खुशबू की आत्महत्या: हत्यारी शिक्षा व्यवस्था

शिक्षा व्यवस्था का दायरा इतना व्यापक हो, जिसमें प्रेमचंद की भाषा-साहित्य की प्रतिभा को भी निखरने का मौका मिले तो, रामानुजम की गणितीय प्रतिभा को भी पूरा प्रोत्साहन मिले। सचिन-सानिया की खेल प्रतिभा को भी प्रोत्साहन मिले, तो बुधिया की दौड़ने की क्षमता को भी पूरा सम्मान मिले।

    सिर्फ प्राकृतिक विपदा और दुष्ट शासक ही लोगों की जान से नहीं खेलते। खुशबू की आत्महत्या आंखें खोल देने वाला एक ऐसा दर्दनाक हादसा है, जो चीख-चीख कर हमारा ध्यान गलत कानून-व्यवस्था और उस कारण होने वाली मौतों की ओर खींचती है। दिल्ली के प्रीत विहार स्थित सीबीएसई भवन की नौंवीं मंजिल से कूद कर खुशबू ने आत्महत्या कर ली। इस खबर ने पूरे देश को एकबारगी झकझोर दिया। खुशबू पिछले तीन बार से गणित में कम अंक आने के कारण दसवीं पास नहीं कर पा रही थी। आत्महत्या की यह कोई पहली घटना नहीं है। हर साल दसवीं और बारहवीं का परीक्षाफल आने के बाद आत्महत्या की कई खबरें आती हैं। और विभिन्न विधा के विशेषज्ञ आत्महत्या का अपने-अपने हिसाब से कारण खोजते हैं। पर खुशबू ने आत्महत्या से पहले लिख छोड़ी पर्ची में अपनी आत्महत्या के लिए सीधी तौर पर शिक्षा व्यवस्था को दोषी ठहराया और जिस तरह से शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए सीबीएसई भवन से कूद कर आत्महत्या की और बुद्धिजीवियों को व्यवस्था सुधार की दिशा में सोचने के लिए बाध्य किया, उससे यही कहा जा सकता है कि व्यवस्था सुधार की आवाज बुलंद करने के लिए खुशबू ने खुद का बलिदान कर दिया। इस प्रकरण से सहज ही यह सवाल उठता है कि आखिर शिक्षा व्यवस्था में ऐसी कौन सी खामियाँ हैं, जो विद्यार्थियों को निराश और हताश कर आत्महत्या करने के लिए मजबूर करती हैं।

