पुराने वित्तीय अनुशासन और लोक सेवाओं के लिए नए तरीके

मुक्त बाजार लोक प्रशासन का उदाहरण: कूडा करकट की सफाई का काम।

समाजवादी इस काम को बडे ब्यूरो के माध्यम से करते हैं। वे हजारों झाडू लगाने वालों को बहाल करते हैं, सैकडों ट्रक और झाडू खरीदते हैं। यदि हम उनके ब्यूरो प्रमुख के कार्यों का परीक्षण करें तो देखते हैं कि ब्यूरो का अधिकतर समय इस कार्य की प्रक्रिया को पूरा करने में खर्च होता है, जैसे: ट्रक और झाडू की खरीदारी, भर्ती, अनुशासन, छुट्टियां, यूनियन एवं अन्य इसी तरह के कार्य। ब्यूरो की इस पूरी प्रक्रिया का परिणाम क्या निकला, यह देखने का उनके पास समय नहीं होता। वास्तव में, वे यह नहीं देख पाते कि शहर में सफाई कितनी हो रही है।

इसलिए समाजवादी नौकरशाही तरीके से काम करने में खर्च ज्यादा होते हैं और नतीजे कम निकलते हैं। अब नव लोक प्रबंधन (न्यू पब्लिक मैंनेजमेंट) (एनपीएम) पर नजर डालें।

एनपीएम अनुबंध आधारित काम का सुझाव देता है। इसमें शहर प्रबंधक का काम सिर्फ यह होता है कि वह अनुबंध तैयार कर पार्टी को दे दे और यह निगरानी रखे कि निर्धारित मानदंडों के अनुसार काम हो रहे हैं या नहीं। वास्तव में, उसके पास यह देखने का काफी समय होता है कि शहर की उचित तरीके से सफाई हो रही है या नहीं। इसके अलावा इसमें प्रतियोगिता एवं विकल्प होते हैं जो मुक्त बाजार की आधारभूत जरूरत है। कार्य बेहतर ढंग से और कम खर्चे में होते हैं और साथ ही ज्यादा नियंत्रित तरीके से भी होते हैं।

समाजवादी ब्यूरो में कार्य निश्चित रूप से अनियंत्रित होते हैं। एनपीएम में सिर्फ एक अच्छे व्यक्ति की जरूरत होती है जो यह देख सके कि बाजार अनिवार्य लोक सेवाएं उपलब्ध करा रहा है या नहीं। एनपीएम सिद्धांतों को लगभग सभी क्षेत्रों (शिक्षा से स्वास्थ्य तक) में आजमाया जा सकता है कई अनिवार्य कारण हैं जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि एनपीएम को भारतीय लोक प्रशासन में अपनाया जाना चाहिए।

कारण

अधिक बजट से निपटने की जरूरतों से एनपीएम की उत्पत्ति हुई। यह भारत की आधारभूत समस्या है और इससे जितना ही ज्यादा निपटने का प्रयास होता हैं हम समाधान से उतनी ही दूर होते जाते हैं। लोक चयन सिध्दांतों से एनपीएम आंदोलन को बल मिला। मुक्त बाजार अर्थशास्त्री यह मानकर चलते हैं कि सभी मनुष्य विवेकी हैं और अपना हित चाहते हैं। लोक चयन सिद्धांत ने इस धारणा का विस्तार राजनीति शास्त्र तक किया। इसने माना कि नौकरशाह और राजनीतिक भी लोगों की तरह आत्महित चाहने वाले होते हैं। लोक चयन द्वारा ही यह स्पष्ट हुआ कि नौकरशाह भी बहुत हद तक वैसे ही सोच-समझकर बजट में वृद्धि करते हैं जैसे व्यवसायी अपने लाभ को बढाते हैं। जिन देशों में बजट की समस्या हो वहां एनपीएम सबसे उचित व्यवस्था है। पिछले 20 वर्षों से लोक प्रशासन पर यह मुद्दा हावी है। सिर्फ भारत को छोडकर!

