निजी स्कूलों की मोनोपॉली समाप्त कीजिए

गरीबों को भी पढ़ाना है। समाज में आगे बढ़ाना है। इस बात पर शायद ही किसी को ऐतराज हो। सरकार, न्यायालय, मीडिया और सामाजिककर्मी सब इस राय से सहमत हैं तथा अपने-अपने स्तर से इसके लिए प्रयास कर रहे हैं। पर दिल्ली के अनएडेड प्राइवेट सकूलों को शायद यह मंजूर नहीं। इसलिए सरकार से सब्सिडाइज्ड दर पर जमीन लेने तथा उसके लिए गरीबों को 20 प्रतिशत आरक्षण देने की अनिवार्य शर्त के प्रावधान के बावजूद वे इसे मानने में कोताही बरत रहे हैं। यही नहीं, ये निजी स्कूल अपनी पूरी मोनोपॉली के साथ दूसरे कई प्रावधानों की भी धज्जियाँ उड़ाते नजर आते हैं।

पिछले दिनों सोशल जूरिस्ट नाम की संस्था की शिकायत पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने इन अनएडेड निजी स्कूलों को कड़ी फटकार लगाई। उच्च न्यायालय ने यहाँ तक कहा कि ये स्कूल अब सही मायने में स्कूल नहीं रह गये हैं, बल्कि दुकान बन गये हैं। इनका उद्देश्य सिर्फ पैसा बनाना तथा गरीबों को मुफ्त शिक्षा संबंधी नोटिफिकेशन की अनदेखी करना है।'' राजधानी में इस वक्त 385 स्कूलों को सब्सिडी पर जमीन दी गई है। दिल्ली सरकार ने इस साल फरवरी में नोटिस जारी कर सभी स्कूलों में गरीब छात्रों के लिए 20 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य कर दिया है। पर ये स्कूल आरक्षण संबंधी प्रावधान लागू करने में विफल रहे।

स्कूलों में गरीबों को जगह दिलाने के लिए सोशल जूरिस्ट, न्यायालय तथा सरकार के प्रयासों की सराहना की जानी चाहिए। पर इस सोच की सर्वमान्यता के बावजूद आखिर क्या कारण है कि निजी स्कूल इसे अपने यहाँ लागू करने में कोताही बरत रहे हैं? क्या उन्हें सरकार, न्यायालय और जनमत का भय नहीं? या फिर गरीबों को स्कूलों में जगह दिलाने का यह फार्मूला ही सही नहीं है? कहीं ऐसा तो नहीं कि समाज में स्कूल मोनोपॉली वाली स्थिति में है, इसलिए मनमानी करने से इन्हें कोई रोक नहीं पाता? आखिर गरीबों को स्कूलों में जगह दिलाने का व्यावहारिक और कारगर नुस्खा क्या हो सकता है?

क्या टेलीफोन क्षेत्र में हुई क्रांति इस दिशा में कोई रास्ता दिखाती है? पाँच-सात साल पहले सरकारी टेलीफोन वाले राज की याद अभी ताजा है। दिल्ली ही नहीं देश भर में एमटीएनएल, बीएसएनएल, वीएसएनएल जैसी सरकारी टेलीफोन कंपनियों की चौधराहट थी। इसे कोई उपभोक्ता चुनौती नहीं दे सकता था। छठ, दशहरा, होली, दिवाली के अवसर पर लाइनमैन रिश्वत लेने पहुँच जाया करते थे। टेलीफोन लगाने के लिए रिश्वत, गड़बड़ी ठीक करने के लिए रिश्वत। हर मौके के लिए रिश्वत एक मान्य नियम था। लेकिन जब इसे अन्य निजी टेलीफोन कंपनियों से चुनौती मिली और उपभोक्ता को एक को छोड़कर दूसरे को पकड़ने का विकल्प मिला, तो सरकारी टेलीफोन के अधिकारियों से लेकर लाइनमैन तक सब लाइन पर आ गए। जहाँ निजी टेलीफोन कंपनियों से मिली प्रतियोगिता ने सरकारी कंपनियों में भ्रष्टाचार तथा लेटलतीफी खत्म की, वहीं सरकारी मोबाइल डॉल्फिन तथा गरुड़ ने निजी क्षेत्र की मोबाइल कंपनियों को चुनौती दी तथा उन्हें अपना रेट कम करने को मजबूर कर दिया। इस आपसी प्रतियोगिता ने न सिर्फ भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी खत्म की, वरन् मोबाइल तथा बुनियादी फोन को गाँव-गाँव तथा गरीबों-वंचितों तक पहुँचा दिया।

