आतंक गाथा में जुडा एक और अध्याय

दिल्ली हाईकोर्ट परिसर के स्वागत कक्ष के बाहर कल आतंकवादियों ने एक शक्तिशाली बम विस्फोट को अंजाम दिया जिस में 11 लोगों की मौत हो गई और करीब 76 घायल हो गये. इसी के साथ एक बार फिर दिल्ली हिल गयी और आतंक के साथ भारत की जंग मे एक और पन्ना जुड़ गया. संसद भवन से करीब तीन किलोमीटर दूर इस वी आइ पी इलाके मे हुये हादसे ने भारतीय इंटेलिजेंस और सुरक्षा व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ा दीं. नतीजतन एक और बार हर तरफ सिर्फ निंदा और क्षोभ का वातावरण है.

बांग्लादेश से आज रात लौटने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पत्रकारो से कहा की कल हुई घटना में कुछ सुराग मिले हैं लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगा कि इस के पीछे किस का हाथ है. मुंबई 26/11 के हमले के बाद से लोगों में असुरक्षा की भावना के बारे में उन्होंने कहा कि सरकार ने कई तंत्रों की व्यवस्था की और नए कदम उठाये लेकिन निश्चित तौर पर अनसुलझी समस्याएं हैं और आतंकवादी उसका फायदा उठा रहे हैं . उन्होंने राजनैतिक दलों से आपस में कहासुनी बंद करने और आतंकवाद की समस्या से साथ मिलकर लड़ने का आह्वान किया.

गत 25 मई 2011 को हाईकोर्ट के गेट नंबर-7 के पास एक कार में धमाका हुआ था. तीन महीने बाद फिर वही हादसा हो जाता है और कोई कुछ नहीं कर पाता. संसद सत्र के दौरन वैसे भी राजधानी दिल्ली मे हाई अलर्ट रहता है पर फिर भी हमारा खुफिया तंत्र और पुलिस विभाग असहाय और असफल साबित हुआ. 26/11 के मुंबई हमलों के बाद देश में जितनी भी आतंकी वारदातें हुई हैं, उनमें से ज़्यादातर की एजेंसियो द्वारा जांच अभी भी चल रही है.

26/11 को मुंबई में हुए हमले के बाद सरकार की ओर से यह संदेश देने की कोशिश की गई थी कि इसके बाद कोई आतंकी हमला बरदाश्त नहीं किया जाएगा. उसके फौरन बाद सुरक्षा और खुफिया तंत्र को भी पुख्ता किया गया और राष्ट्रीय जांच एजेंसी का भी गठन किया गया. लेकिन फिर भी आतंकवादी अपने मंसूबों को अंजाम देने में कामयाब होते जा रहे हैं. गृह मंत्री पी चिदंबरम ने स्वीकार किया है कि जुलाई में ही दिल्ली पुलिस के साथ खुफिया जानकारी साझा की गई थी, फिर भी यह घटना घट गई. ऐसा प्रतीत होता है कि आतंकवाद से लडने के लिये देश के पास न ठोस कानून हैं, न इच्छाशक्ति है और ना ही प्रभावी सुरक्षा तंत्र.

कल के घटनाक्रम मे सुरक्षा में हुई चूक की गहन समीक्षा तो होनी ही चाहिए, साथ ही यह भी देखना जरूरी है कि आखिर इसके लिए कौन जिम्मेदार है. दोषियो की ज़िम्मेदारी तय कर उन्हें सज़ा दी जानी चाहिये, जिस से एक अच्छा सन्देश जाएगा. सरकार को  कड़े से कड़े कदम उठा कर देश की सुरक्षा व्यवस्था को मज़बूत बनाना होगा. तथा सिर्फ बयानबाजी से ऊपर उठ कर को अपनी लापरवाही की ज़िम्मेदारी लेनी होगी. मासूम जानों को यूँ ही नहीं जाने देना होगा अब.

- स्निग्धा द्विवेदी