनके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लिहाज से काफी समझदार दिखते हैं। निर्यात में विविधता का जो सबूत वे पेश करते हैं, वह काफी चौंकाने वाला है-

वर्ष                चीन           भारत
1962            105           71
2007            265           254
परिवर्तन (गुना)   2.52          3.58

भारत के मामले में 1962 में, भारत के आर्थिक आत्मनिर्भरता के दिनों में, ‘तुलनात्मक तौर पर बेहतर लाभ वाली’ 71 वस्तुएं निर्यात की जाती थीं। 2007 तक यह आंकड़ा 3.58 गुना हो चुका था। पीपीपी के आधार पर प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद के समान स्तर पर भारत और चीन(निर्यात विविधता के लिए बहुत ज्यादा लागत के साथ) अन्य देशों की तुलना में बाजार से दूर रहकर भी (outlier) बेहतर स्थिति में दिखाई देते हैं।

अस्वाभाविक निर्यात विविधता का खुलासा:

निर्यात में विविधता का एक कारण तो जाहिर तौर पर बड़ा आकार ही है। भारत में बेहतर परिस्थिति वाले स्थानों की कोई कमी नहीं है। गुजरात का समुद्र तट से सटा इलाका तेल के निर्यात के लिए एक बेहतरीन स्थान है। बिहार निर्यात के लिए लीची उत्पादन के लिहाज से बेहतरीन है। दोनों एक ही देश में होने के कारण हमें निर्यात में स्वाभाविक तौर पर बहुत ज्यादा विविधता की गुंजाईश हासिल हो जाती है। उनके ग्राफ (चित्र 2) का एक सामान्य सा अध्ययन भी मुझे इस अनुमान के समर्थन पर सोचने को मजबूर कर देता है-ग्राफ में बाजार से परे होकर भी सकारात्मक भूमिका अदा करने वाले अमेरिका और जर्मनी बड़े देश हैं, इस मामले में नकारात्मक देश आयरलैंड और फिनलैंड की तरह छोटे हैं।

निर्यात के असाधारण परिष्करण का खुलासा (explaining the unusual export sophistication):

आखिर भारत इसके प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद की तुलना से ज्यादा परिष्कृत निर्यात कैसे क्या कर लेता है?

आकार का अपना महत्व होता है। एक विशेष तरह के ज्ञान के देश के लोगों में मौजूदगी पर विचार कीजिए। मान लीजिए कि आप किसी क्षेत्र विशेष में बड़ी कंपनी बनाने के लिए काबिलियत का एक ऊंचा मापदंड कायम करते हैं। तो अगर आप उस क्षेत्र में बड़ी कंपनी बनाना चाहते हैं तो आपको ऐसे 1000 लोगों की जरुरत होगी जो उस क्षेत्र में आपके द्वारा तय ऊंचे मापदंडों पर खरे उतरते हों। 1.2 अरब लोगों की आबादी वाले देश में आप इसी मापदंड से ज्यादा लोगों को खोज निकाल सकते हैं। सो अगर अधिकांश लोगों का ज्ञान का स्तर निर्धारित मापदंड से कम भी हो, तो भी इतनी बड़ी आबादी से आवश्यक विशेषज्ञता वाले लोग तो मिल ही जाएंगे।

बुद्धिमानी के स्तर (आईक्यू) के वितरण की बात करें। प्रति हजार में एक व्यक्ति का आईक्यू 146 से ऊपर है। आपमें सहजबोध के लिए 1450 का जीआरई वी+क्यू ही लगभग 146 के आईक्यू के बराबर हो जाता है। तकरीबन 1.2 अरब की आबादी वाले भारत में, हमारे पास इस तरह के 12 लाख लोग हैं। देश में मौजूद ये 12 लाख बेहद चतुर लोग बहुत आला दर्जे की कंपनी के गठन के लिए जरूरी केंद्रीय आधार बन सकते हैं। जब हम उत्पादन को बढ़ाते हैं और मेटकाफ के नियम का संचालन करते हैं, तो यह प्रभाव देश के भीतर इन्हीं लोगों के बीच संवाद और प्रतिस्पर्धा की बदौलत और अधिक सुस्पष्ट हो जाते हैं।