मुक्त बाजार का नौकरशाही के प्रति असहानुभूतिपूर्ण रुख, कोई नया नहीं है। लुडविग वॉन मिसेस ने चालीस के दशक के दौरान कहा था कि नौकरशाही प्रतिभांपन्न युवाओं के लिए कब्रगाह के समान है क्योंकि इसमें युवाओं को निरंतर उम्रदराजों के अधीन रहकर काम करना होता है। मिसेस ने कहा था कि प्रबंधन के दो तरीके हैं: नौकरशाही प्रबंधन और लाभ के प्रबंधन। उन्होंने कहा कि समाज को तब लाभ ज्यादा होता है, जब लाभ के प्रबंधन को ज्यादा काम करने दिया जए। इसलिए भारत के नौकरशाही प्रबंधन पर अत्यधिक भरोसे के तीन गंभीर परिणाम हुए हैं: बजट की अधिकतम सीमा पार कर जाना, उम्रदराजों का शासन एवं घटिया लोक सेवाएं।

लोक सेवाएं

लोक प्रशासन एवं प्रबंधन दोनों समान ही विषय हैं। एनपीएम प्रबंधन में हो रहे कुछ स्पष्ट प्रचलनों से प्रभावित हुआ। वैश्वीकरण ने निगमों के कार्यों को बिलकुल ही समाप्त कर दिया। इस तरह कि खिलौनों की कंपनियों के विपणन कार्यालय न्यूयार्क में होते थे और वे अपना सारा उत्पाद अनुबंध के आधार पर पूर्व में दूसरी पार्टियों से करवाते थे। खेल के जूतों एवं कपड़ों तक की कंपनियाँ इसी ट्रेंड को अपनाने लगी। कौशल वाले कार्य जैसे-संपादन और प्रूफरीडिंग का काम घरों में और प्रिंटिंग तक का काम अनुबंध पर होने लगे। मुक्त बाजार लोक प्रशासन के लिए यह सब कुछ अनुकरणीय था।

भारत जैसे देशों में इसे अपनाने से काफी लाभ होगा जहाँ नौकरशाही सेवाएं एक काम भी ठीक ढंग से नहीं करतीं और लोक निधि का एक बडा हिस्सा अपने लिए इस्तेमाल कर लेती हैं, बजट की सीमाएं अक्सर पार कर जाती है। राजनेता वित्तीय घाटे पर न तो नियंत्रण रख पाते हैं और न यह सुनिश्चित कर पाते हैं कि लोकसेवाओं का काम ठीक ढंग से हो रहा है या नहीं। लेकिन हमें अकसर यह देखने को मिल जाता है कि राजनीतिक स्वयं हाथ में झाडू उठाकर सफाई अभियान की शुरूआत कर रहे हैं। उन्हें सफलता मिल जाएगी यदि मुक्त बाजार के सिद्धांतों को प्रशासकों में प्रचलित कर दिया जाए। जहां शहरी स्थानीय सरकार है वहां भी यह शुरूआत होनी चाहिए। 50 वर्षों से हमारे प्रशासक सिर्फ ग्रामीण विकास में लगे हुए हैं। राजनीतिक नौकरशाही का इस तरह का प्रबंधन पूरी व्यवस्था को खराब कर रहा है। ऐसा करके उन लोगों ने शहरी क्षेत्रों की अवहेलना की है जहां से हमारे लिए धन का सृजन होता है और जहां जनसंख्या बहुत ज्यादा है: यहाँ लोक सेवाओं की जरूरत है। एक बडे शहर में जिले बने हुए हैं और इसके न्याय क्षेत्र में तीन चार छोटे-छोटे कस्बे आते हैं। हमारे प्रशासकों ने इन सबकी बहुत बर्बादी की है। भारत के सभी कस्बों एवं शहरों की पूरी तरह से बर्बादी समाजवादी प्रशासन की एकमात्र उपलब्धि है। इस समय शहरों के पुननिर्माण की जरूरत है। हमारी समृद्धि के लिए शहरों को पुन: उत्पादन योग्य बनाना बहुत जरूरी है।

