अराजकतावाद------(2)

मध्यकाल में अराजकतावादी दर्शन की झलक मार्को जिरोलमो वाइड के विचारों में देखने को मिलती है. अराजकतावाद और स्वाधीनतावाद के बारे में विस्तृत विमर्श हमें सोलहवीं शताब्दी के फ्रांस के दूरद्रष्टा कवि-दार्शनिक ला बूइटी(1530—1563) के साहित्य में भी प्राप्त होता है. उसने स्वाधीनतावाद के पक्ष में जोरदार तर्क दुनिया के सामने रखे. क्रीटवासी जीनो से प्रभावित बूइटी का विचार था कि तानाशाही चाहे वह बलपूर्वक स्थापित की गई हो, अथवा किसी अन्य माध्यम से, बड़े से बड़ा तानाशाह केवल उस समय तक सत्ता शिखर पर बना रह सकता है, जब तक कि जनता उसको वहां बनाए रखना चाहती है. ऐसे तानाशाह को बलपूर्वक खदेड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती. जनता यदि अपने दासताबोध से बाहर आ जाए तो तानाशाही स्वतः दम तोड़ लेती है. इसलिए आजादी की चाह रखने वाली जनता को सबसे पहले स्वयं दासता-चक्र से बाहर निकालना चाहिए. बूइटी को हम सत्याग्रह आंदोलन का आदि प्रवत्र्तक भी मान सकते हैं. यह बात चैंका सकती है कि 1575 में धार्मिक सुधारवादी नेता ह्युजनोट द्वारा प्रकाशित एक पंपलेट में बूइटी ने—

‘कस्बों और शहर में रहने वाले लोगों से सिविल नाफरमानी का सहारा लेते हुए राज्य को दिए जाने वाला किसी भी प्रकार का टैक्स न चुकाने की अपील की थी.’

बूइटी असल में मानवतावादी विचारक था. उस समय तक भी अराजकतावाद अथवा उसके किसी पर्यायवाची शब्द का चलन नहीं हो पाया था. अंग्रेजी शब्दावली में ‘अनार्किस्ट’ शब्द 1642 में इंग्लेंड के गृह-युद्ध के दौरान उपयोग किया गया. उन दिनों इस शब्द का आशय आज से एकदम भिन्न था. तब यह शब्द उपहास और हेयताबोध दर्शाने के लिए प्रयुक्त किया गया था. प्रयोग करने वाले अंग्रेजी राजशाही के समर्थक थे. उन्होंने इस शब्द का गालीनुमा प्रयोग राजशाही के स्थान पर संसदीय राज्यप्रणाली की मांग कर रहे परिवर्तनवादियों के लिए किया था. 1793 में फ्रांसिसी क्रांति के दौरान साम्राज्यवादी जेकोबिन के विरुद्ध परिवर्तनवादी आंदोलनकारियों द्वारा भी इस शब्द का उपयोग किया था. हालांकि उस समय भी अराजकतावादी होना, उपहास और हंसी का पात्र माना जाता था. आंदोलनकारी भीड़ को संबोधित करते हुए फ्रांसिसी क्रांति के सूत्रधार जेकुइस राॅक्स ने ‘आक्रोश का घोषणापत्र’ में समाज में व्याप्त असमानता पर प्रहार करते हुए कहा था कि ऐसे राज्य में जहां—

‘एक वर्ग शोषण द्वारा दूसरे वर्ग को भूखा मरने पर विवश कर दे, वहां आजादी सिवाय प्रेतछाया के कुछ नहीं है. जहां धनी अपने एकाधिकार और मनमानी द्वारा निर्धन व्यक्ति के जीवन-मरण का फैसला करने लगे, वहां समानता सिवाय प्रेतछाया के कुछ नहीं है. जिस राज्य की तीन-चैथाई जनता दिनोंदिन आसमान चढ़ती महंगाई से त्रस्त होकर रात-दिन आंसू बहाती हो, वहां गणतंत्र सिवाय प्रेतछाया के कुछ नहीं है.’

अपने घोषणापत्र में रा॓क्स ने जनता से आततायी राजसत्ता को उखाड़ फेंकने का आवाह्न किया था. इस पर साम्राज्यवादियों द्वारा प्रतिक्रियावादी कहकर उसका मजाक उड़ाया गया था. अठारवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक व्यक्ति-स्वातंत्रय की मांग विस्तार ले चुकी थी. उन्हीं दिनों इमानुएल जोसेफ सीयेस(1748—1836) ने क्रांतिकारी काम किया, जिसने इतिहास की धारा ही बदल दी. कुलीन मध्यवर्गी परिवार में जन्मे सीयेस ने अपनी शिक्षा धार्मिक माहौल में पूरी की थी. समय आने पर उसको एक चर्च में पादरी की नौकरी मिल गई. लेकिन वह पादरी के परंपरागत कार्य में रमे रहने के बजाय सुधारवादी कार्यक्रमों में प्रवृत्त हुआ. अपने क्रांतिधर्मी विचारों को लेकर सीयेस ने कई छोटे-छोटे परिपत्र लिखे, जिन्होंने समाज में नई चेतना का प्रसार किया. उसके लिखे परिपत्रों में ‘तीसरी दुनिया क्या है?(व्हा॓ट इज थर्ड एस्टेट?)’ शीर्षक से लिखा गए परिपत्र में नए युग का संदेश निहित था. कालांतर में यही परिपत्र फ्रांसिसी क्रांति का प्रमुख उत्प्रेरक बना. राजशाही में जनता की हैसियत पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए सीयेस ने लिखा था—

‘तीसरी दुनिया क्या है?’