    समसामयिक मुद्दों पर नियमित विचार श्रृंखला ''मंथन'' की तेरहवीं बहस में इन्हीं सवालों पर बहस करते हुए युवक इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि हमारी शिक्षा व्यवस्था काफी संकीर्ण है। इसमें लचीलापन नहीं है। तथा यह अधिकांश विद्यार्थियों की प्रतिभा, योग्यता तथा अभिरुचि से मेल नहीं खाती है। इसलिए अधिकांश विद्यार्थी इस व्यवस्था को एक थोपी हुई व्यवस्था के तौर पर लेते हैं। खुद को इसके अनुरूप नहीं ढाल सकने वाले छात्र निराशा तथा हीन भावना के शिकार हो जाते हैं। प्रबुद्ध लोगों का मानना है कि हर बच्चा अपनी अभिरुचि, योग्यता और प्रतिभा के हिसाब से एक दूसरे से अलग होता है। अत: उनके अंदर बेहतर करने की संभावनाएँ भी अलग-अलग दिशा में होती है। अत: हर बच्चे को शिक्षा भी उसके विशिष्ट व्यक्तित्व के हिसाब से मिलनी चाहिए। पर हमारी शिक्षा व्यवस्था का दायरा काफी छोटा है। विद्यालय में कुछ खास गिने-चुने विषय ही पढ़ाए जाते हैं। और ये सभी को पढ़ने होते हैं। ऐसे में ये विषय और व्यवस्था जिस विद्यार्थी के व्यक्तित्व के अनुकूल बैठते हैं, वह काफी अच्छा प्रदर्शन करने लगता है। पर जिनका रुझान किसी अन्य दिशा में है, वह असफल होने लगता है। सचिन तेंदुलकर या सानिया मिर्जा जैसी प्रतिभा रखने वाले विद्यार्थी निश्चित रूप से इन थोपे गए विषयों में दिलचस्पी नहीं लेंगे। और असफल हो जाएंगे। पर आधुनिक सोच रखने वाले लोग यह मानते हैं कि कक्षा में असफल होने वाले ये विद्यार्थी बिल्कुल बेकार नहीं हैं। कक्षा के सीमित दायरे से बाहर किसी अन्य क्षेत्र में ये विद्यार्थी अपनी प्रतिभा से दुनिया को चमत्कृत कर देने की क्षमता रख सकते हैं। पर हमारी शिक्षा व्यवस्था का सीमित दायरा इन्हें प्रोत्साहित नहीं कर पाता उलटे इनके अंदर हीन भावना भर देता है। क्या शिक्षा इन लोगों के लिए नहीं है? अगर शिक्षा व्यवस्था कुछ खास रुझान रखने वाले बच्चों के लिए है, तो सर्वशिक्षा अभियान द्वारा सभी को जबरदस्ती स्कूल में घसीट लाने का क्या तुक है? और अगर सर्वशिक्षा अभियान द्वारा सचमुच सभी को शिक्षित करने की भावना है, तो शिक्षा का दायरा भी इतना विशाल हो, जिसमें सारा छात्र समुदाय समा सके। शिक्षा व्यवस्था का दायरा इतना व्यापक हो, जिसमें प्रेमचंद की भाषा-साहित्य की प्रतिभा को भी निखरने का मौका मिले तो, रामानुजन की गणितीय प्रतिभा को भी पूरा प्रोत्साहन मिले। सचिन-सानिया की खेल प्रतिभा को भी प्रोत्साहन मिले, तो बुधिया की दौड़ने की क्षमता को भी पूरा सम्मान मिले। अगर व्यवस्था का हृदय इतना व्यापक है, तो ही सर्वशिक्षा अभियान चलाने का कुछ अर्थ समझ में आता है। अन्यथा हमारी शिक्षा व्यवस्था में अगर सचिन, सानिया, बुधिया जैसी प्रतिभाओं को जबरदस्ती घसीट लाया जाएगा, तो इन प्रतिभाओं को दुनिया कभी नहीं देख पाएगी। शायद यही वह कारण है कि जिन भारतीय विद्यार्थियों की प्रतिभा का लोहा दुनिया भर के उद्यमी मानते हैं, वे ही विद्यार्थी ओलंपिक-एशियाड खेलों या अन्य क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते। साथ ही गौर करने वाली बात यह भी है कि बहुत सारी ऐसी प्रतिभाएँ भी हैं, जो शिक्षा व्यवस्था से दामन छुड़ा कर कभी भाग खड़ी हुई थीं और आज दुनिया उनकी सफलता की कायल है। अगर वे इस शिक्षा व्यवस्था की सीमा में ही रहते, तो कभी भी उस ऊँचाई तक नहीं पहुँच पाते। क्या व्यवस्था और नीति निर्मातागण इन उदाहरणों से कुछ सीखेंगे? क्या ऐसी प्रतिभाओं को भाग्य भरोसे छोड़ देना चाहिए? क्या इन प्रतिभाशाली हीरे को तराशने की जिम्मेदारी हमारी शिक्षा व्यवस्था की नहीं है? क्या इन जिम्मेदारी से व्यवस्था मुँह मोड़ सकती है?

    कुल मिलाकर देखा जाए, तो हमारी शिक्षा व्यवस्था अधिकांश प्रतिभाओं का समय से पहले ही गला घोंट देती है। प्रकट रूप में तो कुछ विद्यार्थी ही आत्महत्या करते हैं। पर अधिकांश विद्यार्थी ऐसे होते हैं, जो देखने में जीवित होते हैं, पर उनके अंदर की प्रतिभा मर चुकी होती है। निस्तेज और मरियल से दिखने वाले शिक्षा व्यवस्था के मारे इन बेचारे विद्यार्थियों को देश के हर गली-महल्लों में सहज ही पहचाना जा सकता है।

    क्यों न शिक्षा व्यवस्था को इतना व्यापक बनाया जाए, जिसमें विविध व्यक्तित्व के धनी विद्यार्थी अपने-अपने हिसाब से अपनी शिक्षा का रूप चुन सकें। एक ऐसी व्यवस्था जिसमें विद्यार्थी और अभिभावक खुद तय करें कि उन्हें किस पाठयक्रम में प्रवेश लेना है। कौन-कौन से विषय पढ़ने हैं। विद्यार्थी और अभिभावक खुद सोच-विचार कर अपने पसंद का विद्यालय चुन सकें। साल भर में कब उन्हें किस विषय की फाइनल परीक्षा देनी है, वे खुद तय कर सकें। अपने सामर्थ्य के हिसाब से वे खुद तय करें कि उनकी परीक्षा की अवधि कितने घंटे की होगी। ऐसी सर्वव्यापक शिक्षा व्यवस्था ही सभी विद्यार्थियों को आकृष्ट कर पाने में सफल होगी। और इसमें हर तरह की प्रतिभा को विकास का पूरा अवसर मिलेगा। और कोई विद्यार्थी हीन भावना का शिकार नहीं होगा। हर छात्र का चेहरा गौरव के दर्प से दमकेगा। पर सवाल यह है कि कठोर नियंत्रण रूपी लकवे से ग्रस्त आज की शिक्षा व्यवस्था के स्वरूप का इतना विस्तार कैसे होगा।