एनपीएम के सिद्धांतों में दक्ष एवं अनुबंध को तैयार कर इसे लागू करने में निपुण शहर प्रबंधकों को भारतीय प्रशासनिक अधिकारियों का स्थान अवश्य ही लेना चाहिए जो अब तक शहरी प्रबंधन के लिए जिम्मेदार हैं। ब्रिटेन में दक्ष नौकरशाही का स्थानीय सरकारों के कार्यों में कोई हस्तक्षेप नहीं होता। उनका स्थान सिर्फ व्हाइट हॉल तक ही सीमित है। लेकिन हमारे नौकरशाहों ने स्थिति बिलकुल बदल दी है। भारतीय प्रशासनिक अधिकारियों का जिक्र करते हुए, जो अफ्रीका के समाजवादी देशों के अधिकारियों के समतुल्य हैं, और जो विकास के लिए बाजारों नहीं बल्कि राज्यों का चयन करते हैं, जॉर्ज वी एन अयट्टी प्राय: टिप्पणी करते हैं कि ये प्रशासक वास्तव में कार्यात्मक रूप से निरक्षर हैं। ज्ञान के अभाव के दृष्टिकोण से देखें तो जो हाल भारतीय प्रशासन में है वही हमारे नौकरशाहों पर लागू होता है।

राजनीतिक अर्थव्यवस्था

राजनीतिक अर्थव्यवस्था के बारे में जानकारी नहीं होने के कारण कार्यात्मक अज्ञानता की समस्या होती है जो अच्छे शासन के लिए घातक है। भारतीय प्रशासनिक अधिकारी समाजवाद को इसलिए अपनाए हुए हैं क्योंकि इससे उनका कद ऊँचा होता है। आईसीएस अधिकारी उच्चस्तरीय राजनीतिक अर्थशास्त्र में लगे हुए हैं। प्रोफेसर ए.एस. अंबीराजन के उत्कृष्ट अध्ययनों से यह बात स्थापित हुई है। गर्वनर जनरल और जिला समाहर्ताओं के बीच होने वाले पत्र व्यवहारों में भी उत्कृष्ट राजनीतिक अर्थशास्त्र होते हैं। आईसीएस अधिकारी इस उत्कृष्ट राजनीतिक अर्थशास्त्र का ज्ञान बाँटने के उद्देश्य से बुक क्लब चलाते है और बुद्धिजीवियों की पत्रिकाओं में इस पर लेख लिखते हैं। उनकी नीति संबंधी प्राथमिकताएं बाजार की ताकतों को प्रोत्साहित करने की तरफ उनके झुकाव को दर्शाती हैं। आईएएस अधिकारी झुग्गी झोपडियों के विकास पर करोडों रुपये खर्च करते हैं लेकिन कम किराये वाले घरों के लिए बाजार को प्रोत्साहित नहीं करते। वे यह नहीं जानते कि झुग्गी झोपडियों के कारण किराया नियंत्रण है। राजनीतिक अर्थवयवस्था संबंधी उनकी अज्ञानता के कारण वे एक अर्थशास्त्र संबंधी गलती को राजनीतिक समस्या बना देते हैं। वे गंदी बस्तियों के मालिकों में निवेश करते हैं जो राजनीतिक रूप से प्रायोजित होता है। वे दिल्ली समेत कई शहरों में घरों की आपूर्ति पर एकाधिपत्य को प्राथमिकता देते हैं।

मुक्त बाजार, लोक प्रशासन समाजवादी राज्यों एवं इसके विशिष्ट प्रशासकों को कठोर एवं बौद्धिक चुनौती देता है। सर्वोच्च को निदेर्शित करने के लिए चयनित ये प्रशासक अपने कार्यों में बुरी तरह विफल हुए हैं और शहरों में नई शुरूआत के लिए इन्हें तुरत बदल देना चाहिए। ये शहर हमारे आर्थिक संसाधन हैं और इनका प्रबंधन वैध प्रशासनिक सिद्धांतों के बगैर उन लोगों पर नहीं छोडा जा सकता है।

सौविक चक्रवर्ती