भारतीय मानव संसाधन में एक विषम ऊपरी सिरा है। 100 साल पीछे मुड़कर देखें तो भारत में बहुत ज्यादा कुशल लोगों वाला असमान्य ऊपरी सिरा था। रामानुजन के बारे में सोचिएः अगर न्यायपूर्ण तरीके से बात की जाए तो भारत जैसी जगह इतने अविश्वसनीय ज्ञान की कल्पना नहीं की जा सकती। लेकिन आजादी से पहले के भारत में रामानुजन, सी.वी. रमन, एस.एन.बोस और सी.आर.राव जैसी अविश्वसनीय प्रतिभाएं थीं-आईआईटी के गठन से भी काफी पहले। क्या यह केवल आकार के कारण संभव हुआ या फिर वाकई कोई ऊपरी सिरा मौजूद था?

इस विषय पर जिष्णु दास और त्रिस्तान जेजोंक की लिखी हुई ‘इंडिया शाइनिंग एंड भारत ड्राउनिंगः कम्पेयरिंग टू इंडियन स्टेट्स टू द वर्ल्डवाइड डिस्ट्रीब्यूशन इन मैथेमेटिक्स’ को देखें। कुछ दिलचस्प तथ्य लेंट प्रिशेट और मार्टिना वियारेंगो की ‘प्रोड्यूसिंग सुपरस्टार्स फॉर द इकानॉमिक मुंडियालः द टीम इन द टेल’ में मौजूद हैं। इन्होंने कई देशों के 15 वर्ष से कम उम्र के छात्रों को 625 अंक से अधिक के ओईसीडी पीसा स्कोर के मापदंड से नाप कर देखा है। अमेरिका में इस मामले में छात्रों की संख्या 240,00 से लेकर 270,000 के बीच है। भारत के पास (ए) ढेर सारे लोग, (बी) बेहद गरीब तंत्र और (सी) एक चौंकाने वाला ऊपरी सिरा है। इनको मिलाकर वे अनुमान लगाते हैं कि भारत में इस क्षेत्र विशेष 100,000 से लेकर 190,000 लोग हैं, जो कि भारत के प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जो अमेरिका का 1/30 है) से बहुत प्रभावशाली है। यह हमें यह भी बताता है कि हमें भारत में विश्वविद्यालयों का स्तर सुधारना होगा, ताकि हर साल कम से कम दो लाख लोग विश्वस्तरीय स्नातकपूर्व शिक्षा हासिल कर सकें-इन प्रतिभाओं का कम इस्तेमाल वाकई शर्मनाक है। (एक खास बात-625 से कम का पीसा स्कोर तो 146 के आईक्यू से भी कमजोर स्थिति है)

कुछ लोग भारत में उपलब्ध मानव पूंजी में असमानता का रोना रोते हैं, यानी ऊपरी सिरे और रुपात्मक मूल्य (modal value) के बीच के अंतर का। लेकिन हमारे कम प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद को देखते हुए हमारे पास क्या होना चाहिए, हर किसी के कम कुशल होने के बावजूद समानता या ज्ञान के वितरण के लिहाज से एक ऊपरी सिरा, जो नई प्रौद्योगिकी और वैश्वीकरण को सीखकर देश को आगे बढ़ने की ताकत दे? इसका संबंध अलबर्ट हशर्मैन के असंतुलित विकास सिद्धांत से भी है। उनका तर्क है कि विकास में ‘असंतुलित’ क्षमता (उदाहरण के लिए भारत और सॉफ्टवेयर उद्योग, जिसे बेहद आला दर्जे की क्षमता वाले छोटे से आकार के लोगों का समूह चलाता है) विकसित करता है और फिर बाकी के तंत्र को लाभ (उदाहरण के लिए, टेलीकॉम सुधार, बड़े पैमाने पर कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग शिक्षा, भारत के बाहर स्थित वैश्विक कंपनियों को चलाने की कारोबारी क्षमता) पहुंचाता है।

