सुख, सफ़लता और संतुष्टि के चक्रव्यूह में फ़ँसी दुनिया !!!

क्या आप अपने जीवन से संतुष्ट हैं?
सफलता और संतुष्टि के बीच का संबंध क्या है?
क्या संतुष्टि और सुख एक दूसरे के पूरक हैं?

सुखिया ये संसार है खावे अरू सोये, दुखिया दास कबीर है जागे अरू रोये।

ऐसे कितने ही सवाल हमारे सामने प्रतिदिन आते हैं और हम अक्सर उन्हें टालकर अथवा बिना विचारे कोई दार्शनिक तर्क देकर आगे बढ जाते हैं। लेकिन उसके बाद भी ये प्रश्नहमारा पीछा नहीं छोड़ते हैं। मेरी समझ में सुख और संतुष्टि दोनो ही आपके "मन", "विचार" और "कर्मों" के आपसी संतुलन और साम्य पर निर्भर करती है। कम से कम मेरेजीवन में ये साम्य और संतुलन अभी स्थापित नहीं हो सका है; इस दिशा में प्रयासरत अवश्य हूँ देखिए कब मेहनत रंग लाती है।

कथनी और करनी का अंतर, विचार और आचार की भिन्नता, स्वयं के व्यवहार पर खिन्नता और मन के अन्दर सदैव चलने वाला अंतर्कलह सब एक ही तो हैं। बात बड़ी सरलसी लगती है और सरल बात इतनी आसानी से समझ नहीं आती।

इस छोटे से जीवन में मुझे कुछ विलक्षण प्रतिभा के धनी महापुरुषों के साथ कुछ समय बिताने का सुअवसर मिला और उन सभी के व्यक्तित्व में मुझे एक बात समान लगी, उनसब के आचरण और व्यवहार में मुझे एक अजीब सी सहजता दिखी। बहुत से लोग अपने व्यक्तित्व में इस सहजता को जबरन ठूँसने का प्रयास करते हैं। लेकिन ये प्रयास उसीप्रकार असफल हो जाते हैं जैसे कि युवाओं में "कूल" दिखने के प्रयास। किसी ने कहा है कि अगर आप "कूल" हैं तो आपको "कूल" दिखने के किसी प्रयास की आवश्यकता नहींहै। उसी प्रकार व्यवहार और आचरण की सहजता अपने आप ही आती है। आप इस प्रकार के आचरण का झूठा लबादा देर तक नहीं ओढ़ सकते। आपके मन और चरित्र कीदुर्बलातायें उस ओढे हुये लबादे तो तार तार करने में देर नहीं लगाती।

अब प्रश्न ये उठता है कि क्या इस प्रकार की व्यवहार की सहजता को प्रयास से अर्जित किया जा सकता है ? क्या निरन्तर प्रयास के द्वारा आप सच जैसा दिखने वाला झूठा लबादा ओढ सकते हैं ? इस प्रकार के प्रयासो का आपके व्यक्तित्व और मानसिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड सकता है ? दूसरों को जताना कि आप बडे सहज हैं आसान है; लेकिन स्वयं के मस्तिष्क को इतना ट्रेन करना कि आप झूठा लबादा सहजता से ओढे रहें अलग बात है । मेरी राय में ऐसे प्रयासों का सफल होना मुश्किल है लेकिन असंभव नहीं । इसके अलावा अगर आप इस प्रकार की झूठी सहजता को ओढने में सफ़ल हो भी जायें तो भी दोहरा जीवन जीने की विडम्बना के रूप में एक कीमत आपको देनी ही पडती है।

"Ayn Rand" बड़ी ही प्रसिद्ध लेखिका हैं। "Atlas Shrugged" और "Fountainhead" उनके बडे प्रसिद्ध उपन्यास हैं । युवावस्था में जो भी उन्हें पढता है उनकी विचारधारा कामुरीद हो जाता है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ लेकिन समय के साथ मेरे विचार बदल गये। आज मैं उन्हें केवल उन्हें एक सशक्त लेखिका के रूप में मानता हूँ। उनकी विचारधाराके प्रति आकर्षण के पीछे एक सशक्त लेखिका की चालबाजी है । कृपया "चालबाज" शब्द को अन्यथा न लें । मेरा मंतव्य आगे चलकर स्पष्ट हो जायेगा।

अपने लेखों और उपन्यासों में लेखिका दो प्रकार के किरदारों का निर्माण करती है। एक प्रकार के किरदार ऐसे होते हैं जो आपको उनकी ओर आकर्षित करते है, वो वे सभी कार्य करते हैं जो आप कभी करना चाहते थे/हैं। वो समाज में अपनी शर्तों पर जीते हैं, किसी की परवाह नहीं करते, अपने क्षेत्र में जीनियस हैं, वगैरह वगैरह... दूसरे प्रकार के किरदारों में आप अपनी झलक देखते हैं; कभी अपने मतलब के लिये जीने वाले, कभी गलत समझौते करने वाले, समाज के लिये कुछ और वास्तव में कुछ और... लेकिन इसके बाद भी अपने अन्तर्मन की आवाज उन्हे सदैव सताती रहती है। ऐसे में खुद के कॄत्यों के खिलाफ़ प्रतिरोध स्वयं जैसे किरदारों के प्रति घॄणा के रूप में स्फ़ुटित होता है।

आप स्वयं एक प्रयोग कर सकते हैं, जिस व्यक्ति से आपको घृणा होती है उसके व्यक्तित्व की कोई ऐसी बात होती है जो आप स्वयं में भी पाते हैं (दूसरे लोग ये जानते हों जरूरी नहीं है ), और यही बात आपको कभी कभी बहुत परेशान करती है।

अगर इस उपन्यास में केवल दूसरा किरदार (आपके जैसा) होता तो शायद आप उसे पसन्द भी करते, उसकी उपलब्धियों की अपनी उपलब्धियों से तुलना भी करते, "ये ही दुनिया है और जहाँ के कारखाने ऐसे ही चलते हैं" कहकर इतराते और सब कुछ मजे में रहता । लेकिन ये पहला वाला किरदार आपका चैन छीन लेता है । आप सोचते हैं कि ये बेवकूफ़ किरदार दुनिया से शिकायत भी तो नहीं करता । धीरे धीरे पहले किरदार के साथ हुआ हर छलावा आपको कचोटने लगता है । इच्छा होती है कि काश अगर घडी को उल्टा कर पाता तो मैं भी पहले किरदार की तरह जीवन बिताता । बस इसी क्षण लेखिका अपनी चालबाजी में सफ़ल हो जाती है । इसके बाद आप लेखिका की विचारधारा से प्रभावित नहीं होते बल्कि स्वयं की कमियाँ और एक काल्पनिक किरदार के तिलिस्म में कैद होकर रह जाते हैं ।

आगे भी जारी रहेगा......
प्रस्तुतकर्ता -नीरज रोहिल्ला
http://antardhwani.blogspot.in/2007/07/blog-post_2