    इस संदर्भ में परीक्षा में ग्रेड पद्धति का विकल्प प्रस्तुत किया जाता है। पर ग्रेड पद्धति यद्यपि सभी को पास करती है, तब भी हर विद्यार्थी को उसकी विशिष्ट प्रतिभा में आगे बढ़ने का अवसर नहीं दे सकती है। इसके परिणाम भी वही ढाक के तीन पात जैसे होंगे।

    इस संबंध में ऊर्जा मंत्रालय में काम करने वाले आलोक जहाँ शिक्षा क्षेत्र को निजी क्षेत्र के लिए पूरी तरह खोलने की वकालत करते हैं, वहीं सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के एडीटोरियल एसोसिएट गौतम बैस्टियन के अनुसार शिक्षा में हर स्तर पर विद्यार्थियों को चयन की आजादी मिलनी चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि शिक्षा तंत्र में विद्यार्थियों के सामने हर तरह के विकल्प उपलब्ध हों। और उसके लिए शिक्षा तंत्र को इंस्पेक्टर राज से मुक्त कर इसे पूर्ण उदारीकरण के रास्ते पर बढ़ाना चाहिए। एक ऐसा माहौल जहाँ सरकारी शिक्षा व्यवस्था और निजी शिक्षा व्यवस्था के बीच कड़ी प्रतियोगिता हो। इतना ही नहीं निजी क्षेत्र खुल कर शिक्षा क्षेत्र में निवेश करे और विभिन्न प्रतिभा के विद्यार्थियों को आकृष्ट करने के लिए विविध प्रकार के शिक्षा कार्यक्रम पेश करें। ऐसी खुली प्रतियोगिता में किसी भी विद्यार्थी को दुत्कारा और फटकारा नहीं जाएगा, बल्कि उसके अनुकूल दिशा में बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। शिक्षा में निजी निवेश करने वाले निश्चित रूप से यह सब अपने लाभ के लिए करेंगे, पर इससे लाभ अंतत: विद्यार्थी समुदाय को ही होगा। यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि निश्चित रूप से सरकार को गरीब छात्रों की मदद करने के लिए भी तैयार रहना होगा।

    वर्तमान शिक्षा पद्धति में चूँकि बेहतर कार्य कर अधिक लाभ कमाने की गुंजाइश नहीं है, इसलिए विविध प्रकार के छात्रों के लिए विविध कार्यक्रम पेश करने की प्रेरणा का अभाव है। शिक्षा पर विचार करने वाला एक धड़ा तो यह मानने लगा है कि शिक्षा को व्यवसाय के दायरे में लाना जरूरी है। जब शिक्षा में व्यवसाय का प्रवेश होगा, तभी स्कूलों की संख्या बढ़ेगी। स्कूलों के बीच प्रतियोगिता होगी। अलग-अलग छात्रों के जिए अलग-अलग पाठयक्रम और विषय पेश किए जाएंगे। व्यवसायियों के बीच कड़ी प्रतियोगिता से ही शिक्षा अधिक से अधिक विद्यार्थियों की सुविधानुसार ढलता जाएगा। और ऐसी व्यवस्था में विद्यार्थी के सामने जब ढेरों विकल्प होंगे, तो वह अपनी पसंद और प्रतिभा के अनुसार ठीक अपनी तरह की शिक्षा हासिल करेगा। और इस व्यवस्था में हर विद्यार्थी का मनोबल ऊँचा रहेगा। तब खुशबू को आत्महत्या के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा। खुशबू का बलिदान व्यर्थ ना जाए, इसके लिए आम जनता आगे आएँ। और नीति निर्माताओं पर व्यवस्था सुधार के लिए चुनावी दबाव बनाएँ।

मानवाधिकार टाइम्स (17 दिसंबर 2006)
संजय कुमार साह

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