एनबीईआर के एक ताजा आधारपत्र में एरिक ए. हानुशेक और लुजर वोसमैन ने रॉकेट साइंटिस्ट या आधारभूत शिक्षा के बीच समझौते भरे तालमेल का रोचक उदाहरण पेश किया था। वे कहते हैं-आधारभूत कौशल और सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दोनों ही शिक्षा के दो सिरे हैं, दोनों ही अलग-अलग तौर पर विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। तीसरे स्तंभ के अनुमानों के मुताबिक आधारभूत शिक्षा तक दस फीसदी लोगों की पहुंच बढ़ाने पर उच्च शिक्षा में 0.3 फीसदी का इजाफा देखा जाता है। जो वार्षिक विकास में 1.3 फीसदी की बढ़त से जुड़ा है।

बेहतरीन प्रदर्शन करने वालों की भागीदारी का प्रभाव उन देशों में ज्यादा है जो शुरुआती दौर मे बहुत ज्यादा उत्पादक रहे देशों (स्तंभ पांच) की बराबरी कर लेने की ज्यादा संभावना रखते हैं। ये परिणाम मानव पूंजी और विकास के पहले चर्चित मॉडलों से मेल खाते हैं। एक मानक उत्पादन कारक के दौर पर कौशल का विकास, संवर्धित मान्य विकास मॉडल (augmented neoclassical growth model) के साथ (उदाहरण के लिए मैनकिव, रोमर और वेल-1992) मिलकर, शायद सबसे बेहतर आधारभूत-साक्षरता में दिखाई देता है, जिसका इस आकार के सभी समान देशों में असर पड़ता है।

लेकिन तकनीकी सीमा से परे देशों में ज्यादा स्तर के कौशल का ज्यादा विकास पर प्रभाव तकनीकी विस्तार मॉडल (उदाहरण के लिए नेलसन और फेल्पस-1966) सबसे ज्यादा सुसंगत है। इस दृष्टिकोण से तो देशों को एक छद्म रणनीति (imitation strategy) के लिए देशों को ज्यादा कौशल वाली मानव पूंजी की जरुरत है। साथ ही जिन देशों में बेहतर प्रदर्शन करने वाले छात्रों की संख्या ज्यादा होती है, वहां पर आर्थिक अभिसरण (economic convergence) की प्रक्रिया ज्यादा तेज होती है। ज्यादातर देशों ने आधारभूत कौशल या फिर इंजीनियरों और वैज्ञानिकों पर ही ध्यान केंद्रित कर लिया है। विकास के लिए, हमारे अनुमान के मुताबिक, आधारभूत कौशल और बेहद प्रतिभावान लोग एक-दूसरे को मजबूती देते हैं। साथ ही, सभी के लिए आधारभूत शिक्षा उन लोगों की पहचान के लिए पूर्व शर्त की तरह हो सकती है, जो ‘रॉकेट साइंटिस्ट’ बनने का दम रखते हों। दूसरे शब्दों में आधारभूत कौशल वाले छात्रों के बीच स्पर्धा बड़े पैमाने पर बेहतर प्रदर्शन करने वाले लोगों को हासिल करने की दिशा में एक कारगर कदम साबित हो सकत है।