‘सबकुछ.’

‘अभी तक राजतंत्र में तीसरी दुनिया की हैसियत कैसी है?’

‘तुच्छ, कुछ भी नहीं.’

‘इसकी हसरत क्या है?’

‘थोड़े-से मान-सम्मान की.’

‘किसी राष्ट्र की जीवंतता और समृद्धि के लिए क्या अनिवार्य है?’

‘व्यक्तिगत प्रयास एवं सामूहिक कर्तव्यपरायणता.’

सीयेस ने अस्सी प्रतिशत नागरिकों को अधिकार वंचित करने वाली व्यवस्था को चुनौती दी थी. उसके परिपत्र ने जादू का असर किया, इसके बावजूद उनीसवीं शताब्दी के आरंभ तक ‘अनार्किज्म’ तथा उसके समर्थकों के प्रति लोगों का नकारात्मक रवैया बना रहा. अराजकतावाद को कोई भी गंभीरता से लेने को तैयार न था, किंतु उनीसवीं शताब्दी में यूरोपीय नवजागरण के दौर में, विशेषकर रूसो द्वारा व्यक्ति स्वातंत्रय के पक्ष में दिए गए जोरदार तर्कों के बाद अराजकतावाद के प्रति लोगों ने नए सिरे से सोचना आरंभ किया. उनीसवीं शताब्दी में पहली बार विलियम गुडविन(1756—1836) ने पहली बार अराजकतावाद का दर्शन सामने रखा, हालांकि अपने इस दर्शन को उसने कोई नया नाम नहीं दिया था. गुडविन के विचारों का प्रभाव एडमंड ब्रूक, बेंजामिन टुकर पर पड़ा. परंतु उसका श्रेय मिला अमेरिकी सुधारवादी विचारक जोसीह वारेन(1798—1874) को जिसने संभवतः पहली बार राज्य की उपयोगिता को नकारते हुए राज्यविहीन स्वावलंबी बस्तियों की स्थापना पर जोर दिया. राबर्ट ओवेन के सामूहिक आवास बस्तियों के विचार से प्रभावित वारेन के प्रस्तावित स्वावलंबी राज्य में सभी संपत्तियों तथा सेवाकार्यों को सामूहिक बस्तियों के अधिकार में रखा गया था. वारेन द्वारा स्थापित सामूहिक आवास बस्तियों में मानवजीवन पर बाहरी हस्तक्षेप कम से कम था. वे व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता का समर्थन करती थीं, लेकिन निवासियों में सामूहिक जीवन के प्रति निष्ठा का अभाव, अनुभव की कमी के कारण उनका वही अंत हुआ जो राबर्ट ओवेन द्वारा स्थापित ‘न्यू हार्मोनी’ का हुआ था. उन दिनों सहकारिता आंदोलन उठान पर था. वारेन के प्रयासों को भी सहकारिता के उपांग के रूप में देखा गया. असफलता का एक कारण यह भी था कि वारेन ने सहजीवन का पक्ष तो लिया, किंतु राजशाही और साम्राज्यवाद की उतनी तीखी आलोचना नहीं की, जैसी फ्रांसिसी क्रांति के सूत्रधार नेताओं ने की थी.

दर्शन के रूप में ‘अराजकतावाद’ भले ही ढाई हजार वर्ष अथवा उससे भी अधिक पुराना हो, परंतु एक परिपक्व राजनीतिक दर्शन के रूप में इस शब्द का सर्वप्रथम उपयोग 1890 में फ्रांस में पियरे जोसेफ प्रूधों द्वारा किया गया था. वह पहला विचारक था जिसने खुद को जोरदार शब्दों में अराजकतावादी कहते हुए व्यवस्था परिवर्तन की मांग की थी. निजी संपत्ति की अवधारणा को चुनौती देते हुए उसने लिखा था—‘निजी संपत्ति चोरी है तथा संपत्तिधारक व्यक्ति चोर है.’ प्रूधों सीयेस की तीसरे राज्य की अवधारणा से प्रभावित था, जिसने बाइबिल से संदर्भ लेकर राजशाही की तीखी आलोचना की थी. अपने समय में प्रूधों की ख्याति मार्क्स से कहीं बढ़कर थी. प्रूधों जब व्यक्तिगत संपत्ति को चोरी बता रहा था तो उसका आशय उसके कुछ हाथों तक सिमट जाने से था. राज्य चूंकि संपत्ति के केंद्रीयकरण को वैधता प्रदान करता है, इसलिए उसने राज्य की सत्ता को ही अवैध मानते हुए ऐसे राज्य की परिकल्पना की थी, जहां व्यक्ति कानून की अपेक्षा आत्मसंयम एवं आत्मानुशासन से बंधा हो. (जारी)

- ओमप्रकाश कश्यप
(समाजवाद के आधुनिक विकल्प -लेख का अंश)
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