जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही

अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद चुनाव सुधारों के बारे में चर्चा और गहमागहमी बढ़ गई है और अब सरकार ने कहा है कि वह एक सर्वदलीय बैठक बुलाकर जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने के अधिकार और चुनाव में सभी प्रत्याशियों को नकारने के विकल्प पर विचार करेगी। सभी प्रत्याशियों को नकारने के विकल्प को लागू करना तो अपेक्षाकृत आसान है। इस बात को लेकर काफी पहले से यह मांग उठ रही है कि अगर किसी मतदाता को कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं है, तो उसे यह बात अपने वोट के जरिये कहने का अधिकार होना चाहिए, ताकि राजनैतिक दलों को यह पता चल सके कि भ्रष्ट और अपराधी चरित्र वाले उम्मीदवारों के खिलाफ कितने लोग हैं।

अभी समस्या यह है कि कितनी भी वोटिंग हो, जो उनमें सबसे ज्यादा वोट पाता है, वह जनप्रतिनिधि होने की वैधता हासिल कर लेता है। वोटर के पास दो ही विकल्प हैं, या तो वह वोटिंग में हिस्सा न ले या मतदान केंद्र में जाकर सारे उम्मीदवारों को वोट न देने के विकल्प का चुनाव करे। लेकिन दोनों ही मामलों में उसकी असहमति दर्ज नहीं होती। अगर चुनाव में ईवीएम पर ही वोटर किसी उम्मीदवार को न चुनने का विकल्प दर्ज कर पाए और वह ईवीएम में दर्ज हो, तो यह पता चलेगा और आधिकारिक रूप से दर्ज भी होगा कि कितने वोटरों ने सारे उम्मीदवारों को रद्द किया।

यह करना ज्यादा मुश्किल नहीं है, असली मुश्किल यह है कि उसके बाद क्या हो? क्या सबसे ज्यादा वोट ‘कोई भी नहीं’ के खाते में पड़ें तो चुनाव रद्द हो, और अगर चुनाव रद्द होकर फिर से हों, तो क्या फिर से उन्हीं उम्मीदवारों को खड़ा होने का अधिकार हो? ये सारे सवाल काफी पेचीदा हैं और इनका जवाब ढूंढ़ना मुश्किल होगा।

जनप्रतिनिधियों की वापसी का सवाल सचमुच जटिल है। यह मुद्दा सबसे ज्यादा जोर-शोर से जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के दौर में उठा था। राममनोहर लोहिया का नारा ‘जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं’ इस मांग का प्रेरणास्त्रोत बन गया था। इस आंदोलन के खत्म हो जाने के बाद यह मांग यदा-कदा उठती रही, लेकिन  इसे ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया गया। लेकिन इस दौर में राजनीति में अपराधीकरण और भ्रष्टाचार भी कई गुना बढ़ा और लोगों को यह लगने  लगा कि ऐसे जनप्रतिनिधियों पर अंकुश लगाने के लिए बीच में ही उन्हें वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिए। चुनाव सुधारों पर जब भी बात होती है, तो यह मुद्दा हमेशा उठता है। उसके पीछे तर्क यही है कि इसकी वजह से जनप्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह बन सकेंगे। लेकिन इसके पीछे कई पेच भी हैं।

जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी अपने वोटरों की समस्याएं सुलझाना जरूर है, लेकिन वे प्रशासनिक अधिकारी नहीं हैं, उनका मुख्य काम नीति निर्धारण और कानून बनाना है। इन दिनों समस्या उल्टी हो गई है, वोटों के ख्याल से संसद में नीतिगत बहसों और फैसलों से ज्यादा जनप्रतिनिधियों की दिलचस्पी अपने चुनाव क्षेत्र में सड़कें बनवाने और लोगों के छोटे-मोटे काम करवाने में होती है, जो दरअसल कार्यपालिका के काम हैं। वापसी की तलवार टंगी रहेगी, तो जनप्रतिनिधि ज्यादा लोकलुभावन कामकाज में लगे रहेंगे और अपने वास्तविक संसदीय कामों की उपेक्षा करेंगे। टीम अन्ना  की वजह से चुनाव सुधारों के ये मुद्दे ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं, इसीलिए सरकार भी इन पर सर्वदलीय बैठक बुलाना चाहती है। दरअसल चुनावी तंत्र में दूसरी गड़बड़ियां ज्यादा गंभीर हैं और उन्हें सुलझाने पर ज्यादा ध्यान देना जरूरी है। अपराधीकरण और पैसे की बढ़ती भूमिका पर कुछ सख्त कदम उठाना ज्यादा जरूरी है। अगर सरकार गंभीर है, तो उसे चुनाव सुधारों पर एक व्यापक सहमति बनाकर जल्दी से जल्दी उन्हें कार्यान्वित करना चाहिए।

-स्निग्धा द्विवेदी