साथ ही यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि शून्य से शुरुआत करने के बाद आला दर्जे का दूसरा सिरा तैयार करना बहुत-बहुत मुश्किल काम है। चीन की दिक्कतों को देखिए, जिसे सांस्कृतिक क्रांति के दिनों में शीर्ष पंक्ति को खत्म करना आज कितना महंगा पड़ रहा है। जब हमारा अर्थतंत्र एक खास तरह के कौशल की जरुरत के मुहाने पर खड़ा हो तो इस अंतर को पाटने के लिए दशकों लग सकते हैं। उदाहरण के लिए, 1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक की शुरुआत में ही यह साफ हो गया था कि सॉफ्टवेयर और बीपीओ के क्षेत्र में भारतीयों के लिए ढेर सारे मौके उपलब्ध होंगे। लेकिन इस स्तर के कौशल को तैयार करने के लिहाज से हमारी शिक्षा पद्धति को ढालने में हमें दस साल लग गए। उसके बाद ही हमने बड़ी संख्या आईटी और आईटीएस निर्यात किया। इसी तरह एनडीए ने 2003 में आधारभूत ढांचे पर जब खर्च बढ़ाना शुरू किया तो, विकास बजाज के न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित लेख के अनुसार, हमारे पास सिविल इंजीनियरों की कमी देखने को मिली। आर्थिक विकास में भविष्य की जरुरतों के लिहाज से आला दर्जे की कुशलता पहले से ही हासिल कर लेना काफी सुविधाजनक होता है। ऊंची विकास दर के आगमन से पहले ही।

इस पोस्ट में तर्क आकार पर आधारित रहा है। आकार के बारे में और भी बहुत सी अच्छी बातें हैं। जैसे घरेलू अर्थव्यवस्था में पैमाने की अर्थव्यवस्था (economy of scale), किसी देश से कारोबार के लिए जानकारी हासिल करने में भी विश्वस्तर की कंपनियों को एक तय लागत का भुगतान। अगर आकार का आर्थिक विकास में इतना ही महत्व है तो आखिर अब तक यह नाकामयाब क्यों रहा है-जहां तक 2010 तक की बात है तो प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद के लिहाज से भारत और चीन क्यों ओपीईडी से बहुत पीछे हैं?
एक महत्वपूर्ण बात वैश्वीकरण हो सकती है। बड़े देशों को लगता है कि वे आत्मनिर्भरता की नीतियों से काम चला सकते हैं। वे खुद को आत्मनिर्भर मानकर दीन-दुनिया से अलग रह सकते हैं। छोटे देशों के नीति निर्माताओं को नहीं लगता कि घरेलू कार उद्योग निर्माण के लिए उनके पास कोई विकल्प है, लेकिन उनके ब्राजील या भारत या फ्रांस में मौजूद समकक्ष सोचते हैं कि वे औद्योगिक नीति को अपने लिहाज से तोड़-मरोड़ सकते हैं। एक बार यह समस्या हल हो जाए तो-लगता है कि भारत और चीन में ऐसा ही है जहां उद्योग में तो उदारवाद आ गया है पूंजी के मामले में ऐसा नहीं हुआ है-बड़े देश आजकल आत्मनिर्भरता की खुशफहमी से बंधे नहीं होते। साथ ही वैश्वीकरण से जुड़ने के साथ ही परिणाम भी विश्वस्तरीय होते हैं और यह आकार के कुछ आयामों के लिए मददगार होता है।

लेंट प्रिशेट ने जिस एक और बात पर जोर दिया है वो यह है कि भारत एक सामूहिक बाजार नहीं है और इस वजह से उसने आकार के कारण संभावित लाभ को गंवा दिया है। इसके विपरीत अगर हम भारत के भीतर माल, सेवाओं, पूंजी और श्रम के आवागमन को कानूनी और करीय बाधाओं से आजाद कर दें और परिवहन और संचार के आधारभूत ढांचे पर बड़े पैमाने पर ध्यान दें तो हम वह आकार हासिल कर लेंगे जो 2000 से पहले के भारतीय सकल घरेलू उत्पाद आंकड़ों में दिखाई नहीं देता।

अंत में, आकर और परिष्कृत प्रौद्योगिकी के संस्कृति की सामाजिक विकास में भूमिका के लिए देखें ‘इनसफिशियंट डेटा ऑन चार्लीज डायरी।’ इस पोस्ट को बेहतर बनाने के लिए मैं लेंट प्रिशेट, जिशनु दास, प्रतापभानु मेहता और जोश फेलमैन का शुक्रगुजार हूं।

- अजय शाह