क्या टेलीफोन क्षेत्र वाली यही प्रतियोगिता शिक्षा क्षेत्र में है? बिल्कुल नहीं। यहाँ तो स्कूलों की पूरी मोनोपॉली है। जब बच्चे का दाखिला कराने के लिए माता-पिता हजारों रुपये का डॉनेशन शुल्क लेकर निजी स्कूल के आगे हाथ जोड़कर खड़े रहते हैं। तो पता चलता है कि इन निजी स्कूलों का एकक्षत्र राज है। सरकारी स्कूलों में तो आज रिक्शा वाले भी अपने बच्चों को नहीं पढ़ाना चाहते। पर निजी स्कूलों में जगह कहाँ है? जब ये निजी स्कूल एक-एक माता-पिता का साक्षात्कार लेते है, तब पता चलता है कि वास्तव में समाज में उनकी पूरी दादागीरी है।

वस्तुत: पढ़ने वाले बच्चों की संख्या जितनी है, उसकी तुलना में निजी स्कूल बहुत कम हैं। इसलिए उनकी मोनोपॉली है। जब माता-पिता हजारों रुपये का डोनेशन लेकर लाइन में खड़े हों, तो कोई स्कूल गरीबों को 20 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान पर अमल भला कैसे कर सकता है। वे अधिकारियों को रिश्वत देकर आसानी से निकल सकते हैं। इस तरह गरीब के हित में प्रावधान होने के बाद भी गरीबों को उसका कोई लाभ नहीं मिल पाता। जरूरत यह है कि निजी सकूलों की संख्या बढ़ाई जाए तथा सरकार जो पैसा नये स्कूल खोलने में लगाना चाहती है, वह गरीबों के हाथ में दे दिया जाए।

जो लाइसेंस परमिट कोटा-राज 1991 में औद्योगिक क्षेत्र से हटा लिया गया, शिक्षा क्षेत्र में वह आज भी कायम है। निजी विद्यालय खोलने के लिए तमाम अनावश्यक कार्रवाइयों से गुजरना पड़ता है। जो गुणवत्तापूर्ण नये विद्यालय खुलने की राह में बाधा खड़ी करता है। बाधाओं को हटाकर यदि सरकार निजी विद्यालय खुलने हेतु उत्साहवर्धक और कम खर्चीला माहौल बनाए, तो विद्यालय की संख्या में तेजी से वृद्धि होगी। स्कूल एवं विद्यार्थियों का संतुलन ठीक हो जाएगा और स्कूलों में विद्यार्थियों को खींचने की वही प्रतियोगिता शुरू हो जाएगी, जो आज टेलीफोन-मोबाइल क्षेत्र में चल रही है। इस प्रकार निजी स्कूलों को सरलता से नम्र बनाया जा सकता है।

दूसरी ओर सरकार नये-नये असफल सरकारी विद्यालयों की गिनती बढ़ाने की बजाए, उस पर खर्च होने वाला वही पैसा गरीबों के हाथ में दे दे, तो इन पैसों के बल पर गरीब खुद निजी विद्यालय में दाखिला लेने में समर्थ हो जाएंगे। दिल्ली स्थित एक थिंक टैंक सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी इस दिशा में अद्भुत प्रयोग कर रही है। उसने दिल्ली के गरीब इलाके की छानबीन कर पाया कि वहाँ निजी स्कूल सरकारी स्कूलों से बेहतर शिक्षा दे रहे हैं। ये निजी स्कूल नाम मात्र का शुल्क लेते हैं। पर जो गरीब इतना व्यय नहीं कर सकते, वे मजबूरी में उन सरकारी विद्यालयों में बच्चों को भेजने के लिए विवश हैं, जहाँ वस्तुत: कोई पढ़ाई ही नहीं होती। संस्था देश भर में चलाये जा रहे अपने अभियान के तहत कुछ चुने हुए गरीबों को 300 रुपये प्रतिमाह शिक्षा वाउचर के रूप में देने जा रही है। इस वाउचर के बल पर ये गरीब इतना ही शुल्क लेने वाले किसी भी निजी विद्यालय में जा सकते हैं और ऐसे में उन्हें आसानी से स्कूलों में दाखिला मिल सकता है, क्योंकि उनके हाथ में पैसा है। उन्हें किसी आरक्षण की जरूरत नहीं। यद्यपि यह प्रयोग अभी शुरुआती अवस्था में है, पर आंखें खोलने वाला है।

सरकार यदि नये निजी विद्यालय खुलने की राह के रोड़े समाप्त करे तथा गरीबों के हाथ में सीधे पैसे देकर उसे निजी विद्यालयों में दाखिला लेने में समर्थ बनाए, तो आसानी से गरीबों को स्कूलों में पहुँचाया जा सकता है।

(6 जून 2007)
संजय कुमार साह

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